
Girish Malviya
जब पिछली बार पुण्य प्रसून वाजपेयी बड़े बेआबरू होकर एबीपी न्यूज के कूचे से निकले थे तो उन्होंने अपने ब्लॉग में बताया था कि ‘न्यूज़ चैनल क्या दिखा रहे हैं… क्या बता रहे हैं… और किस दिन किस विषय पर चर्चा कराते हैं… उस चर्चा में कौन शामिल होता है… कौन क्या कहता है… किसके बोल सत्तानुकूल होते हैं… किसके सत्ता विरोध में… इन सब पर नज़र है.
पर कन्टेंट को लेकर सबसे पैनी नजर प्राइम टाइम के बुलेटिन पर और खासकर न्यूज चैनल का रुख़ क्या है… कैसी रिपोर्ट दिखाई-बताई जा रही है… रिपोर्ट अगर सरकारी नीतियों को लेकर है तो अलग से रिपोर्ट में ज़िक्र होगा और धीरे-धीरे रिपोर्ट दर रिपोर्ट तैयार होती जाती है. फाइल मोटी होती रहती है.”
और मॉनिटिरिंग टीवी चैनलों तक सीमित नहीं है पत्रकारों, अखबारों और सोशल मीडिया की निगरानी होती है……….. सोशल मीडिया पर कौन क्या लिख रहा है उसके कितने फॉलोअर हैं कितने शेयर लाइक ट्वीट-रीट्वीट होते हैं, उसकी मॉनिटरिंग होती है…. 250 लोगों की टीम बीजेपी के पुराने मुख्यालय में पत्रकारों, मठाधीशों के ट्वीट और लेखन पर नजरें रखती हैं.
ये लोग अखबार पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं, ट्विटर हैंडल्स पर नजर बनाए रखते हैं. कौन सा पत्रकार, अखबार और टीवी चैनल बीजेपी के पक्ष में है, कौन बीजेपी के खिलाफ है, उसकी बाकायदा एक एक्सेल शीट बनती है. रिपोर्ट में पत्रकारों, अखबारों और चैनलों को प्रो-बीजेपी और एंटी-बीजेपी लिखा जाता है. इस काम में लगे एक व्यक्ति ने बताया कि ऐसा कर शाम को वे रिपोर्ट एक अज्ञात व्यक्ति को देते हैं….
इसे भी पढ़ें – धनबाद डीसी की वजह से स्कूल पर नहीं हो पा रही RTE उल्लंघन की कार्रवाई
यानी सब बिग ब्रदर की नजर में है…
पहले मुझे आश्चर्य होता था कि क्यों राजनीतिक दल सोशल मीडिया पर इतना अधिक खर्च कर रहे हैं?… क्योंकि बहुत से लोगों को आज भी यह लगता है कि सोशल मीडिया से कुछ नहीं होता! असली लड़ाई जमीन पर लड़ी जाती है…. लेकिन पिछले चार सालों में जियो के आने के बाद परिस्थितियां तेजी से बदली है. कहा जा रहा है कि साढ़े सात करोड़ युवा वोटर इस चुनाव में पहली बार वोट डाल रहा है, उसके अलावा 18-45 वर्ष के वर्ग का व्यक्ति भी अब खुलकर इंटरनेट की दुनिया से परिचित हो चुका है
पिछले दिनों भारत की बहुत बड़ी सॉफ्टवेयर कम्पनी Infosys लिमिटेड में पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) रहे टी वी मोहनदास पई का एक बयान आया था, उनका मानना है कि इस 2019 के लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया के कारण चार-पांच फीसदी मत इधर से उधर शिफ्ट हो सकते हैं.
उसकी वजह भी है……… युवा, विशेषकर पहली बार मतदान करने वाले मतदाता सोशल मीडिया जैसे Facebook, WhatsApp पर बहुतायत में हैं और यह इनमें से अधिकतर युवाओं के लिए सूचना का प्राथमिक स्रोत भी है,
आज के युवा टीवी नहीं देखते हैं, लेकिन वह वीडियो देखते हैं. वे अखबार नहीं पढ़ते हैं, लेकिन यूट्यूब देखना पसंद करते हैं, सोशल मीडिया पर समय बिताना पसंद करते हैं. ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया के इन माध्यमों से वे प्रभावित होते हैं, न कि प्रिंट या टीवी से….
इसे भी पढ़ें – पिछली बार नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ा था चुनाव, इस बार रांची लोकसभा से चुनावी मैदान में
चुनावी पंडित आज भी आश्चर्य करते हैं कि 2014 के चुनाव में हिन्दी बेल्ट के प्रमुख 5 राज्यों की 91 सीटों में से 89 सीट कैसे जीत पाई ? चुनाव आयोग के मुताबिक 2009 में 114 सीटों पर जीत-हार का अंतर तीन प्रतिशत से कम था, बीजेपी की स्ट्रेटेजी थी कि इस तीन प्रतिशत के स्विंग को कैसे भी करके अपने पक्ष में लाना है और उसका सबसे बड़ा हथियार सोशल मीडिया ही बना… क्योंकि बाकी प्रचार माध्यम उसके पक्ष में खुलकर बोल नहीं सकते थे….
और आज भी इसीलिए सिर्फ एक ही एजेंडा सेट किया जा रहा है कि ‘मोदी है तो मुमकिन हैं’ मोदी की छवि ‘लार्जर देन लाइफ’ बना के पेश करना इस मीडिया और सोशल मीडिया का लक्ष्य है ….क्योंकि वह जानते हैं कि भाजपा सांसद जब अपने निर्वाचन क्षेत्र में जाएगा, तो वहां की पब्लिक उससे सवाल पूछेगी कि 5 साल में आपने हमारे क्षेत्र के लिए क्या किया?….
बीजेपी जानती है कि इस सवाल पर सांसदों को बगले झांकने पर मजबूर होना पड़ेगा… इसलिए बस ब्रांड मोदी पर अड़े रहो….ये ही हमारी नैया पार लगा सकता है!…
यह बड़ी कूटनीति से रचा गया षणयंत्र हैं, जिसके पीछे 5 साल की सारी असफलताओं को छिपाया जा रहा है और हमें आपको सवाल करने से रोका जा रहा है….
(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं औरये उनके निजी विचार हैं.)
इसे भी पढ़ें – जया प्रदा पर टिप्पणी मामला : आजम खान को महिला आयोग ने थमाया नोटिस, कांग्रेस ने की बयान की निंदा




