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किसानों का दर्दः लॉकडाउन में 2 रुपये भी नहीं बिक पायी भिंड़ी अब कर्ज के भरोसे धान की खेती

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लॉकडाउन में दो रूपये किलो भिंडी नहीं बिकी तो गायों को खिलाया, अब धान की खेती उधार कर्ज के भरोसे

सामान्य दिनों में व्यापारी सब्जी लेने गांव आते थे, लॉकडाउन में नहीं आ सकें, लागत तक नहीं मिला किसानों को

सब्सिडी में मिलने वाले बीज, खाद, कीटनाशक किसानों को कभी समय पर नहीं मिले

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Chhaya

Ranchi: लॉकडाउन के दौरान दस से दो रूपये किलो तक भिंडी बेची गयी. जबकि पिछले साल कम-से-कम तीस से चालीस रूपये किलो भिंडी बिकी. इस बार जब दो रूपये में भी भिंडी की बिक्री नहीं हुई, तो गायों को खेत में ही फसल चरा दी गयी. ये कहना है उन किसानों का जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान अपनी फसल को ऐसे खत्म किया. ताकि आने वाले मौसम में आगे की खेती कर सकें.

लॉकडाउन में हर वर्ग प्रभावित हुआ. खाद्यान्न को सरकार ने छूट दे रखी थी. लेकिन इन किसानों के पास इतने साधन नहीं थे कि ये अपनी फसलों को सही दाम में बेचते. राज्य में बारिश समय पर आयी है. अब किसान धान की फसल में लगे हैं. इन्हीं किसानों की परेशानी जानने की कोशिश न्यूज विंग ने की.

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तमाड़ से 12 किलोमीटर दूर पहाड़ों के बीच बसे गांव चायाडीह, उलीडीह, कोठाडीह, जोपनो गांव में. इन किसानों का कहना है कि भिंडी, टमाटर जैसी फसलों में कोई लाभ नहीं मिला. अब किसी तरह धान की खेती कर रहे. यह क्षेत्र कृषि बहुल है.

सब्जियों से मुनाफा नहीं, धान लगाना मुश्किल

चायाडीह गांव के नागेंद्र नाथ प्रमाणिक ने कहा कि उनके गांव में भिंडी की खेती सबसे अधिक होती है. जो रांची शहर समेत दूसरे जिलों और राज्यों में भी भेजी जाती है. लेकिन इस साल लागत तक नहीं मिल पाया. इन्होंने बताया कि भिंडी की खेती में लगभग 75 हजार रूपये लगाये थे. जबकि बेचा दस से दो रूपये किलो. पहले तो व्यापारी गांव आकर सब्जी ले जाते थे. लेकिन लॉकडाउन में व्यापारी सब्जी लेने नहीं आये.

नागेंद्र ने बताया कि क्षेत्र के सभी किसानों ने दो रूपये किलो भिंडी बेची. मुनाफा किसी को नहीं मिला. अन्य किसानों ने इसी तरह की समस्या बताते हुए कहा कि एक एकड़ जमीन में कम-से-कम 16 क्विंटल धान की उपज है. ट्रैक्टर से सिचांई और मजदूरी में 40 हजार तक खर्च होते हैं. एक पैकेट धान के बीज की कीमत लगभग 350 से 500 रूपये है. बीज खरीदने में ही किसानों की कमर टूट गयी है.

उधार, कर्ज, महिला समिति के भरोस खेती की जा रही है. हल जुताई कराने में एक किलोमीटर के लिये चार सौ रूपये देने होते हैं. किसानों ने कहा कि अब भी यही संशय है कि धान लगाने के बाद मुनाफा मिलेगा या नहीं. एक एकड़ जमीन में धान की पैदावार से किसानों को 20 हजार तक का मुनाफा होता है.

लॉकडाउन में एक धान क्रय केंद्र खुला, बहुत हुई पेरशानी

किसानों ने बताया कि तमाड़ प्रखंड में चार धान क्रय केंद्र है. एक भी कोल्ड स्टोरेज नहीं. अरविंद महतो, जो चायाडीह गांव के निवासी हैं और मूल रूप से कृषक हैं. बताते है कि किसान अपनी जरूरत के अनुसार धान बेचते हैं. जब भी घर की जरूरत या खेती करनी हो तो धान बेचा जाता है. लॉकडाउन में बिचैलिये गांव आये नहीं. ऐसे में धान क्रय केंद्र में धान बेचने जाना पड़ा.

गांव से धान क्रय केंद्र चार किलोमीटर दूर है. एक बाइक होने से क्रय केंद्र तक अधिक धान ले जाने में काफी परेशानी हुई. जबकि प्रखंड में दूसरा कोई क्रय केंद्र खुला नहीं. इन्होंने बताया कि क्रय केंद्र में धान बेचने के लिये रजिस्ट्रेशन कार्ड की जरूरत होती है. गांव में मात्र दस प्रतिशत किसानों के पास ही ये कार्ड है. ऐसे में जिन किसानों के पास कार्ड नहीं है, वो तो क्रय केंद्र में भी धान नहीं बेच सकें. गांव की जनसंख्या लगभग सात सौ है.

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जब रजिस्ट्रेशन कराने गये तो काम हुआ बंद

लक्ष्मीकांत महतो और नागेंद्र प्रमाणिक ने बताया कि साल 2017 में धान क्रय केंद्र में धान बेचने के लिये किसानों का रजिस्ट्रेशन कराया गया. तब क्षेत्र के किसानों को जानकारी नहीं थी. जब जानकारी हुई तो क्षेत्र के क्रय केंद्रों में रजिस्ट्रेशन बंद हो चुका था.

वहीं कुछ किसानों ने अप्लाई तो किया लेकिन जमीन की अपडेटेड रसीद नहीं होने के कारण कार्ड बना नहीं. साल 2017 के बाद से रजिस्ट्रेशन नहीं किया गया. जो कि लैंप्स और पैक्स की जिम्मेवारी है. किसानों ने कहा कि क्रय केंद्र में धान बेचने से प्रति किलो 18.95 रूपये धान बेचे जाते है. लेकिन पैसा दो महीने बाद ही दिया जाता है. जबकि बिचैलियों से धान बेचने पर प्रति किलो 15 रूपये में बेचे जाते हैं. इससे प्रति किलो लगभग चार रूपये का नुकसान है. लेकिन बिचैलिये से पैसा तुरंत मिलता है.

धान रोपाई के बाद मिलता है बीज

सरकार की ओर से किसानों को सब्सिडी में बीज, खाद आदि दिये जाते हैं. राज्य में धान की खेती एक बार की जाती है. धीरज कुमार प्रमाणिक, 25 सालों से पारिवारिक खेती संभाल रहे हैं. वो कहते है सब्सिडी में बीज, खाद, रसायन जैविक कीटनाशक हमेशा खेती लगाने के बाद दिये जाते हैं. हालांकि सरकारी सामानों की गुणवत्ता अच्छी होती है. कई बार बारिश अच्छी होने पर लगाया गया है. लेकिन पिछले साल बारिश कम हुई थी. धान की रोपाई हो जाने के बाद किसानों को बीज, खाद और कीटनाशक दिये गये.

एक साल बाद इन बीजों को नहीं बोया जा सकता. क्योंकि इससे फसल गुणवत्ता खराब होती है. अभी भी सरकार की ओर से सब्सिडी में धान, बीज कीटनाशक नहीं दिया गया है. सुझाव देते हुए लोगों ने कहा कि सरकार हर जन वितरण प्रणाली में ही धान क्रय केंद्र खोलें, ताकि किसानों को लाभ मिलता रहे. एक फसल बर्बाद होने से पूरे साल की फसल प्रभावित होती है.

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