
Girish Malviya
कोई मुझसे पूछता है कि बताइये नोटबंदी के बाद मुझे क्या नुकसान हुआ? तो मैं उससे एक ही बात पूछता हूं कि आप ही बताइये कि आप 2016 के पहले अपने बचत खाते में जितनी रकम डाल रहे थे क्या आप आज उतनी ही रकम अपने बचत खाते में डाल पा रहे हैं?
सरकारी आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं घरेलू बचत 20 साल में सबसे कम देखी जा रही है, कोई पार्टी माने या न माने पर यह सच है कि देश में रोजगार के अवसर दिन-ब-दिन कम होते जा रहे हैं, व्यापार-उद्योग बैठ गया है.
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पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणब सेन ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा, “दरअसल, नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद गैर-कॉरपोरेट सेक्टर प्रभावित हुआ, और वह दिखाई दे रहा है.”
उन्होंने कहा कि आर्थिक संकेतकों में आगे और गिरावट आएगी, क्योंकि गैर-कॉरपोरेट सेक्टर ही भारत में ज्यादातर रोजगार पैदा करता है, और यही सेक्टर सर्वाधिक प्रभावित हुआ है.
कल ऑटोमोबाइल कंपनियों के संगठन सियाम की ओर से आई रिपोर्ट बताती है कि यात्री वाहनों की बिक्री बढ़ने की रफ्तार 5 साल में सबसे कम हुई है ओर दोपहिया की बिक्री भी 3 साल की सबसे कम रफ्तार से बढ़ी.
स्कूटर की बात करें तो 13 साल में यह पहली बार है जब स्कूटर्स की बिक्री में ऐसी गिरावट दर्ज की गई है. मार्च में कारों की बिक्री भी पिछले साल के मार्च की तुलना में घट गई है.
दुपहिया वाहनों की बिक्री की ग्रोथ में कमी आना बताता है कि एक आम आदमी अपनी बचत से 50 हजार की मोटरसाइकिल/स्कूटर खरीदने से अब झिझक रहा है.
यह आंकड़ा बहुत सीग्निफिकेंट है. यह आंकड़ा बता रहा है कि आम आदमी की बचत तो कम हुई ही है, लेकिन वह आने वाले दिनो को लेकर भी कोई खास आशान्वित नहीं है.
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इस वित्तवर्ष में RBI ने जीडीपी के 7.4% रहने की बात कही थी, लेकिन अब वह खुद मान रहा है कि वित्त वर्ष 2019-20 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 7.2% रहने का अनुमान है.
रेटिंग एजेंसी फिच ने मार्च महीने में जारी अपनी रिपोर्ट में इस वित्त वर्ष के दौरान 6.8 फीसदी ही जीडीपी बढ़त का अनुमान लगाया है, जो पहले 7 फीसदी था.
फिच ने तो लगातार 13वें साल भारत की रेटिंग अपग्रेड करने से इनकार कर दिया. एजेंसी ने भारत की सॉवरेन रेटिंग स्टेबल आउटलुक के साथ ‘बीबीबी माइनस’ बरकरार रखी है. एक तरह से यह भारत सरकार के लिए बड़ा झटका है, लेकिन यह सब सच्चाई कौन सा मीडिया दिखा रहा है.
औद्योगिक उत्पादन की दर सुस्त होकर 1.7 फीसदी पर पहुंच गई है. पिछले साल के मुकाबले यह बहुत बड़ी गिरावट है. अक्टूबर-दिसंबर 2018 में ग्रोथ कम रहने की मुख्य वजह घरेलू और निर्यात मांग में कमी है. कंज्यूमर खर्च जीडीपी का लगभग 57% है. इसकी ग्रोथ घटकर 8.4% रह गई.
आप ही बताइए कि भारत में अक्टूबर से दिसंबर का समय त्योहारी सीजन कहलाता है, व्यापारियों के लिए अपने माल बेचने का समय होता है. इसी तिमाही में कंज्यूमर खर्च घट रहा है तो खुद सोचिए कि अर्थव्यवस्था बैठ रही है कि नहीं बैठ रही है? परिणाम यह है कि आम आदमी की बचत घट रही है. लेकिन राष्ट्रवाद के अंधे शोर में हमें यह सब याद नहीं आ रहा है.
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(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)




