Opinion

क्यों #ChetanBhagat जैसे मोदी समर्थक अब भक्ति की राह छोड़, आलोचना की राह पकड़ने लगे हैं

Faisal Anurag

नरेंद्र मोदी के समर्थक चेतन भगत का मोहभंग हो रहा है. ऐसा लगता है कि वे मोदी सरकार से निराश हो गए हैं. चेतन भगत अब तक नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का न केवल जम कर समर्थन करते आए हैं बल्कि मोदी  आलोचकों को खरीखोटी सुनाने की होड़ में आगे की पंक्ति में रहे हैं.

चेतन भगत मध्यवर्ग युवा के लेखक के रूप में लोकप्रिय हैं. और युवाओं के बीच वे अपने भाषणों के लिए भी जाने जाते हैं. चेतन ने 2012 के बाद से ही नरेंद्र मोदी की वकालत शुरू कर दी थी. और 2014 में उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद भगत ने भारत में परिवर्तन और प्रगति के सपनों के दावे का समर्थन किया था.

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 लेकिन इसी चेतन भगत ने 20 मई को एक ट्वीट किया है. इसमें न केवल तल्खी है बल्कि मोदी सरकार को बेनकाब करने का प्रयास भी है. भगत ने तल्खी से लिखा हैः-

हमने अपनी अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया.

क्योंकि हमने पाकिस्तान को और नीचे होने की परवाह की.

क्योंकि हम मुसलमानों में एकता की भ्रम की परवाह करते रहे.

क्योंकि हमने सरकार की जवाबदेही तय करने के बजाय उसकी भक्ति पर जोर दिया है.

क्योंकि हमारी इकोनॉमिक्स आउटडेटेड है.

क्योंकि हमे लगता है कि सभी दुख भगवान ने दिए हैं.

और क्योंकि  हम इस रियलिटी चेक ट्वीट को भी ट्रोल करते हैं.


भगत के ट्वीट का सार और निहितार्थ स्पष्ट है. इसी के साथ उनके एक दूसरे ट्वीट का भावार्थ है : यदि अर्थव्यवस्था अच्छी हालत में नहीं है, तो मैं कहता हूं कि यह अच्छे आकार में नहीं है. सुधार इसे बेहतर बना सकते हैं. मुझे उम्मीद है कि हम ऐसा करेंगे.

हालांकि सिर्फ इसलिए कि मैंने कुछ ऐसा कहा है जिसे आप सुनना नहीं चाहते हैं. क्योंकि मैं आपके पक्ष में चला गया. खुद को संभालो. मैं स्वतंत्र रूप से सोचता हूं. मेरे लिए यह सब क्लब नहीं है.

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भगत के ट्वीट से स्पष्ट हे कि वे अब अपने को स्वतंत्र चिंतन और क्लबविहीन घोषित करने पर जोर दे रहे हैं. कई अन्य मोदी समर्थको ने भी पिछले दो तीन सालों में मोहभंग का शिकार होने का संकेत देते हुए आलोचना को महत्व दिया है. साफ है कि देश में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है.

और जिस तरह हिुंदू, मुसलमान और पाकिस्तान के नाम पर भावनाओं को भड़काया गया है, और भक्तों ओर ट्रोल के लिए पाला पोसा गया है, उसका असर अब दिखने लगा है.

भगत के बालने का खास महत्व यह है कि वे पूंजीवाद के घोर समर्थक हैं. और आर्थिक सुधारों के पक्षधर हैं. हालांकि आर्थिक सुधारों को ले कर कई तरह के विचार हैं. और निजीकरण की अंधी दौड़ ने दुनिया को बड़े आर्थिक संकट में डाला है. हर दशक छोटी-बड़ी मंदी का शिकार होता रहा है. पिछले दशक में 2008 में आर्थिक मंदी का एक बड़ा दौर दुनिया झेल चुकी है.

उस मंदी ने ग्लोबल इकोनॉमी की कमजोरियों और खतरों को बेपर्दा कर दिया था. बावजूद दुनिया पुरानी राह पर ही चलती रही है. भारत तो उस आर्थिक मंदी से जूझने में कारगर रहा था. क्योंकि भारत के अर्थतंत्र में सार्वजनिक क्षेत्र की एक बड़ी भूमिका थी. लेकिन कोविड 19 के बाद जो आर्थिक संकट की आंधी है इसमें सुधार के नाम पर जिस तरह कोर सेक्टर को निजी व विदेशी पूंजी के लिए खोला जा रहा है, उसके भयावह खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

दुनिया में 1930 की सबसे बड़ी मंदी से किन्स के कल्याणकारी राज्य अवधारणा की अर्थनीति ने बड़ा सहारा दिया था. किन्स की नीतियों का प्रभाव पिछली सदी के अंतिम दशक तक देखा गया. लेकिन पिछले तीस सालों के आर्थिक तंत्र ने दुनिया को एक बड़े चक्रव्यूह में फंसा दिया है. भारत की वित्तमंत्री तो अब कह रही हैं किसी के पास भी इस आर्थिक विपदा से निपटने का रास्ता  नहीं है.

केंद्र सरकार में वित्त सचिव रहे सुभाषचंद्र गर्ग की एक आलोचना भी खूब चर्चा मे है. इन्होंने भी भारत सरकार की आर्थिक सोच को ले कर सवाल किया है. 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज के संदर्भ में इन्होंने साफ कहा है कि इससे वर्तमान संकट से बाहर नहीं निकाल सकता है.

वर्तमान संकट का हल इससे नहीं निकल पाएगा. क्योंकि इससे इकोनॉमिक ग्रोथ को गति नहीं मिलेगी. यह भी सामान्य टिप्पणी नहीं है. करारेबार को गति और रेाजगार पैदा करने के लक्ष्य की प्राप्ति पर भी उनके सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

गर्ग ने कहा है कि इस बीस लाख करोड़ में सरकार ने अपने खजाने से अतिरिक्त राशि लगभग नहीं के बाराबर दी है. इाकेानॉमिक ग्रोथ, रोजगार और कारोबार को गति देने के लिए सरकारी खजाने को खोलना होगा.

गर्ग ने इस पर फोकस किया है. उन्होने यह भी कहा है कि 20 लाख करोड़ में ज्यादा जोर लिक्विीडीटी पर है. इससे समस्या का हल नहीं निकलेगा. उन्होंने यह भी कहा है कि तत्काल खर्च करने की जरूरत है. और मजूदरों पर ज्यादा फोकस करने की जरूरत है.

सीआईआई जैसी उद्योगजगत की संस्था ने पैकेज का स्वागत किया था. लेकिन अब चर्चा है कि उनके भीतर भी बेचैनी है. मध्यम और लघु उद्यमी भी कैश संकट से जूझ रहे हैं. और कर्ज उन्हें इस संकट से तुरंत राहत नहीं दिला सकेगा. ऐसी उनके बीच चर्चा है. पूर्व वित्तमंत्री पी चिंदरब की आलोचनाओं को तो विपक्ष की राय बता कर खारिज किया गया.

लेकिन चिदंबरम ने जो सवाल पैकेज को ले कर उठाए थे, अब मोदी के करीबी रहे कई लोग उसे प्रकारंतर से उठाने लगे हैं. चिंदंबरम ने कहा था कि सरकार की ओर से 10 लाख करोड़ रुपये या जीडीपी का दस फीसदी वाला पैकेज़ जारी होना चाहिए. क्योंकि वर्तमान पैकेज़ ने कई क्षेत्रों जैसे ग़रीबों, प्रवासियों, किसानों, मजदूरों, कामगारों, छोटे दुकानदारों, और मध्य वर्ग की उचित मदद नहीं की है.

वर्तमान पैकेज में केवल 0.91 प्रतिशत राशि का ही बोझ केंद्रीय खजाने पर पड़ेगा. वर्तान संकट को देखते हुए यह राशि अपर्याप्त है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकार इस स्थिति में है कि वह आने वाले दिनों में राजकोषीय घाटा बढ़ाने का जोख़िम ले सके.

दुनिया के तमाम बड़ी इकोनॉमी वाले देशो ने राजकोषीय घाटा उठाने का जोखिम लिया है. अपने नागरिकों के हर तबके तक नगद राशि पहुचाने का एलान किया है दूसरी ओर भारत का राहत पैकेज कर्ज पर ही आधारित है. इस से आर्थिक संकट के गहराने का अंदेशा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

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