
Faisal Anurag
कृषि विधेयकों ओर श्रमिकों के संरक्षण कानूनों में बदलावों के विधेयकों के कारण किसानों और मजदूरों का आंदोलन तेजी पकड़ रहा है. पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़ के बाद अब कर्नाटक में किसानों ने बड़ा प्रदर्शन किया है. अखिल भारतीय किसान सभा ने 25 सितंबर को भारत बंद का आह्वान किया है. जिसका अनेक किसान संगठनों ने समर्थन किया है. पांच ट्रेड यूनियनों ने भी कृषि और श्रम कानूनों के बदलाव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.
जमीन की इन गतिविधियों के साथ संसद परिसर में राज्यसभा से मुअत्तल किए गए सांसदों ने धरना दिया. उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने अपने बचाव में एक दिनी उपवास का रास्ता अपना लिया है. राज्यसभा में 18 दलों ने घोषणा की है कि उनके सभी सदस्य राज्यसभा की कार्रवाई का बहिष्कार तबतक करेंगे जबतक मुअत्तली खत्म नहीं की जाती.
यह तनाव बता रहा है कि सड़कों की टूटी वीरानी संसद की खोमोशी को तोड़ रही है. प्रधानमंत्री के नेतृत्व में उनका दल और सरकार विपक्ष पर हमला कर रहा है. लेकिन विपक्ष के कथन की सच्चाई की धार इससे कम नहीं हो रही है.
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प्रधानमंत्री ने भरोसा दिलाया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को कभी खत्म नहीं किया जाएगा. सरकार ने हर साल किए जाने वाले एमएसपी की घोषणा की राशि बढा दी है लेकिन इस तरह का प्रयास तो हर साल किया जाता है. किसानों ने एमएसपी की जो कानूनी गारंटी की मांग की है उसे केंद्र नहीं दे रहा है. और न ही उसने विवादित कृषि विधेयक में इस संदर्भ में कोई उल्लेख किया है. किसानों के जितने सवाल और संदेह हैं उसे न तो विधेयक हल कर पा रहा है और न ही प्रधानमंत्री समेत सरकार.
बैंगलुरू के प्रदर्शन में किसानों के साथ खेतिहर मजूदरों ने भी हिस्सेदारी की है. जहिर है कि यह आंदोलन आने वालें दिनों में केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा. मध्यवर्ग इस के प्रभावों का अभी आकलन भी नहीं कर रहा है. लेकिन किसान संगठनों का दावा है कि उनके घर के खाद्य बजट में भारी बढोत्तरी इससे होगी.
कोविड के इस दौर में केंद्र सरकार ने न केवल कारपोरेटपरस्त नजरिए को पूरी तरह अपना लिया है, बल्कि उसके हितों की रक्षा के लिए तमाम कानूनी प्रावधान भी कर रही है. कृषि के बाद संसद में पेश श्रम विधेयक इसी कड़ी का हिस्सा है. इससे श्रमिकों के अनेक अधिकारों को खत्म किए जाने का रास्ता साफ हो जाएगा. सात राज्य सरकारों ने लॉकडाउन के बीच ही श्रम कानूनों में कई संशोधन अस्थायी तौर पर किये थे. वे भी स्थायी हो जाएंगे. विधेयक पर अगले दो दिनों में चर्चा होने की संभावना है.
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श्रम कानूनों में बदलाव के बाद हायर और फायर किए जाने के लिए कोई बंधन नहीं रह जाएगा. और काम के समय की सीमा भी बढ़ जायेगी. श्रमिकों के बजाय इंडस्ट्री के हित के अनुकूल श्रमिकों का इस्तेमाल होगा. इसका सबसे बुरा प्रभाव तो असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर पड़ेगा. निश्चित काम, निश्चित तनख्वाह और समाजिक सुरक्षा पर खतरा बढ़ेगा. मजूदरों के संगठनों के अनुसार 90 प्रतिशत भारत की श्रमशक्ति असंगठित क्षेत्र में है.
और उनकी सामाजिक सुरक्षा के पहले से ही अपर्याप्त संरक्षण इससे प्रभावित होंगे. संसद में पेश विधायक में इस तरह के प्रावधान है कि इससे असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के बीच संदेह बढ़ा है. असंगठित क्षेत्र के जानकार प्रो रवि श्रीवास्तव के अनुसार श्रम कानून का बदलाव भारत में श्रमिकों की गुलामी का दस्तावेज बन कर उभरेगा.
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संसद से पारित कराने के लिए पेश गए विधेयक के अनुसार प्रस्ताविक श्रम संहिताएं मौजूदा 45 श्रम कानूनों का स्थान लेंगे. देशभर में सरकारों के सुधार के रास्ते को ले कर संदेह है. विपक्ष और पक्ष के बीच आने वाले दिनों में विवाद और भी तल्ख होने की संभावना है. यह एक ऐसा दौर है, जहां विपक्ष की आवाज को नहीं सुना जा रहा है.
जिस तरह देश में नोटबंदी की घोषणा और जीएसटी के मामले में विपक्ष को अनसुना किया गया, वैसा ही कोरोना के मामले में हुआ. सुधारों के पक्षधर जो भारी बदलाव चाहते रहे हैं, लेकिन भारत की राजनीति में विपक्ष के स्व के कारण अंजाम नहीं दिए जा सके. उन्हें अब मोदी सरकार अमल में ला रही है.
वैश्विक आर्थिक एजेंसियां भी लंबे समय से भारत में सुधारों के लिए कठोर कदम उठाने की बात करती रही है. कुछ ही समय बीते हैं जब लोकसभा में भी सदस्यों को सस्पेंड किया गया था. राज्यसभा में डेरेक ओ ब्रायन, संजय सिंह, राजू सातव, केके रागेश, रिपुन बोरा, डोला सेन, सैयद नज़ीर हुसैन और इलामारन करीम का सस्पेंसन भी उसी कड़ी का हिस्सा है.
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