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नक्सल प्रभावित इलाकों में सिर्फ कागजों में है सरयू एक्शन प्लान, बकोरिया फर्जी नक्सल मुठभेड में मारे गये पांचों नाबालिग इसी इलाके के

बकोरिया फर्जी मुठभेड के ठीक पहले भाग निकले 14 वर्षीय नाबालिग  सीताराम सिंह का घर भी हरातू पंचायत में ही है.

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Pravin kumar

Latehar : लातेहार जिले का बीहड़ जंगल क्षेत्र का इलाका है कटिया. बरवाडीह प्रखंड में गणेशपुर व हरातू जैसी कई पंचायतें हैं. इसी गणेशपुर पंचायत के अम्बवाटीकर गाँव का टोला है कटिया. घने जंगलों से घिरा यह टोला कभी माओवादियों का गढ़ हुआ करता था. यह टोला सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच मुठभेड़ के लिए बदनाम रहा है. फर्जी नक्सल मुठभेड़ (बकोरिया कांड) में मारे गये नाबालिग भी इलाके की हरातू पंचायत के थे. बकोरिया कांड में मारे गये नाबालिग महेंद्र सिंह खरवार, पिता कमलेश्वर सिंह खरवार, उम्र 15 वर्ष, गांव हरातू, चरकु तिर्की, भाई विजय तिर्की, उम्र 12 वर्ष, गांव अम्बवाटीकर. बुद्धराम उरांव, भाई महिपाल उरांव, उम्र 17 वर्ष, गांव करूमखेता. उमेश सिंह खरवार, पिता पचासी सिंह खरवार, उम्र 16 वर्ष, गांव लादी. सत्येंद्र पहरहिया, पिता रामदास पहरहिया, उम्र 17 साल, गांव लादी के थे. बकोरिया फर्जी मुठभेड के ठीक पहले भाग निकले 14 वर्षीय नाबालिग  सीताराम सिंह का घर भी हरातू पंचायत में ही है.

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नक्सल के नाम पर दमन का क्षेत्र रही है गणेशपुर,हरातू पंचायत

आम तौर पर सरकारों की यह नियति रही है कि जो नक्सल प्रभावित इलाके चिह्नित होते हैं, वहां विकास के कार्यों को तेज गति से संचालित करने का ढिंढोरा पीटा जाता है. लेकिन लातेहार के सुदूर क्षेत्रों में ऐसी कोई सरकारी महकमे की प्रतिबद्धता दिखाई नहीं देती  है. वर्ष 2014 के आम चुनाव के पहले कांग्रेस के शासन काल में सरयू एक्शन प्लान, सारंडा एक्शन प्लान पर खूब सरकारी बैठकें की गयी. मोटे-मोटे दस्तावेज तैयार किये गये लेकिन जमीन पर कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता. वहीं  मोदी और रघुवर सरकार के द्वारा भी नक्सलवाद समाप्त करने और नक्सल प्रभावित इलाके में विकास कार्य का गंगा बहाने के दावे किये जाते रहे. लेकिन हकीकत में इन क्षेत्रों में  विकास आज भी  कोसों दूर है

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अम्बवाटीकर के 70 आदिम जनजाति परिवार आंगनबाड़ी और स्कूली शिक्षा से वंचित

गणेशपुर पंचायत के अम्बवाटीकर के कटिया और चुड़रवा टोले में करीब 70 आदिम जनजाति परहिया परिवार रहते हैं. दोनों टोले में रहने वाले बच्चे आंगनबाड़ी और स्कूली शिक्षा से पूर्णत: वंचित हैं. कारण यह है कि कटिया टोले में जो प्राथमिक विद्यालय था, उसे रघुवर सरकार के हालिया फैसले के अनुसार जोबे गाँव में अवस्थित विद्यालय के साथ विलय कर दिया गया  है. कटिया और जोबे के बीच की दूरी करीब 3 किमी है और रास्ता घने जंगल से होकर जाता है. इस जंगली रास्ते से कोई भी अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय भेजने का जोखिम नहीं उठा सकता. आंगनबाड़ी तो इस टोले में है ही नहीं. इधर चुड़रवा टोले में भी न स्कूल है न आंगनबाड़ी. स्कूली शिक्षा के लिए यहाँ के बच्चों को 2 किमी दूर अम्बवाटीकर जाना पड़ेगा. इस रास्ते में एक तो बच्चे इतनी दूरी तय करने में असमर्थ हैं, दूसरा एक बड़ी पहाड़ी नदी है, बरसात में यह पूरे उफान पर रहता है. ऐसे में कौन अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहेंगे.दोनों टोलों के लिए बिजली पहुँचना आज भी किसी स्वप्न से कम नहीं है.

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डाकिया योजना का लाभ नहीं मिल रहा आदिम जनजातियों को

राज्य  सरकार ने अप्रैल 2017 से राज्य की आदिम जनजातियों को उनके घरों तक 35 किलो अनाज पहुंचाने के उद्देश्य से डाकिया योजना प्रारंभ की. लेकिन संपूर्ण लातेहार जिले के आदिम जनजाति परिवारों को योजना के प्रारंभ से अब तक इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है और न ही 35 किलो के बन्द पैकेट में खाद्यान्न वितरण किया  जा रहा है. अम्बवाटीकर के परहिया परिवारों का मुफ्त खाद्यान्न के नाम पर जमकर आर्थिक शोषण हो रहा है. हैरान करने वाली बात ये है कि यहाँ के राशन लाभुकों को अपने प्रखण्ड बरवाडीह से नहीं बल्कि गाँव से 70 किमी दूर गारू प्रखण्ड के कारवाई गाव राशन लेने के लिए जाना पड़ता है.

इसके लिए प्रत्येक महीना ये लोग गाड़ी रिजर्व करके जाते हैं. अम्बवाटीकर से लाभर नाका होकर गारू और कारवाई जाना पड़ता है. खाद्यान्न लाने के एवज में प्रत्येक लाभुक को 2  रुपये प्रति किलो गाड़ी वाले को देना पड़ता है. इस प्रकार हरेक महीना परहिया परिवारों को साढ़े चार हजार रुपये चुकाना पड़ता है. जबकि सरकार मुफ्त खाद्यान्न मुहैया कराने का दावा करती है.   लाभुकों को 28 से 30 किलो ही राशन वितरित किया जा रहा है. सरकारी रिकार्ड के अनुसार बरवाडीह प्के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी सह एमओ हआदिम जनजातियों को दिये जाने वाले खाद्यान्न के लिए सीधे तौर पर जिम्मेवार हैं.

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इलाके के लोग वन उपज पर जिंदा है

केन्द्र सरकार द्वारा 10 मार्च 2019 को जारी भारतीय वन अधिनियम संशोधन प्रस्ताव  इस सुदूर क्षेत्र में अघोषित रूप से वन विभाग द्वारा लागू  किया जा चुका है. जिसका सीधा असर बरवाडीह इलाके के वनों पर आश्रित गरीब परिवारों के जीविकापार्जन पर पड़ रहा है.इस वर्ष वन विभाग ने बीड़ी पत्ता तोड़ने और उसके खरीद-विक्री पर पूर्णत: रोक लगा दी थी. आदिम जनजातियों व अन्य परिवारों की महिलाओं को बीड़ी पत्ता तोड़कर उसकी विक्री से होने वाली आय से पूरे बरसात के खर्चे के लिए चिन्ता नहीं करनी पड़ती थी.  औसतन प्रत्येक परिवार बीड़ी पत्ता बेचकर हरेक साल 3000 से 7000 रुपये तक आय अर्जित कर बरसात के लिए सुरक्षित रखते थे. जिसे बीमार होने पर दवाईयाँ और अन्य जरूरत के सभी सामान आसानी से खरीद पाते थे. क्षेत्र की महिलाओं को अभी से चिन्ता सता रही है कि इस वर्ष बरसात में कैसे गुजारा होगा.

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