
NewDelhi : रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार देश के 21 सरकारी बैंकों ने 3,16,500 करोड़ रुपये का कर्ज अप्रैल 2014 से अप्रैल 2018 के बीच की अवधि में राइट-ऑफ कर दिया. इस क्रम में सरकारी बैंक महज 44,900 रुपये ही वसूल पाये हैं. आकलन करें तो बट्टे खाते (राइट-ऑफ)में डाली गयी कुल राशि की 14 फीसदी से भी यह कम राशि है. इस पर नजर डालें तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बैड लोन्स की जितनी राशि राइट-ऑफ की है, वह वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए देश के स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के बजटीय खर्च (1.38 लाख करोड़ ) के दोगुने से भी ज्यादा है. अप्रैल 2014-अप्रैल 2018 में 21 बैंकों ने जितनी रकम राइट-ऑफ की है, वह 2014 तक राइट-ऑफ की गयी राशि से 166 प्रतिशत ज्यादा है.
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बैंकिंग सेक्टर के कुल एनपीए के 86 प्रतिशत बैड लोन्स सरकारी बैंकों द्वारा दिये गये
बता दें कि रिजर्व बैंक द्वारा संसद की वित्तीय समिति को दिये गये जवाब में जो डेटा दिया है, उसके अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में मार्च 2018 के अंत तक वसूली की दर 14.2 प्रतिशत रही. यह निजी बैंकों के पांच प्रतिशत की दर से तीन गुना ज्यादा है. जान लें कि बैंकिंग परिसंपत्तियों का लगभग 70 प्रतिशत 21 सरकारी बैंकों के पास है. देश के बैंकिंग सेक्टर के कुल एनपीए का 86 प्रतिशत बैड लोन्स इन्हीं बैंकों द्वारा दिया गया है. हालांकि सरकार बैंकिंग संकट को दूर करने का प्रयास कर रही है, पर बैड लोन्स ने संकट बढ़ा दिया है. जानकारी के अनुसार एनपीए में 2014 तक वृद्धि नहीं हो रही थी, लेकिन 2015-16 के बाद इसमें अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज की गयी. अर्थशास्त्रियों के अनुसार क्योंकि 2014 में आरबीआई ने एसेट क्वालिटी रिव्यू शुरू किया, जिसमें बैंकों के कई कर्ज एनपीए माने गये. इससे पूर्व इसे बैंक मानक संपत्ति माना जाता था.
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2017 के अंत तक एनपीए लगभग 7.70 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया
लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये का बैड लोन 2004 और 2014 के बीच राइट-ऑफ कर दिया गया. 2013 और 2015 के 90 हजार करोड़ से ज्यादा राशि बट्टे खाते में डाली गयी. साथ ही 2014-15 में 4.62 प्रतिशत रहा एनपीए 2015-16 में बढ़कर 7.79 प्रतिशत हो गया. इस क्रम में दिसंबर 2017 तक यह 10.41 प्रतिशत पर पहुंच गया. 2017 के अंत तक इन बैंकों का एनपीए लगभग 7.70 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी ने कहा कि कर्ज को राइट-ऑफ करना बैंकों द्वारा अपनी बैंलेंस शीट सुधारने की एक व्यापारिक कवायद है.




