
Faisal Anurag
लोकतंत्र को बारबार कठिन परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ता है. विकासशील और अविकसित देशों में लोकतंत्र को सूली पर चढ़ाने की लंबी परंपरा है. लोकतंत्र को जब भी सूली पर चढ़ाया गया है, तो उसे लोकतंत्र के नाम पर ही. भारत और उसके पड़ोसी देशों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. मौजूदा माहौल में भारतीय लोकतंत्र एक बड़ी अग्निपरीक्षा से गुजर रहा है.
इमरजेंसी के दौर में तो भारत के नागरिकों, खास कर युवाओं के प्रतिरोध ने लोकतंत्र को बचा लिया था. एकबार फिर भारीय लोकतंत्र को ले कर आशंकाओं का माहौल व्यापत है. नागरिकता संशोधन कानून के बाद भारत बेहद बेचैन नजर आ रहा है. भारत के कई राज्यों में नागरिकता कानून के खिलाफ आंदोलन चरम पर है. इन आंदोलनों ने अब दिल्ली को भी हिला दिया है.
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आंदोलन को हिंसक बनाने की कोशिशों के बीच जिस बड़े पैमाने पर युवा सड़कों पर हैं, वह 1967 के फ्रांस की याद दिलाता है. जब चार्ल्स द गाल के खिलाफ छात्र और छात्राओं के साथ युवाओं ने तमाम तरह के सामाजिक भेदों की दीवार गिरा दी थी. और एक ऐसी इबारत लिखी जिसका पूरी दुनिया के युवा पर प्रभाव पडा.
1974 के बाद यह पहला अवसर है, जब भारत के युवा सड़कों पर हैं. और वे नये-नये नए नारों के साथ प्रतिरोध का नया तेवर गढ़ रहे हैं. एनआरसी की दस्तक के कारण आइडिया आफ इंडिया एक ऐसे संकट के दौर में है जहां भारत की धर्मनिरपेक्ष परंपरा अग्नि परीक्षा के दौर से गुजर रही है.
धर्मनिरपेक्षाता का वायदा पूरे स्वाधीनता आंदोलन का मूल स्वर रहा है. और जो भारत के संविधान की एक अटूट संरचना का हिस्सा है. सवाल उठा है कि भारत ने जिस दो राष्ट्रों सिद्धांत को 1947 में ठुकरा दिया था, क्या उसकी वापसी हो रही है. भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस अपने विचारों में जिस तरह भारत के हिंदू राष्ट् के विचारों को ले कर बात करते रहे हैं, उस ने आशंका को गहरा दिया है.
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जिस तरह जनांदालनाके खिलाफ सुरक्षा बलों का खुला प्रयोग हो रहा है, उससे यह आशंका मजबूत ही हुई है. दुनियाभर की अनेक संस्थाओं ने नागरिकता कानून को ले कर आलोचना की है. भारत के पड़ोसियों से संबेध पहले से ही खराब हैं. इस कानून के बाद भारत के मित्र देश बांग्लादेश और अफगानिस्तान से जिस तरह की प्रतिेक्रिया आयी है वह चिंताजनक है.
पाकिस्तान की मीडिया के एक हिस्से में चर्चा हो रही है कि इस कानून के बाद जिन्ना का दो राष्ट्रों का विचार सही साबित हुआ है. जिन्ना ने जिन आशकाओं को 1945 के बाद प्रकट किया था, उसे सही बताने की होड़ लगी हुई है. भारत सरकार के चाहे जो भी तर्क हों, नागरिकता संशोधन कानून को एनआरसी से जोड़ कर ही देखा जा रहा है. एनअरसी में भारत के लोगों को ही अपनी नागरिकता को प्रमाणित करना होगा.
कहा जा रहा है कि एनआरसी केवल मुसलमानों को ही संदेह के घेरे में नहीं डालेगी. बल्कि अन्य धार्मिक समूहों के गरीब और कमजोर तबकों के लिए भी अपनी नागरिकता को दस्तावेज देना मुश्किल होगा. यह एक ऐसी सुरंग है, जिससे गुजरना आसान नहीं होगा. मोदी सरकार के बारे में कहा जा रहा है कि वह केवल हिंदू वोटों की एकजुटता के लिए इस तरह का कदम उठा रही है.
अमित शाह और नरेंद्र मोदी देोनों अपनी बातों से यही संकेत दे रहे हैं. झारखंड की चुनावी सभाओं में मोदी ने कहा कि हिंसा करने वाले को पहनावे से पहचाना जा सकता है. यह कोई सामान्य टिप्पणी नहीं है. मोदी इसके माध्यम से झारखंड के अंतिम दो दौर के चुनावों में धार्मिक तौर पर ध्रुवीकरण करते नजर आते हैं. वे जो कुछ कहना चाहते हैं, वह कोई सामान्य बात नहीं है.
मोदी पर आरोप लगाया जा रहा है कि यदि वे पहनावे से ही हिंसक तत्वों की पहचान कर लेते हैं, तो झारखंड के चुनाव में ही वे उन मंचों पर ऐसे तत्वों की पहचान क्यों नहीं कर पाये जिन पर हिंसा और हत्या के गंभीर आरोप हैं. ऐसे तत्वों को टिकट ही नहीं दिया गया है, बल्कि उन्हें मोदी की सभा में मंच दिया गया. अमित शाह ने तो त्रिपुरा में कह दिया कि हिंसा का कीचड़ जितना फैलेगा कमल उतना ही खिलेगा.
साफ है वे क्या कहना चाहते हैं. पूर्वोतत्तर से दिल्ली तक फैली हिंसा के बीच इस तरह का बयान तो बेहद गंभीर है. लोकतंत्र की चेतना का आहत होना बेहद गंभीर मामला है. भारत दुनिया का एक ऐसा लोकतांत्रिक देश रहा है जिसका सम्मान पूरी दुनिया में है. भारत का संविधान भी पूरी दुनिया में अपनी अलग जगह रखता है. और उसे दुनिया की तमाम संवैधानिक लोकतांत्रिक ताकतें सम्मान से देखती हैं.
विपक्षियों को लगातार निशाने पर लेने की जो प्रवृति इस सरकार की है, वह संवाद की लोकतांत्रिक प्रवृति के अनुकूल नहीं दिखती है. लोकतंत्र बगैर असहमति के एक बेजान सी चीज बन जाती है. भारत की वर्तमान अग्नि परीक्षा की कामयाबी ही लोकतंत्र को सूली से बचा सकती है.
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