
Latehar: एक ओर राज्य सरकार सूबे के विकास के बड़े-बड़े दावे करती है. वहीं दूसरी ओर लातेहार जिला विकास से दूर नजर आता है.
इलाके में विकास की कड़वी हकीकत जिले के महुआडांड़ प्रखंड के चम्पा पंचायत में आनेवाले ग्वालखाड़ गांव में देखी जा सकती है. जो आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है.
पानी, बिजली, सड़क जैसे मूलभुत सुविधाएं यहां के लोगों को मयस्सर नहीं. गांव में सड़क नहीं होने से आने-जाने में खासी परेशानी होती है. हालात ये हैं कि किसी बीमार या बुजुर्ग को गांव से बाहर ले जाना हो, तो सोचना पड़ता है.
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गाड़ी नहीं टोकरी की बहंगी आने-जाने का जरिया
शुक्रवार को ऐसी ही एक बानगी देखने को मिली, जहां ग्वालखाड़ निवासी 70 वर्षीय लालो कोरवाईन को अपना वृद्धा पेंशन लेने महुआडांड़ जाना था. लेकिन गांव में सड़क नहीं है तो गाड़ियों के चलने का तो प्रश्न ही नहीं उठता.
ऐसे में लालो के चार बेटों (सुन्दर कोरवा,जगलाल कोरवा, जयराम कोरवा, लालसाय कोरवा) ने टोकरी की बहंगी बनाकर, उसमें अपनी मां को बैठाया. और कांधे पर उनका बोझ लिये पैदल 13 किमी की दूसीर तय कर महुआडांड़ मुख्यालय पहुंचे, ताकी पेंशन के एक हजार रुपये मिल सके.
कंघे पर अपनी मां को ले जा रहे लालसाय कोरवा ने बताया कि गांव मे रास्ता नहीं है, गाड़ी नहीं चलती है, बरसात में परेशानी और भी बढ़ जाती है.
पहाड़ियों से घिरा है ग्वालखाड़ गांव
ग्वालखाड़ गांव चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है. यहां पर जनजाति व आदिम जनजाति के लोग निवास करते हैं. गांव में कुल 60 घर हैं. जहां पर करीब 245 लोग रहते हैं. पठार क्षेत्र होने के कारण गांव तक जानेवाले रास्ते पत्थररिले हैं. मोटरसाइकिल भी नीचे छोड़कर गांव तक पैदल जाना पड़ता है.
आजादी के 72 सालों बाद भी ग्वालखाड़ गांव में बिजली,पानी,सड़क ,स्वास्थ्य सुविधा की व्यवस्था बहाल नहीं की जा सकी है.
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बीमारी में भगवान भरोसे ग्रामीण
रास्ता नहीं होने के कारण सबसे अधिक परेशानी, गांव में किसी के गंभीर रुप से बीमार पड़ने पर होती है. ग्रामीण सुन्दर लाल कोरवा ने बताया की गांव में किसी की तबीयत अत्याधिक बिगड़ जाये, तो फिर भगवान ही मालिक है. सबसे ज्यादा दिक्कत तो गर्भवती महिलाओं को होती है. स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलने के कारण अधिकतर महिलाओं का प्रसव गांव में ही होता है.
गांव से मुख्यालय तक सड़क नहीं होने के कारण असहाय, वृद्ध, दिव्यांग लोगों को पेंशन, इलाज, सहित अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने के लिए पैदल जाना पड़ता है.
या फिर परिवार एवं गांव के ग्रामीण के द्वारा खाट के भार में लेकर 13 किलोमीटर दूर महुआडांड़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, बैंक, मुख्यालय तक लाना पड़ता है.
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