
Manish Singh Reborn
शानदार, गुड लुकिंग गधे, जिन्हें अंग्रेजी में वाइल्ड आस कहा जाता है.
फिलहाल “नो पॉलिटिक्स, ओनली वाइल्डलाइफ” वाली इस पोस्ट में बात जंगली गधों की, जिनका राज एक वक्त पाकिस्तान के सिंध, राजस्थान, अफगानिस्तान जैसे अखण्ड भारत के विभिन्न इलाक़ों तक फैला था. मगर वक्त के साथ इनका इलाका सिकुड़ गया और अंतिम ठिकाना गुजरात मे कच्छ के रन में था.
जंगली गधों का वैज्ञानिक नाम “इक्वस हेमियोनस-खुर” होता है. नाम किसी रोमन राजा से कम नहीं, और शान भी उससे कम नहीं. कम लोग जानते है कि ये गधा जब दौड़ने पर आए, तो घोड़ो को भी मात कर सकता है. इसकी स्पीड 60 से 70 प्रति घंटा तक जा सकती है. इस तरह वह सामान्य गति से चल रही कार को भी पीछे छोड़ सकता है.
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जंगली गधों की भूख तेज होती है, सुबह से शाम तक वे चरते हैं. हरी झाड़ी, पत्ते, फल सब कुछ चट कर जाते हैं. मगर इन्हें मिट्टी का खारापन पसंद है. मीठेपन से इनका गुजारा नहीं. अब यह समझना कठिन है ये खारेपन में पनपते हैं, या खारापन इन्हें पनपाता है.
गधे के शिकार के किस्से कम हैं, पर अकबरनामा में सम्राट अकबर द्वारा जंगली गधों के शिकार का चित्र मिलता है. इसके बाद तुजके जहांगीरी में जहांगीर द्वारा भी जंगली गधों के शिकार का वर्णन है. ऐसे में मुगलों के प्रति जंगली गधों में गुस्से और नफरत का भाव होना लाजिमी है.
गुजरात के गधों में, सुर्रा नाम की बीमारी से बड़ी मात्रा में मारे जाने का इतिहास है. यह बीमारी मक्खियों से फैलती है. मक्खियों के कारण, एक्सटिंशन याने विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गये गुजराती गधों को बचाना, वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन में भारत की अनुपम उपलब्धि है.
1960 के दशक में, जब भारत मे नेहरू युग था, गुजरात मे इन गधों की संख्या में गिरावट नोटिस की गयी थी.1969 में हुई गधा गणना में इनकी संख्या 600 से भी कम मिली. ज्यादातर इनकी मौत,कच्छ के रन में भोज्य घास भूमि घटने और पानी की कमी से होना शुरू हुआ.
इंदिरा काल मे, और इसके बाद जंगली गधों के संरक्षण के भरपूर प्रयास हुए. इनके चारे और पानी का प्रबंध हुआ. इमरजेंसी और उसके बाद के दौर याने 1976-77 में गुजरात मे जंगली गधों की संख्या में आशातीत वृद्धि पायी गयी.
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इसके बाद जंगली गधे गुजरात के दूसरे जिलों में भी दिखने शुरू हो गये. आज गुजरात के जंगली गधे, आखिरकार खतरे से बाहर आ गये. अब ये गुजरात से बाहर दूसरे प्रदेशों में भी दिखाई दे जाते हैं.
युवावस्था में आम तौर पर अलग रहने वाले ये जंगली गधे, सामान्यतः बाकी की जिंदगी संघ में, याने झुंड में रहने के आदी होते है. इनके पास जाना, जानलेवा और खतरनाक हो सकता है. इसलिए कि मानवीय सामीप्य में ये हिंसक होते है.
इसके लिए यह अवश्य जान लें, की इस जीन पूल के दूसरी वेरायटी अफ्रीका, मंगोलिया और सीरिया में पायी जाती है. न जानने वालों को यह भी बताना उचित होगा कि मंगोलिया चंगेज खान के लिए प्रसिद्ध है. सीरिया का खुद गूगल कर लें. रन तो वीरान है ही. कुल मिलाकर गधों को घोड़ो की तरह शांत, या सामान्य गधों की तरह उपयोगी समझना बड़ी भूल हो सकती है. ये दिखते वैसे है, मगर हैं नहीं.
हालिया बरसों में गुजरात टूरिज्म ने अपने टूर वीडियोज में रन स्थित वाइल्ड आस सेन्चुरी को काफी प्रमोट किया है. गधों को देखने के लिए वहां जाना एक अच्छा विकल्प है, बनिस्पत उन्हें अपने यहां बुलाने के. आप टीवी पर देखकर दूर से नमस्ते भी कर सकते हैं.
फिर भी उनकी ताकत, एकता, संगठन और जिजीविषा अपने आप मे अतुल्य है. इसलिए आप कह सकते हैं
गधे हों, तो गुजरात के. वरना न हों ..
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(डिस्क्लेमर : Manish Singh Reborn का यह आलेख उनके फेसबुक वाल से लिया गया है. इसमें व्यक्त विचारों से न्यूजविंग का कोई लेनादेना नहीं है)




