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मुस्लिम समाज- आतंकवाद, राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता के नाम पर डराने की राजनीति पर चल रही है भाजपा

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Dr Mahfooz Aalam

डरने वाले लोग बहुत जल्द एक दूसरे के मित्र बन जाते हैं. और अगर डराने वाला शक्तिशाली हो तो यह मंत्र और भी कारगर साबित होता है. आज देश में यही हो रहा है. चुनावी सभाओं में देश के नागरिकों को देश के लोगों से ही डराया जा रहा है.

भारतीय जनता पार्टी चुनावी रैलियों में आतंकवाद, राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता, हिन्दुत्व, पाकिस्तान, बांग्लादेश मुसलमान, अल्पसंख्यक को ही अपना मुद्दा बना रही है. कुल मिलाकर देखा जाये तो भाजपा 2014 के चुनाव में जहां अच्छे दिन की उम्मीदें जगाने में लगी हुई थी, वहां 2019 के चुनाव में लोगों में डर जगा रही है.

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वह परोक्ष रूप से यह कहना चाह रही है कि  यदि हम को नहीं चुना गया तो देश में आतंकवाद बढ़ जायेगा, अल्पसंख्यकों का बोलबाला हो जायेगा. ऐसा इसलिए कहा जा रहा है ताकि बुनियादी  मुद्दे गौण हो जायें. वह भावनाओं की लहर पैदा कर फिर अपनी जीत का जश्न मनाये. भाजपा ने अपने  2014 के घोषणा पत्र में महंगाई, बेरोजगारी, स्वरोजगार, भ्रष्टाचार, कालाधन पर बातें की थी.

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य दुर्बल लोगों के सशक्तिकरण और महिलाओं की सुरक्षा की घोषणा की थी. इन पर कितना काम हुआ, देश अच्छी तरह जानता है. अर्थ व्यवस्था में गिरावट आयी है. किसानों का बुरा हाल है,  राफेल सौदा और माल्या व नीरव मोदी के कारनामे भ्रष्टाचार की पोल खोल रहे हैं.

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गत सप्ताह राफेल सौदा पर एस विजयन की तमिल में लिखी गयी एक किताब का ” द हिन्दू ” समाचारपत्र के  सम्पादक एन राम के  द्वारा विमोचन किया गया है. जिसका अंग्रेजी तर्जुमा है ” द राफेल स्कैम दैट इज़ रौकिंग द कंट्री.”  इसे पढ़कर मौजूदा सरकार की खोखली नीतियों को समझा जा सकता है. आतंकवादी घटनाएं भी कम नहीं हुई हैं.

गत 5 वर्ष में घाटी में आतंकवादी घटनाएं तीन गुणा बढ़ी हैं. सिर्फ वर्ष 2018 में घाटी में 614 आतंकवादी घटनाएं हुई हैं. यह एक दहाई में सबसे अधिक है. कोई शुतरमुर्ग बन कर हकीकत से आंख चुराये तो उसे क्या कहा जा सकता है.

दूसरी ओर विपक्षी पार्टियां भी भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस का नाम लेकर मुसलमानों को भयभीत करती रहती हैं. लेकिन उन्होंने कथित तौर पर अपने शासनकाल में मुसलमानों के लिए इतना सारा काम किया है कि यह समाज आज अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मुकाबले काफी नीचे आ गया है!

सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा मुसलमान, जो दो जून की रोटी के जुगाड़ में परेशान रहता है, किसी का क्या बिगाड़ सकता है. और दूसरा उससे क्या छीन सकता है, सिवाय एक जान के. यह अच्छा हुआ कि मुस्लिम नेता कहे जाने वाले लोगों ने मतदान के लिए अबतक कोई  फतवा जारी नहीं किया है.

शाही इमाम बुखारी और दारूल उलूम देवबंद ने इस बार अपने आपको इससे अबतक दूर रखा है. ऐसे फतवे प्रायः वोट के  ध्रुवीकरण में सहायक बनते हैं. यह भी वास्तविकता है  कि किसी  को बहुत दिनों तक डरा कर  नहीं रखा जा सकता है, जब  सच्चाई सामने आती है तो  डराने  वाला न घर का  होता है न घाट का.

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