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IL&FS संकट : 1,500 नॉन-बैंकिंग फाइनैंशल कंपनियों के रद्द हो सकते हैं लाइसेंस, झारखंड पर भी पड़ेगा असर

IL&FS के खस्ताहाल होने का असर

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New Delhi : देश की अर्थव्यवस्था उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है. एसे में देश के वित्तीय सेक्टर को एक और बड़े झटके का सामना करना पड़ सकता है. देश की बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंसिंग और कंस्ट्रक्शन कंपनी इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनैंसिंग एंड लीजिंग सर्विसेज लि. (IL&FS) ने पूरे नॉन-बैंकिंग सेक्टर में भूचाल ला दिया है. यह कंपनी पिछले कुछ हफ्तों में कर्ज अदायगी में असफल रही है. अब इंडस्ट्री के अधिकारियों एवं एक्सपर्ट्स का कहना है कि रेग्युलेटर्स 1,500 छोटी-छोटी नॉन-बैंकिंग फाइनैंशल कंपनियों के लाइसेंस कैंसल कर सकते हैं क्योंकि इनके पास पर्याप्त पूंजी नहीं है. इसका असर झारखंड पर भी पड़ सकता है. झारखंड में भी कई नॉन बिंकंग कंपनियां काम कर रही हैं, जो मानकों को पूरा नहीं करती हैं. इसके साथ ही अब नॉन-बैकिंग फाइनैंशल कंपनियों के नये आवेदन की मंजूरी में भी मुश्किलें आएंगी. रिजर्व बैंक आफ इंडिया (अरबीआइ) नॉन-बैंकिंग फाइनैंशल कंपनियों के लिए नियम कड़े कर रहा है. उसने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

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सेक्टर की कंपनियों की संख्या घट सकती हैं

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दरअसल, पिछले शुक्रवार को एक बड़े फंड मैनेजर ने होम लोन प्रदाता दीवान हाउसिंग फाइनैंस के शॉर्ट टर्म बॉन्ड्स को बड़े डिस्काउंट पर बेच दिया. इससे नगदी संकट की समस्या बढ़ने का डर पैदा हो गया है. आरबीआइ के पूर्व डेप्युटी गवर्नर और अब बंधन बैंक लि. के नॉन-एग्जिक्युटिव चेयरमैन हारुन राशिद खान ने कहा कि जिस तरह से चीजों से पर्दा उठ रहा है, वह निश्चित रूप से चिंता का सबब है और इस सेक्टर की कंपनियों की संख्या घट सकती हैं. खान ने आगे कहा कि कुल मिलाकर बात यह है कि उन्हें अपने ऐसेट-लाइबिलिटी मिसमैच (पूंजी और कर्ज में भारी अंतर) पर ध्यान देना होगा. उन्होंने यह बात इस संदर्भ में कही कि कुछ कंपनियों ने लोन छोटी अवधि के लिए लिए थे जबकि उन्हें राजस्व की जरूरत लंबे समय तक के लिए है.

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11 हजार 400 नॉन-बैंकिंग फाइनैंशल कंपनियां संदेह के घेरे में

ऐसे में अब पूरा ध्यान गांवों और कस्बों में कर्ज देनेवाली हजारों छोटी-छोटी कंपनियों पर चला गया है. अभी 11 हजार 400 नॉन-बैंकिंग फाइनैंशल कंपनियां संदेह के घेरे में हैं जिनका कुल बैलेंस शीट 22.1 लाख करोड़ रुपये का है. इन पर बैंकों के मुकाबले बहुत कम कानूनी नियंत्रण है. इन कंपनियों के लगातार नए निवेशक मिल रहे हैं. नॉन-बैंकिंग फाइनैंशल कंपनियों के लोन बुक्स बैंकों के मुकाबले दोगुनी गति से बढ़ी है और इनमें बड़ी-बड़ी कंपनियों, मसलन IL&FS, को टॉप क्रेडिट रेटिंग्स भी मिलती रही. अब इन क्रेडिट रेटिंग्स भी सवालों के घेरे में है.

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