
Akshay Kumar Jha
Ranchi/Dumka : मसानजोर बांध बनाकर न सिर्फ झारखंड के साथ बेईमानी हुई है, बल्कि वहां के विस्थापितों के साथ भी तत्कालीन सरकार ने नाइंसाफी की. भारत देश में शायद यह पहला संयोग होगा कि जमीन किसी और राज्य की, नदी किसी और राज्य की और उसपर मालिकाना हक किसी और राज्य का. मसानजोर डैम की नींव 1950 में पड़ी. खुद भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने आकर बांध का शिलान्यास किया. कनाडा सरकार की मदद से बांध बनने का काम तेजी से शुरू हुआ. पांच साल के अंदर बांध बनकर तैयार हो गया. बांध बनाने से पहले तत्कालीन सरकार ने वहां के विस्थापितों को भरोसा दिलाया था कि उनके साथ किसी तरह की नाइंसाफी नहीं होगी. सभी को जमीन के अलावा फसल बर्बाद होने का हर्जाना मिलेगा. सरकार ने विस्थापितों के साथ करार किया कि उन्हें 20 साल का फसल मुआवजा दिया जायेगा. लेकिन, ऐसा हुआ नहीं.
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अधिकारियों ने डकारा विस्थापितों का मुआवजा
मसानजोर डैम बंगाल के लिए बनाया जा रहा था. बांध के पानी और पानी से बनी बिजली का इस्तेमाल बंगाल को करना था. लिहाजा मुआवाजा की राशि बंगाल सरकार की ओर से देनी थी. बिहार सरकार ने बंगाल सरकार से मुआवजे की राशि ले ली और विस्थापितों के बीच बांटने का जिम्मा लिया. तय हुआ कि पांच रुपये प्रति मन के हिसाब से फसल के मुआवजे की राशि बांटी जायेगी. सरकार के वादों में उस वक्त विस्थापित आ गये. लेकिन, राशि बांटने समय सरकार ने रंग बदलना शुरू कर दिया. कहा गया कि देश को आजाद हुए अभी 10 साल भी नहीं हुए हैं. ऐसे में मुआवजे की राशि आधी ही मिलेगी. कुछ विस्थापितों के पास आज भी मुआवजे की राशि की रसीद है. दुमका के कुमड़ाबाद के विस्थापित स्वर्गीय रामचंद्र पाठक को मिली रसीद के मुताबिक, उन्हें 50 फीसदी से भी कम की राशि मुआवजे के तौर पर दी गयी. उसी तरह बाकी विस्थापितों के साथ भी यही हुआ. किसी विस्थापित को पूरे मुआवजे की राशि नहीं दी गयी.
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आखिर कहां गयी मुआवजे की राशि
बंगाल सरकार ने जो राशि मुआवजे के तौर पर बिहार सरकार को दी, उसकी बंदरबांट हुई. इसका पुख्ता प्रमाण है. 1955-56 में बस एक बार ही मुआवजे की राशि बांटी गयी. उसके बाद दोबारा कभी भी बिहार सरकार ने मुआवजे की राशि नहीं बांटी. उस वक्त सरकार ने कहा कि बंगाल सरकार की तरफ से जो मुआवजे की राशि मिली है, उसे बिहार सरकार की ट्रेजरी में रखवा दी जा रही है. लेकिन, उसके बाद से लेकर आज तक उस राशि का कोई हिसाब नहीं मिला. आरटीआई के तहत जानकारी मांगने पर भी सरकार की तरफ से माकूल जवाब नहीं आया. ऐसे में सवाल उठता है कि मुआवजे की राशि गयी कहां. कुछ विस्थापितों का कहना है कि बिहार सरकार के उस वक्त के अधिकारियों ने इस पैसे की बंदरबांट की. विस्थापितों को राशि देने की बजाय खुद ही अधिकारियों ने पूरी राशि डकार ली.
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बीजेपी सरकार ने फिर से दोहराया बंगाल के साथ करार
ऐसा नहीं है कि मसानजोर डैम के साथ जो हुआ, वह बिहार सरकार के समय ही हुआ. झारखंड अलग होने के बाद भी मसानजोर को अपने कब्जे में लेने की बजाय झारखंड की बीजेपी सरकार ने बंगाल के साथ करार को दोहराया और 10 साल के लिए करार की मियाद बढ़ा दी. 2005 में अर्जुन मुंडा की बीजेपी सरकार ने बंगाल के साथ मसानजोर बांध के करार की मियाद को 10 साल के लिए बढ़ाया. उस वक्त बंगाल के सीएम ज्योति बसु थे. बंगाल के वीरभूम-सिवड़ी के डीएम और दुमका के डीसी की मौजूदगी में झारखंड के तत्कालीन सीएम अर्जुन मुंडा ने यह करार किया. बता दें कि मसानजोर डैम में झारखंड की 19,000 एकड़ से अधिक जमीन प्रभावित हुई है. इस जमीन पर मालिकाना हक झारखंड के लोगों का है. जमीन देने के एवज में विस्थापितों को न तो मुआवजा मिला और न ही झारखंड इस बांध का पानी और पानी से बनी बिजली का इस्तेमाल कर सकता है.
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