Opinion

भारत में बेरोजगारी क्यों है?

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Virender Bhatia

वर्ष 2014 में हमने चंडीगढ में एक ग्रुप से मीटिंग की. ग्रुप में कुछ रिटायर अधिकारी और व्यापारी  थे. जिन्होंने पैसों का एक पूल (pool) बनाया हुआ था. तकरीबन 50 करोड़ का वह पूल था. वे 5 स्टार्टअप ढूंढ रहे थे, जिनमें प्रत्येक में 10 करोड़ का निवेश होना था.

यह वर्ष 2014 का माहौल था, जब हम मनमोहन सरकार को बदलने का मन बना चुके थे. देश में असंख्य ऐसे पूल बन रहे थे, जो स्टार्ट अप्स मांग रहे थे कि आइडिया लाओ. हम निवेश करेंगे.

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वर्ष 2014 में हमने मनमोहन सरकार को बदल दिया. इसलिए बदल दिया, क्योंकि हमें विकास के दिवास्वप्न दिखाये गये. हमें और उन्नत देश और बढ़िया माहौल का सपना दिया गया. देश की अर्थव्यवस्था रोजगार उन्मुख अर्थव्यवस्था थी, लेकिन उदारीकरण के पुरोधा मनमोहन सिंह की नीतियों से हम पूरी तरह सहमत नहीं थे और समझते थे कि संघ प्रायोजित भाजपा सरकार के पास विकास का कोई स्वदेशी मॉडल होगा.

रैलियों में मोदी जी के भाषण बेहद उम्मीद जगाते थे. मनमोहन सरकार से अलग, मनमोहन सरकार से बढ़िया कोई काम और अर्थिकता का हमारा अपना मॉडल हो, कौन नहीं चाहेगा. काला धन अर्थव्यवस्था में वापिस आये, डीजल पेट्रोल सस्ते हों, प्रत्येक नागरिक अपने आप में बिजनेस एंटिटी की हैसियत रखे. ज्यादा से ज्यादा सफर करे, घूमे रोजगार के नये अवसर खोजे, नये बिजनेस स्थापित करे. कौन न चाहेगा. देश में हर साल बढ़ती आबादी के लिए तो ऐसा जरूरी था कि घर-घर रोजगार या लघु कुटीर उद्योग पहुंचे. सरकार माल बेचने की जिम्मेदारी ले.

वर्ष 2016 में हमने एक प्रोजेक्ट डिज़ाइन किया. बड़ी उम्मीद में कि डायनममिक सरकार है, स्किल इंडिया, मेड इन इंडिया स्टार्टअप इंडिया. एक स्वदेशी मॉडल था यह. हमने भारत सरकार के स्किल इंडिया ऑफिस में बात की कि जो लिस्ट आपने जारी की है, स्किल्स की उससे अलग एक काम है. जिसमें हमें तकरीबन 8 लाख लोग स्किल्ड चाहिए. साढ़े छह लाख गांव हैं और उनके ऊपर कुछ अन्य लोग. कार्यालय में बैठे अधिकारी की बांछें खिल गयीं. बोले फ़ाइल मूव कीजिये हम नया कोर्स शामिल कर सकते हैं. हमने फ़ाइल मूव कर दी. यह अक्टूबर 2016 का वाक्या है.

नवंबर 2016 में मोदी जी ने नोटबंदी का ऐलान कर दिया. हम सब हैरान थे कि देश की सरकार इतना अजीब और आत्मघाती फैसला कैसे ले सकती है. उनकी हिन्दू मुस्लिम राजनीति अलग चीज है कि सत्ता प्राप्ति के लिए प्रपंच रचे गए हैं, लेकिन सत्ता हाथ में है और कोई देश की अर्थव्यवस्था को स्टिल स्टैंड खड़े होने के लिए कह रहा है?

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अब आइये वर्ष 2014 वाले माहौल पर जब देश में असंख्य लोग नये स्टार्टअप ढूंढ़ रहे थे. वर्ष 2016 में तमाम स्टार्टअप धराशायी होने लगे. वित्त पोषक तो बहुत डरी हुई कौम होती है, वे वर्ष 2016 में ही इधर-उधर दुबक गये. देश का युवा स्टार्टअप प्रोजेक्ट लेकर देशभर में वित्तीय संस्थानों के पास घूमता रहा, लेकिन उन्हें धन नहीं मिला.

एक दिन बैंक की हड़ताल होने पर देश को करोड़ों का नुकसान होता है, यहां तो 50 दिन पूरी अर्थव्यवस्था ब्लॉक रही. अर्थव्यवस्था जब खुली तब उसमें खुलने जैसा आत्मविश्वास औऱ आपसी विश्वास नहीं बचा था. वित्तीय साइकल टूट गये. उसी बरस कोढ़ में खाज वाला GST बिल सरकार ले आयी. जब अर्थव्यवस्था बेहद संकट में थी, तब GST लाने की जिद पर जेटली जी अड़ गये. तब हमें समझ आया कि हमने मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री को हटाकर जिन्हें गद्दी पर बिठाया है, वे इस मुल्क को रसातल में ले जाएंगे.

आज वर्ष 2020 है. अपनी तमाम नाकामियां इस सरकार ने लॉकडाउन पर डाल दी हैं. जबकि कोई पूछे कि 45 साल में सबसे ज्यादा खराब पोजीशन औऱ विश्व में सबसे ज्यादा गिरावट हमारी अर्थव्यवस्था में क्यों आयी? जबकि लॉकडाउन तमाम देशों ने की. यूरोपियन मुल्क तबाही के कगार पर खड़े हैं. बरसों से. लेकिन उनकी अर्थव्यवस्था में भी इतनी गहरी मार कोविड की वजह से नहीं पड़ी है. भारत जो विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था थी, वह विश्व की सातवीं अर्थव्यवस्था पर फिसल गया और यह कोविड से पहले हुआ. आपकी इकोनॉमी जब सिकुड़ती है, तो स्वाभाविक है यह रोजगार को ही खत्म करती है. सर्वप्रथम.

आज खुद प्रधानमंत्री अपनी स्किल इंडिया स्कीम का कहीं गुणगान नहीं करते. नोटबंदी का कहीं जिक्र नहीं करते. सरकार का खुद का टैक्स कलेक्शन प्रभावित हुआ है. आज सरकार पेट्रोल पर से वैट हटा दे तो छह माह में देश की तमाम राज्य सरकारों के पास सैलरी देने के पैसे नहीं होंगे. जबकि आप तो पेट्रोल सस्ता करने और महंगाई कम करने के वादे लेकर आये थे.

आपने आम आदमी के चलने पर टैक्स बढ़ा दिये हैं. ट्रांसपोर्ट महंगा हो गया है. बिजनेस की मूल चीज़ें बेसिक टूल, जो जनता को दिये जाने चाहिये वे तक नहीं जानते आप.

देश में जब तक रोजगार की मिल्कियत का विकेंद्रीकरण नहीं करेंगे या सरकारी कंपनियों को आप नहीं बचायेंगे. देश में रोजगार का विकास नहीं होगा. रोजगार की मिल्कियत के विकेन्द्रीकरण से अर्थ है कि कुछ गिनी चुनी कंपनियां ही पूरे मुल्क पर काबिज न होने दी जाएं. देश के शेयर बाजार का जो इंडेक्स है उसे निफ़्टी कहते हैं. निफ़्टी-फिफ्टी भी इसे कहा जाता है. यानी देश की लीडिंग 50 कंपनियां जो पूरे मुल्क की जीडीपी और विकास का आइना हैं, वे इसमें शामिल हैं. आप हैरान होंगे. जानकर कि ये 50 कंपनियां मिलकर कुल 1 करोड़ 19 लाख लोगों को रोज़गार देती हैं और यह आंकड़ा वर्ष 2018 का है. आज यह आंकड़ा बढ़ा नहीं बल्कि घटा है. विश्व का चौथा अमीर घराना रिलायंस 1 लाख 95000 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है, जबकि अकेला BSNL चार लाख लोगों को रोजगार देता था जिसकी सम्पत्ति शनै शनै रिलायंस की ही हो रही है.

अर्थव्यवस्था का डिज़ाइन रोजगार पैदा करता है. उस अर्थव्यवस्था को यदि जनहित में सरकार डिज़ाइन करेगी, तो रोजगार उन्मुखी अर्थव्यवस्था का मॉडल दिखेगा. लेकिन यदि देश की अर्थव्यवस्था का डिज़ाइन पूंजीपतियों के हाथ में है, तो उस अर्थव्यवस्था में सबसे पहले जिस चीज पर कुठाराघात होगा वह “रोजगार” ही है. मनमोहन सिंह पर बेशक हजार दबाव रहे होंगे, लेकिन रोजगार उन्मुखी अर्थव्यवस्था उनके राजकाज में फलीभूत होते दिख रही थी.

डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.

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