Opinion

कोरोना के बढ़ते प्रभाव ने देश के हेल्थ सेक्टर की कमियों को उजागर कर दिया है

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Faisal Anurag

हेल्थ केयर में जीडीपी की कुल 2.1 प्रतिशत राशि खर्च की जाएगी. 15वें वित्त आयोग के प्रमुख एनके सिंह ने यह बात कही है. इस घोषणा के बाद स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों में यह चर्चा हो रही है कि क्या भारत के हेल्थ केयर के संकट की जिम्मेदारी धन की कमी मात्र है. या नीतियों से भी इसका संदर्भ जुड़ा हुआ है. आयोग ने कहा है कि यह राशि वर्ष 2025 तक खर्च की जाएगी. लेकिन यह नहीं बताया गया है कि इसके लिए सरकार धन का प्रबंधन कैसे करेगी. और खर्च कैसे किया जायेगा. पिछले वित्त वर्ष में कुल जीडीपी का 1.29 प्रतिशत खर्च किया गया है.

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कोरोना के बढ़ते प्रभाव ने भारत के पूरे हेल्थ केयर की कमियों को उजागर कर दिया है. खास कर सरकारी और निजी, दोनों सेक्टरों को ले कर. वैसे भी विश्व बैंक तो कहता ही रहा है कि भारत का हेल्थ सिस्टम अंडर फंडेड है. और डिलेवरी भी बहुत कमजोर है. हेल्थ केयर के वैश्विक इंडिकेटर भी भारत की बुरी दशा को ही बताते हैं. ऐसे समय में जीडीपी की राशि को बढ़ा कर 2.1 प्रतिशत करने के अपने मायने तो हैं ही लेकिन इस राशि को खर्च करने की जो समय-सीमा बतायी जा रही है उसे ले कर सवाल हैं. भारत की पूर्ववर्त सरकारों ने भी इस तरह के दावे किए थे. लेकिन उसके परिणाम सार्थक नहीं दिखे हैं.

एनके सिंह ने यह भी कहा है कि सरकार सब के लिए स्वास्थ्य सुविधा देने के अपने दायित्व से नहीं मुकर सकती है. साथ ही उन्होंने प हेल्थ सेक्टर में प्राइवेट पब्लिक सहयोग पर जोर दिया है. एम्स के चिकित्सक रह चुके और फिलवक्त जेएनयू में पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर विकास बाजपेयी ने  इस संदर्भ में मोदी सरकार की की प्राथमिकताओं और नीतियों को ले कर गंभीर सवाल उठए हैं.

उन्होंने ने कहा है कि स्वास्थ्य विषयक केंद्र की नीतियों के कारण जनकल्याण को भारी आघात पहले ही पहुंच चुका है. अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार किस तरह संभावित राशि का प्रबंधन करेगी. यदि इसके लिए उन नीतियों में बदलाव नहीं लाया गया जो कि कारपोरेटाइजेशन पर जोर देते है, तो यह राशि भी निजी क्षेत्र में चली जायेगी. और स्वस्थ्य के जनकल्याण का मकसद अधूरा ही रह जायेगा.

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कोविड19 के बाद जिस तरह के संकट का सामना करना पड़ा है, उसका अनुभव बताता है कि निजी क्षेत्र उस दबाव को झेलने के बजाय अपने व्यापार पर ही ध्यान देता है. निजी अस्पतालों के मरीजों का अनुभव बताता है कि निजी अस्पतालों का खर्च वहन करने की क्षमता लोगों में नहीं है. और सरकारी अस्पताल ही सहारा हैं. अपनी तमाम कमियों और अविश्वास के बावजूद. इसलिए पब्लिक प्राइवेट क्षेत्र के सहयोग की प्रक्रिया में पब्लिक सेक्टर की कराह साफ सुनायी देती है. विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्षों से भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में की गई “महत्वपूर्ण प्रगति” को लेकर स्वास्थ्य, पोषण और जनसंख्या के आंकड़ों में “राज्यों में बड़े व लगातार स्वास्थ्य अंतराल” थे. और कोविड19 ने इसे बेनकाब किया. यह बेहद सख्त टिप्प्णी है.

वित्त आयोग स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए धन का आवंटन तय करने से पहले विश्व बैंक से परामर्श कर रहा है. जो जल्द ही अंमतिम रूप ले लेगा. आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह ने पहले ही घोषणा कर दी है कि स्वास्थ्य पर अपनी रिपोर्ट में पहली बार एक विशेष अध्याय शामिल किया जायेगा. और इसी अध्ययन के नतीजे को ध्यान में रख कर आवंटन की प्राथमिकताओं को तय किया जायेगा. विश्व बैंक ने जन अरोग्य योजना के लॉकडाउन की गिरावट को ले कर भी चिंता जतायी है. कैंसर जैसे मरीजों के इलाज को लेकर चिंता प्रकट की है कि इन्हें इस दौरान नजरअंदाज जैसा किया गया है.

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इसका अर्थ यह है की महामारी के दौरान एक समन्वित नजरिए को बनाए रखने की जरूरत है. ताकि अन्य गंभीर मरीजों की देखरेख प्रभावित नहीं हो. विश्वबैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन की चिंताओं को ले कर वित्त आयोग भी गंभीर है. वित्त आयेाग के अनुसार हेल्थ केयर के तमाम इंडिकेटरों में सुधार समय की मांग है. और इसे देर तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

चौथे राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक 56 फीसदी शहरी और 49 फीसदी ग्रामीण लोगों ने निजी स्वास्थ्य सेवाओं का विकल्प चुना. बुनियादी सुविधाओं के तीव्र निजीकरण के बीच ये स्थिति चौंकाती तो नहीं है. लेकिन चिंता ये है कि अभी भारत की एक बड़ी आबादी इतनी वंचित और संसाधनविहीन है कि वो निजी अस्पतालों के आलीशान और अत्यंत महंगे इलाज का खर्च वहन करने में समर्थ नहीं. क्या सरकारें जानबूझकर, अपने दायित्व से मुंह मोड़ रही हैं. और निजी अस्पतालों की बाढ़ आ गई है? जबकि सुरक्षित उपचार को लेकर इधर कुछ बड़े अस्पताल सवालों और जांच के घेरे में भी आए हैं.

दरअसल सरकारी क्षेत्र के स्वास्थ्य को लेकर यह धारणा बन गयी है कि वे भरोसे के काबिल नहीं हैं. और सरकार भी निजीकरण की प्रक्रिया पर जोर दे रही है. जनकारों ने सवाल उठाए हैं : आर्थिक समृद्धि और विकास की तेज गति के बीच स्वास्थ्य कल्याण के कई वैश्विक सूचकांकों में भारत आज भी पिछड़ा हुआ है. चिंताजनक हालात का अर्थ ये भी है कि देश के रूप में हम विभाजित हैं. और सामूहिक चेतना का ह्रास हो रहा है.

अगर क्यूबा जैसा छोटा सा देश पब्लिक हेल्थ केयर की एक अप्रतिम मिसाल बना सकता है तो विश्व शक्ति बनने को बेताब भारत क्यों नहीं. पहले से ही हेल्थ बजट को बढ़ाने की बात की जा रही है. जीडीपी का 2.1 प्रतिशत राशि का सार्थक नतीजा तभी लोग महसूस करेंगे जब साकारी अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र निजी अस्पतालाओं से प्रतस्पर्धा के लायक बनाए जाएंगे.

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