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राजनीतिक साख को कमजोर कर रहा है विचारों की दरिद्रता

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Faisal Anurag

चुनाव के ठीक पहले दलबदल और पार्टियों की आंतरिक लड़ाई से यह जाहिर होता है कि पार्टियां और नेता किस तरह विचारहीनता के शिकार हो रहे हैं. हालात यह बन गए हैं कि राजनीति में किसी भी नेता के संदर्भ में विश्वास के साथ यह नहीं कह जा सकता है कि वह अपने विचारों के साथ धोखा नहीं करेगा और मात्र टिकट के लिए दलबदल नहीं करेगा.

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इस कारण समाज के वंचित और उत्पीड़न के शिकार समूहों के संघर्षों और उनकी राजनीतिक पहलकदी प्रभावित होती है. चुनाव का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण लोकतंत्र के मूल्यों और भारत के संविधान की अवमानना की तरह होता है. लेकिन चुनावी जीत के लिए हरतरह के जोड़तोड़ और मुद्दों के कारण 2019 की भारतीय राजनीति दुनियाभर में साख खो रही है.

पिछले कुछ सालों में भारत में हुए चुनावों की त्रासदी यह है कि वह आर्थिक और सामाजिक बदलाव के सवालों से परे हो गयी है. इस कारण राजनीतिक विमर्श का स्तर भी बेहद नीचे चला गया है.

जमीन के स्तर पर तमाम तरह की तकलीफों को झेल रहे आवाम को एक ऐसे जाति वोट बैंक की  तरह बदलने का प्रयास किया जा रहा है, जहां वह प्रगति और विकास के वास्तविक सवालों को उठाए ही नहीं. कहा जा सकता है कि विमश्रहीन चुनावी प्रक्रिया को विकसित करने का प्रयास जिस तरह सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है, उसका परिणाम यह हो रहा है कि आवाम में भावनात्मक क सवाल ही प्रमुख होते जा रहे हैं.

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लोकतंत्र की कामयाबी की राह में यह ऐसी बाधा बन रहा है, जिसमें कभी भी क्रूर तानाशाही पैदा की जा सकती है. भारत में चुनाव पहले भी व्यक्ति प्रधान हुए हैं, लेकिन उसमें विचारों की भी महता रही है.

विचारों को आगे ले जाने की प्रक्रिया कभी इतनी कमजोर नहीं है जो इस आमचुनाव के प्रचार अभियान में दिख रहा है. सत्तारूढ दल की पूरी कोशिश है कि वह किसी भी तरह आर्थिक और सामाजिक न्याय के संदर्भ को बहस का हिस्सा नहीं बनने दे.

आमचुनाव का एक दुखद पहलू यह है कि मीडिया लोकतांत्रिक बहसों की स्वतंत्रता को बाधित कर प्रचार अभियान का हिस्सा बन गया है. जैसा कि कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि यह अवहेलना ही  अवसर है कि अधिकांश मीडिया जरूरी सवालों को जानबूझ कर हाशिए पर ले गया है और वह सत्ता पक्ष से सवाल पूछने के बजाए हर समस्या के लिए विपक्ष पर ही हमलावर है.

ग्राउंड रिपोर्ट कर आमजन के विचारों को लोकतंत्र का हिस्सा बनाने का जो प्रयास होता था, वह गायब है. प्रायोजित फीड और कंटेट का जिस तरह वर्चस्व दिख रहा है इससे साफ जाहिर है कि आमजन के विचार के लिए अब लोकतंत्र में स्थान सीमित कर दिया गया है.

इस आम चुनाव में मीडिया न तो आर्थिक सवालों पर बहस कर रहा है और ना ही वह भारत के भविष्य की नीतियों पर यह अनजाने में नहीं किया जा रहा है.

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2014 में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ तोड़मरोड़ शुरू की गयी थी, इस बार ऐसा लगता है कि इतिहास के सारे तथ्य ही उलट दिए गए हैं, वह कराह रहा है. सोशल मीडिया की इसमें बड़ी भूमिका है.

पहले राजनीतिक दल प्रतिबद्ध लेकिन विचारशील कार्यकर्ताओं का समूह बनाते थे. अब तो सत्तापक्ष ने भक्त बनाने की ही प्रवृति को राजनीति में आम कर दिया है. इस दौर में व्यक्ति की आलोचना देश की आलोचना ही नहीं बल्कि देशद्रोह में बदल गया है.

जब इमरजेंसी के समय देवकांत बरूआ ने इंदिरा इज इंडिया कहा था, तब कांग्रेस ने भी उसकी आलोचना की थी, लेकिन अब तो एक मुख्यमंत्री भारत की सेना तक को मोदी की सेना बता रहे हैं और इसपर चुनाव आयोग विचित्र खामोशी अख्तियार किए हुए है.

हालांकि सेना के कई पूर्व अधिकरियों ने योगी के इस कथन का जोरदार विरोध किया है. मोदी सरकार के ही एक मंत्री पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने भी इसकी कड़ी आलोचना की है और कहा है कि सेना किसी नेता या व्यक्ति की नहीं है, वह देश की सेना है और जो सेना को व्यक्ति की सेना बताता है वह देशद्रोह कर रहा है.

एक मजबूत लोकतांत्रिक विमर्श वाला समाज इस तरह के बयानों और चुनाव अभियान को स्वीकार नहीं कर सकता है.

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2014 के बाद से ही इस तरह के हालात ज्यादा तेजी से विकसित हुए हैं. भारत के चुनावी इतिहास ने उस दौर को भी देखा है, जब गरीब गुरबों और वंचित समूहों के सवाल ही विमर्श के विषय होते थे.

भारत में तो आज के दौर में तो यह कल्पना ही किया जा सकता है कि चुनाव में किसी भी दल की हारजीत कभी विदेश नीति के सवाल पर भी हो सकती है. दूसरे महायुद्ध के बाद इंगलैंड में  जीत के बाद भी चर्चिल की पार्टी चुनाव हार गयी. इसका कारण नीतिगत सवाल भी था और उपनिवेशवाद के विमर्श भी थे.

भारत में जंग के माहौल को चुनावी आधार बनाकर जीत को निश्चित करने की प्रक्रिया होती है, इसका प्रमुख कारण तो वोटर की चेतना का लोकतांत्रिक स्तर ही है, जो विचारों से अक्सर दूर है.

राजनीतिक दलों और नेताओं को भी पता है कि भारत के ज्यादातर वोटर अब भी विचार की तुलना में भावनात्मक सवालों पर बहक जाते हैं. दलबदल की विभत्स होती प्रवृति इस कारण ज्यादा परवान चढ रही है.

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