Faisal Anurag
नयी शिक्षा नीति को लेकर यह स्पष्ट है कि केंद्र और अनेक राज्य सरकारों के बीच असहमित बनी हुई है. असहमति के स्वर प्रधानमंत्री के संवाद में भी साफ उभरे हैं. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आदिवासी, दलित और पिछड़ों के भविष्य का सवाल उठा कर शिक्षा नीति 2020 की सीमाओं की ओर ध्यान खींचा है. इस सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है क्योंकि सामाजिक ढांचे में इन समूहों के सवाल महत्वपूर्ण हैं, जो सामाजिक न्याय और सामाजिक तौर पर इंसाफ के बंटवारे के लिए लंबे समय से आवाज उठाते रहे हैं. अनेक राज्यों ने यह भी कहा है कि इतने बड़े शैक्षणिक बदलाव की प्रक्रिया में उन्हें न तो तरीके से शामिल किया गया है और न उनसे विचार-विमर्श किया गया है. इन सरकारों का तर्क यह भी है कि शिक्षा नीति का मूल विचार उसके निजीकरण में निहित है और इससे शिक्षा के बाजारीकरण की प्रक्रिया को सरकार पूरी तरह मान्यता दे देगी.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कॉपरेटिव फेडरलिज्म को लोकतंत्र की खूबसरती पहले से बताते रहे हैं. गैर-भाजपा शासित राज्यों ने इसका हवाला देते हुए शिक्षा की समवर्ती सूची का हवाला दिया है. संविधान में स्पष्ट मान्यता है कि केंद्र और राज्यों को अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए. संविधान में केंद्र और राज्यों के कार्यकारी अधिकारों और विषयों का साफ बंटवारा भी है. कुछ कार्यकारी विषय में केंद्र और राज्यों दोनों के हितों की बात की गयी है, जिसे समवर्ती सूची कही जाती है. शिक्षा समवर्ती सूची में शामिल है. केंद्र और राज्यों का दायित्व है कि वह शिक्षा के क्षेत्र में लाये जा रहे बुनियादी बदलावों में राज्यों के हितों और विचारों को नजरअंदाज नहीं करे. प्रधानमंत्री संवाद और उसके पहले भी अनेक राजयों ने कहा है कि इस सवाल पर केंद्र ने राज्यों के साथ परामर्श नहीं के बराबर किया है. गैर भाजपा दलों को भी लोकप्रिय वोट चुनाव में प्राप्त हुए हैं ओर वे भी अपने मतदाताओं के हितों के लिए प्रतिबद्ध हैं. चूंकि शिक्षा नीति के पीछे के विचार को लेकर अनेक किस्म के संदह बने हुए हैं.
तकनीकी तौर पर तो जो बदलाव लाये गये हैं उनसे असहमति कम ही है लेकिन जिस तरह शिक्षा के क्षेत्र के निजीकरण की बात की जा रही है उससे यही जान पड़ रहा है कि सरकार सबको शिक्षा देने के बुनियादी तत्व से पीछे हट रही है. हेमंत सोरेन का सवाल भी इसी से जुड़ा हुआ है. यह आशंका बढ़ी है कि देश के कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए इसमें स्पष्ट तौर पर कोई ऐसा आश्वासन नहीं दिया गया है, जिससे वे शिक्षा के सरकारी गारंटी से संतुष्ट हों. केरल की सरकार नयी शिक्षा नीति के बड़े आलोचकों में एक है. ममता बनर्जी भी इस शिक्षा नीति को लेकर संतुष्ट नहीं है. उनकी भी अनेक आशंकाएं हैं.
1968 में बने कोठारी आयोग की रिपोर्ट ने जिस कॉमन स्कूल सिस्टम को भारत के विकास के लिए जरूरी आंका था, उस पर ठोस तरीके से काम नहीं हुआ, लेकिन उस विचार को कभी पूरी तरह खारिज भी नहीं किया गया. अनेक राजनीतिक दलों और शिक्षा आंदोलनों ने कॉमन स्कूल सिस्टम को लागू करने के लिए समय-समय पर अभियान चलाया. लेकिन 2020 की शिक्षा नीति में पहली बार इस विचार का निषेध किया गया है. इससे आशंका बनी है कि भारत में दो तरह की शिक्षा को पूरी तरह में अमल लाने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें सरकार अपने उन दायित्वों से मुक्त होना चाहती है, जो उसे सबकी शिक्षा के लिए बाध्य करती है. संविधान के नीति निदेशक तत्वों में इसका वायदा भी किया गया है. प्रधानमंत्री के वर्चुअल सम्मेलन के बाद इस तरह की आशंका का होना और भी लाजिमी दिख रहा है. केंद्र सरकार हर हाल में इस शिक्षा नीति को अमल में लाना चाहती है भले ही कुछ राज्य उसे लेकर सवाल उठा रहे हों.
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