
सरकारी क्षेत्र में नौकरी देने के साथ बजट के आकार को भी देखना होगा, तकनीकी पेंचों को भी करना होगा दूर
सरकारी क्षेत्र से अधिक निजी क्षेत्र में हैं रोजगार के अवसर, लेकिन स्कील डेवलपमेंट का है बड़ा गैप
Dr. Harishwar Dayal

झारखंड में बेरोजगारी का ग्राफ साल दर साल बढ़ता जा रहा है. आंकड़े बताते हैं कि 2011-12 की तुलना में 2018-19 में लगभग चार फीसदी बेरोजगारी बढ़ी है. 2011-12 में बेरोजगारी 1.7 फीसदी थी, जो अब बढ़कर पांच फीसदी हो गई है.
बेरोजगारी कैसे बढ़ी, क्यों बढ़ी और इसके निदान के क्या उपाय हैं, इस पर राज्य के ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री सह संत जेवियर्स कॉलेज रांची के प्रोफेसर डॉ हरिश्वर दयाल ने अपनी बात रखी है.
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उन्होंने बताया कि सरकार के पास जितनी वेकेंसी है, उसका भरा नहीं जाना एक प्रमुख कारण है. इसके पीछे आरक्षण सहित कई अन्य तकनीकी पेंच सामने आते रहते हैं.
जिसकी वजह से वेकेंसी भरने में देर हो जाती है और बेरोजगारी का प्रतिशत बढ़ता जाता है. एक वजह और है कि वेंकेंसी भरने के साथ सरकार को अपने बजट का आकार देखना होगा. ताकि वित्तीय स्थिति का भी सटीक पता चल सके.
दक्ष मानव संसाधन और इसकी उपलब्धता के बीच है बड़ा गैप
वर्तमान में प्रदेश में दक्ष मानव संसाधन और इसकी उपलब्घता के बीच बड़ा गैप है. झारखंड में बेरोजगारी को दूर करने के लिये दक्ष मानव संसाधन की क्षमता और दक्ष मानव संसाधन की उपलब्घता के बीच के अंतर को पाटना होगा. फिलहाल इन दोनों के बीच काफी गैप है.
वर्तमान निजी क्षेत्रों में दक्ष मानव संसाधन की काफी डिमांड है. हमेशा निजी क्षेत्र में सबसे अधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध रहते हैं, लेकिन उद्योग का विकास नहीं होने के कारण युवाओं को रोजगार नहीं मिल पाता है. सरकार द्वारा चलाई जा रही कौशल विकास की योजनाओं को मजबूती से लागू करने की जरूरत है.
स्टार्टअप इंडिया और मुद्रा योजना को जमीं पर उतारना होगा
झारखंड में बेरोजगारी दूर करने के लिये स्टार्टअप इंडिया और मुद्रा योजना कारगर हो सकती है. बशर्ते इसे बेहतर तरीके से लागू किया जाये. इस तरह की योजना में 30 से 40 साल तक के लोग जुड़ सकते हैं.
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जिनके सामने पारिवारिक जिम्मेवारी भी है. वे इन योजनाओं से खुद का रोजगार कर दूसरे को भी रोजगार दे सकते हैं. इससे काफी हद तक बेरोजगारी में अंकुश लगाया जा सकता है. इसकी सही मॉनिटिरिंग भी जरूरी है.
झारखंड में बढ़ गई है शिक्षित बेरोजगारी
वर्तमान हालात में शिक्षित बेरोजगारी भी बढ़ गई है. शिक्षित होने के बाद लोगों की उम्मीदें काफी बढ़ जाती हैं. इस केटेगरी में 25 से 30 साल के बीच बेरोजगारों की संख्या अधिक है.
इसके पीछे वजह यह है कि ये साधारण काम के लिये तैयार नहीं होते, उनके अंदर यह भावना आ जाती है कि बेहतर रोजगार के लिये क्यों न थोड़ा इंतजार किया जाये. इस वजह से वे साधारण काम के लिये उपलब्ध नहीं रहते.
वे अपने मन मुताबिक काम के लिये इंतजार करना पसंद करते हैं. यह एक तरह से छिपी हुई बेरोजगारी है. दूसरे शब्दों में इसे महत्वाकांक्षी बेरोजगारी भी कहा जा सकता है. सरकार को क्वालिटी ऑफ एजुकेशन पर भी ध्यान देना होगा. जिससे सही समय पर प्लेसमेंट हो सके.
मोमेंटम झारखंड का असर तुरंत नहीं मिल पायेगा
राज्य सरकार ने प्रदेश में उद्योगों की स्थापना के साथ रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिये मोमेंटम झारखंड का आयोजन किया था. इस तरह का आयोजन पश्चिम बंगाल में भी हुआ था, लेकिन परिणाम आने में वक्त लगेगा.
इसके पीछे वजह यह भी है कि निजी क्षेत्र में जिस अनुपात में उद्यमिता का विकास होना चाहिये था, वह अब तक नहीं हो पाया है. इसके लिये प्रशिक्षण में क्वालिटी भी होना जरूरी है.
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कम पढ़े-लिखे लोगों के लिये रोजगार में परेशानी नहीं
डॉ दयाल ने बताया कि जो कम पढ़े-लिखे हैं, गरीब हैं, उन्हें रोजगार के लिये उतनी परेशानी नहीं होती. क्योंकि वे रिक्शा चलाकर भी अपना जीवन यापन कर सकते हैं. लेकिन एक बीए पास रिक्शा चलाने में हिचकिचायेगा.
इसके पीछे उसकी मंशा यह रहती है कि बेहतर रोजगार मिले. नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट भी यही कहती है कि पोस्ट ग्रेजुएट में 45.9 फीसदी, ग्रेजुएट में 48.8 फीसदी, अंडर ग्रेजुएशन में 25 फीसदी, हायर सेकेंडरी में 28.7 फीसदी , प्राथमिक शिक्षा में 10.1 और प्राथमिक से कम पढ़े लिखे लोगों में 5.5 फीसदी बेरोजगारी है.
हाल के वर्षों में झारखंड में सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी तक पढ़े युवाओं की संख्या बढ़ी है. लेकिन उच्च शिक्षा में युवाओं का अनुपात 8 फीसदी से भी कम है.
अर्थशास्त्री सह प्रोफेसर (संत जेवियर कॉलेज,रांची) से हुई बातचीत पर आधारित.




