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अच्छे गीत हमेशा याद रखे और गुनगुनाए जाते हैं

राहत इंदौरी के जन्मदिन पर दो वर्ष पूर्व उनसे विशेष बातचीत के अंश

Naveen Sharma

Ranchi: हिंदी सिनेमा के बेहतरीन गीतों में ऊर्दू के मशहूर शायरों का बहुत बड़ा योगदान रहा है. साहिर लुधियानवी, शकील बदायुनी, मजरूह सुल्तानपुरी, शहरयार आदि प्रमुख नाम हैं. इसी कड़ी में राहत इंदौरी भी शुमार हैं. इन्होंने प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा की मिशन कश्मीर और करीब फिल्म के लिए गीत लिखें हैं. वर्ष 2018 के मई महीने में मुझे राहत साहब मिलने का सौभाग्य मिला था. उनसे सिनेमा के वर्तमान हालत, गीतों पर काफी देर बात हुई. उन्होंने अन्य मुद्दों पर भी बेबाकी से बात रखी.बहुत प्यार से मिले.उन्होंने कई फिल्मों में यादगार गीत लिखे हैं. मैं अक्सर करीब फिल्म के ये गीत गुनगुनाता हूं

चुरा लो दिल मेरा सनम, बना लो ना अपना सनम
और
चोरी चोरी जब नजरें मिलीं .

हिंदी फिल्मों के गीतों से ‘शब्द’ गायब हो रहे हैं

राहत कहते हैं कि हिंदी फिल्मों के गीतों से ‘शब्द’ गायब हो चुके हैं और यही वजह है कि शायर और शायरी फिल्म इंडस्ट्री से दूर होती जा रही है. अब फिल्मों में ढिंक चिका, ढिंक चिका… जैसे गानों की डिमांड है, ऐसे ही गाने लिखे जा रहे हैं और गाये जा रहे हैं और इसमें शायर का कोई काम नहीं है, ऐसे गाने तो कोई भी लिख देगा.

राहत ने बताया कि कुछ समय पहले तक फिल्मों में गीतों के बोल और शब्दों का फिल्म निर्देशक विशेष तौर पर ध्यान रखते थे. इसके लिए वह शायरों और शायरी को ख़ास तवज्जो भी देते थे लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है. अब ज्यादातर गाने ऐसे लिखे और गाये जा रहे हैं, जिनमें भाव और शब्दों का अभाव नजर आ रहा है. हां, लाउड म्यूजिक जरूर होता है गानों में. पहले के गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं, या यूं कहें कि याद हैं.

मगर आजकल के गाने इधर से आते हैं, उधर चले जाते हैं, कोई याद नहीं रखता. यही फर्क है शब्दों की गहराई ओर भाव का. ऐसा नहीं है कि अच्छे गीतों को सुनने वाली ऑडियंस नहीं है, ऑडियंस तो वही देखेगी जो आप दिखाएंगे.

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मैंने 40 से ज्यादा फिल्मों में गीत लिखे. कई गाने हिट रहे, जो आज भी लोगों की जुबान पर हैं. अच्छे गीत हमेशा याद रखे और गुनगुनाए जाते हैं. आज भी कई गीतकार अच्छा लिख रहे हैं, जिन्हें लोग पसंद भी कर रहे हैं. उस समय लेखक, गीतकार और निर्देशक दोस्त की तरह काम करते थे.उस समय काम करने का स्टाइल ही अलग था. अब सब कुछ प्रोफेशनल हो चुका है. यही बदलाव राहत को रास नहीं आया और वो कु साल मुंबई में रहने के बाद इंदौर लौट गये.

राहत कहते हैं कि अब मुशायरों में भी कई बदलाव आ चुके हैं. अगर आज देश में 60 मुशायरे होते हैं तो उसमें से 40 ऐसे होते हैं, जिनमें दोयम दर्जे के शायर होते हैं. अब कहीं-कहीं पर शायरी तुकबंदी बन चुकी है तो कहीं पर गद्य. अब बाजारवाद का दौर है और इस दौर में मुशायरों का भी बाजारीकरण हो रहा है.

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जीवन का सफर

राहत का जन्म इंदौर में 1 जनवरी 1950 में कपड़ा मिल के कर्मचारी रफ्तुल्लाह कुरैशी और मकबूल उन निशा बेगम के यहाँ हुआ. वे उन दोनों की चौथी संतान हैं. उनकी प्रारंभिक शिक्षा नूतन स्कूल इंदौर में हुई.

उन्होंने इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से 1973 में स्नातक किया . 1975 में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया. इसके बाद 1985 में मध्य प्रदेश के मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की.

कॉलेज की फुटबॉल और हॉकी टीम के कप्तान रहे, अध्यापन किया

राहत ने शुरुवाती दौर में इंद्रकुमार कॉलेज, इंदौर में उर्दू साहित्य का अध्यापन कार्य शुरू कर दिया. उनके छात्रों के मुताबिक वह कॉलेज में सबसे अच्छे व्याख्याता थे.

फिर बीच में वो मुशायरों में बहुत व्यस्त हो गए और पूरे भारत से और विदेशों से निमंत्रण प्राप्त करना शुरू कर दिया. उनकी विशिष्ट शैली थी ,जिसने बहुत जल्दी लोगों के बीच अत्यन्त लोकप्रिय बना दिया.

वे न सिर्फ पढ़ाई में प्रवीण थे बल्कि वो खेलकूद में भी अच्छे थे,वे स्कूल और कॉलेज स्तर पर फुटबॉल और हॉकी टीम के कप्तान भी थे. वह केवल 19 वर्ष के थे जब उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में अपनी पहली शायरी सुनाई थी.

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साइनबोर्ड लिखने का काम भी किया

राहत के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी और उनको शुरुआती दिनों में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था. उन्होंने अपने ही शहर में एक साइन-चित्रकार के रूप में 10 साल से भी कम उम्र में काम करना शुरू कर दिया था. चित्रकारी उनकी रुचि के क्षेत्रों में से एक थी और बहुत जल्द ही बहुत नाम अर्जित किया था.

वह कुछ ही समय में इंदौर के व्यस्ततम साइनबोर्ड चित्रकार बन गए. क्योंकि उनकी प्रतिभा, असाधारण डिज़ाइन कौशल, शानदार रंग भावना और कल्पना की है कि और इसलिए वह प्रसिद्ध भी हैं.

यह भी एक दौर था कि ग्राहकों को राहत द्वारा चित्रित बोर्डों को पाने के लिए महीनों का इंतजार करना भी स्वीकार था. यहाँ की दुकानों के लिए किया गया पेंट कई साइनबोर्ड्स पर इंदौर में आज भी देखा जा सकता है.

चालीस फिल्मों में गीत लिखे

राहत इंदौरी ने चालीस फिल्मों में भी काम किया है. इनमें मिशन कश्मीर भी है जिसका गीत बुमरो बुमरो श्याम रंग बुमरो काफी हिट हुआ था.

इसी तरह फिल्म निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने राहत इंदौरी की शायरी का इस्तेमाल करीब फिल्म में भी किया जिसके गीत भी अच्छे बने थे. आमिर खान और अजय देवगन की इश्क़ फिल्म में भी राहत का लिखा गीत नींद चुराई तूने काफी हिट रहा था.

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