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खिलाड़ियों पर ध्यान दे सरकार, राज्य में कोच से लेकर आधारभूत सुविधाओं की कमी : सलीमा टेटे

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  • अनुशासन में रहकर खेलें खिलाड़ी, अनुभवी खिलाड़ियों की बात मानें
  • लकड़ी के डंडे से किया अभ्यास, आर्थिक तंगी के कारण पिता नहीं खरीद पाये थे हॉकी स्टिक

Chhaya

Ranchi : राज्य के खिलाड़ियों में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन सही सुविधाएं नहीं मिल पाने और उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण खिलाड़ी आगे नहीं बढ़ पाते. सरकार को खिलाड़ियों पर ध्यान देना चाहिए. यह कहना है यूथ ओलिंपिक 2018 में जूनियर भारतीय हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व कर चुकी सलीमा टेटे का. यूथ ओलिंपिक 2018 का आयोजन अर्जेंटीना में हुआ था, जिसमें सिमडेगा के बरकीछापर गांव की रहनेवाली 17 वर्षीय सलीमा ने अपनी कप्तानी के बल पर भारतीय टीम को रजत पदक दिलाया. न्यूज विंग के साथ अपने अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि जब दूसरी राष्ट्रीय टीमों के साथ मैच होता है, तब पता चलता है कि हम में कितनी खामियां हैं. दूसरे देशों के खिलाड़ी काफी स्फूर्ति से खेलते हैं. उनको पकड़ पाना काफी मुश्किल लगता है. दूसरी ओर उनमें काफी अनुशासन भी है.

खिलाड़ियों पर ध्यान दे सरकार, राज्य में कोच से लेकर आधारभूत सुविधाओं की कमी : सलीमा टेटे

तालमेल बैठाना था मुश्किल

बातचीत के दौरान सलीमा ने बताया कि वह पहली बार विदेश गयी थीं, वह भी भारतीय टीम के कप्तान के रूप में. ऐसे में एक हिचक तो थी ही, साथ ही जोश भी था कि भारत का नाम रोशन करना है. उन्होंने कहा कि विदेशी खिलाड़ियों के साथ तालमेल बैठाना काफी मुश्किल था. विशेष परेशानी बोलचाल को लेकर होती थी.

2020 सीनियर टीम के लिए हुई हैं चयनित

सलीमा टेटे का चयन 2020 में आयोजित होनेवाले यूथ ओलिंपिक के लिए किया गया है, जहां वह सीनियर हॉकी टीम के लिए चयनित की गयी हैं. इस ओलिंपिक का आयेाजन जापान में किया जायेगा. सीनियर टीम में सलीमा सबसे कम उम्र की खिलाड़ी रहेंगी.

राज्य में खिलाड़ियों के समक्ष हैं काफी समस्याएं

राज्यस्तरीय खिलाड़ियों के बारे में बताते हुए सलीमा ने कहा कि खिलाड़ी प्रतिभावान तो हैं, लेकिन समस्याएं काफी हैं. नेशनल लेवल पर खेलने से जानकारी होती है कि दूसरे राज्यों के खिलाड़ियों की स्थिति झारखंड से काफी अच्छी है. महत्वपूर्ण समस्या बताते हुए उन्होंने कहा कि डायट सबसे बड़ी समस्या है. यहां खिलाड़ियों को उचित भोजन नहीं मिल पाता. जो भी घर में मिल जाये, उसी से खिलाड़ी काम चलाते हैं. ऐसे में इस ओर काफी ध्यान देने की जरूरत है.

कोच की है कमी

उन्होंने कहा कि राज्य में हॉकी कोचों की काफी कमी है. सिर्फ सिमडेगा की बात करते हुए उन्होंने कहा कि जिला में सिर्फ एक हॉकी कोच है. ऐसे में उनकी अनुपस्थिति में खिलाड़ियों को खुद से अभ्यास करना पड़ता है. ऐसे में खिलाड़ियों का समय बर्बाद होता है.

लकड़ी के डंडे से खेलते-खेलते तय किया इंटरनेशनल खिलाड़ी बनने तक का सफर

अपने शुरुआती दिनों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि 10 साल की उम्र से हॉकी खेलना शुरू किया. पेशे  से उनके पिता किसान हैं. ऐसे में हॉकी स्टिक की जगह वह लकड़ी के डंडे से हॉकी खेला करती थीं. डंडे से खेलते-खेलते ही सलीमा का चयन स्कूल टीम के लिए हुआ. उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई बरकीछापरा स्थित तुमडेगी स्कूल से पूरी की, जहां से उन्हें इंटर स्कूल हॉकी प्रतियोगिता में शामिल होने का अवसर मिला. इसके बाद उनका चयन जिलास्तरीय और फिर राज्यस्तरीय टीमों में किया गया. वर्तमान में सलीमा सिमडेगा कॉलेज में बीए पार्ट वन की छात्रा हैं.

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