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विकास के मानकों में पीछे छूट रहा सीएम का विभाग, सड़क, बिजली, खान, वन राष्ट्रीय मानक से भी पीछे

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Ranchi : प्रदेश में विकास योजनाओं का खाका-खींचने का दौर बदस्तूर जारी है. विकास की बड़ी-बड़ी योजनाओं का डीपीआर भी बन रहा है. खास यह भी है कि मुख्यमंत्री के अधीन विभाग आज भी विकास योजनाओं के राष्ट्रीय मानकों से पीछे ही चल रहे हैं. सड़क, बिजली और वन विभाग अब तक राष्ट्रीय मानक को भी पूरा नहीं कर पाये हैं. राष्ट्रीय मानक की बराबरी में और भी समय लगेगा.

पथ विभाग : सरपट दौड़ नहीं पाई हैं सड़कें

सूबे में सड़क योजनाएं सरपट नहीं दौड़ पायी हैं. राष्ट्रीय घनत्व की तुलना में राज्य में आधे से भी कम सड़के हैं. राष्ट्रीय घनत्व 182.4 प्रति हजार किलोमीटर है. जबकि झारखंड में सड़कों का घनत्व 91.8 हजार प्रति वर्ग किलोमीटर ही है.

अब तक क्या नहीं हुआ

  • राज्य में नहीं बन पाया सड़कों का कॉरिडोर.
  • हर गांव को पहुंच पथ से जोड़ने की योजना पूरी नहीं हो पायी.
  • सात जिलों में नहीं बन पाया बाईपास.
  • गंगा नदी में पुल निर्माण का काम पूरा नहीं हुआ है.
  • बोकारो एस्प्रेस वे अब तक है लंबित.
  • 12 साल गुजरने के बाद भी रिंग रोड का फेज सात नहीं हुआ पूरा.
  • बरही-बहरागोड़ा 333 किलोमीटर सड़क का काम भी नहीं हुआ पूरा.

ऊर्जा विभाग: 40.2 फीसदी को ही बिजली

झारखंड में सिर्फ 40.2 फीसदी को ही बिजली मिल पायी है. राष्ट्रीय मानक 67.9 फीसदी है. वहीं राज्य में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 552 किलोवाट है जबकि राष्ट्रीय स्चर पर प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 720 किलोवाट है.

क्या नहीं हुआ

  • सरकारी उपक्रम का एक भी पावर प्लांट नहीं लगा. सिर्फ शिलान्यास ही हुआ है.
  • एक मेगावाट बिजली का उत्पादन नहीं बढ़ा.
  • पीजीसीआइएल के आधा दर्जन ट्रांसमिशन लाइन और ग्रिड का निर्माण पूरा नहीं हुआ.
  • नक्सल प्रभावित अधिकांश क्षेत्रों में आधारभूत संरचना नहीं तैयार हुयी है.
  • राज्य गठन के बाद से 22 एमओयू हो चुके हैं रद्द.
  • अंडग्राउंड केबलिंग का भी काम पूरा नहीं हो पाया है.
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वन विभाग : राष्ट्रीय मानक से पांच फीसदी कम है प्रदेश में जंगल

राज्य में 2.36 मिलियन हेक्टेयर में वन भूमि है. कुल 29.61 फीसदी क्षेत्र में जंगल है. बावजूद इसके झारखंड राष्ट्रीय मानक से चार फीसदी पीछे है. राष्ट्रीय मानक 33.3 फीसदी है.

क्या नहीं हुआ

  • आधा दर्ज जिलों के वन क्षेत्र में वृद्धि नहीं हुयी.
  • हरियालीकरण योजना की धीमी प्रगति.
  • पौधों की उत्तरजीविता पर खड़े हो रहे सवाल.
  • जंगल की कमी के कारण ब्लैक कार्बन की मात्रा बढ़ी.
  • पलामू टाइगर रिजर्व पर भी खड़े हो रहे हैं सवाल.
  • भालू के संरक्षण की नीति नहीं बनी.
  • टाइगर फाउंडेशन कारगर साबित नहीं हो रहा

खान विभाग : झारखंड के कोयले से रौशन होते हैं दूसरे राज्य

झारखंड में मौजूदा कोयला का 95 फीसदी हिस्सा दूसरे राज्यों के पावर प्लांट इस्तेमाल कर रहे हैं. दूसरे राज्य झारखंड के कोयले का इस्तेमाल कर झारखंड में ही सालाना ढ़ाई हजार करोड़ की बिजली बेचते हैं. 100 मिलियन टन कोयला दूसरे राज्यों में भेजा जाता है. राज्य के खाते में सिर्फ 25 मिलियन टन ही कोयला आता है. कोयला का सालाना उत्पादन 125 मिलियन टन है. गुजरात, उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेशा, बिहार, तामिलनाडू, पंजाब, राजस्थान और दिल्ली की पावर कंपनियां झारखंड के कोयले का इस्तेमाल करती हैं.

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