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झारखंड बीजेपी, मुख्यमंत्री रघुवर दास, उनकी सरकार और सरयू राय की पेशकश

सरयू राय की पेशकश पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और प्रवक्ता का बयान बताता है कि पार्टी राजनैतिक तौर पर बैकफुट पर है.

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Faisal Anurag

झारखंड सरकार के मंत्री सरयू राय के पत्र और सरकार से अलग होने की पेशकश पर मुख्यमंत्री रघुवर दास की चुप्पी की चर्चा आम है. सरयू राय प्रकरण ने झारखंड बीजेपी की कलह को भी सामने ला दिया है. सरयू राय की पेशकश पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और प्रवक्ता का बयान बताता है कि पार्टी राजनैतिक तौर पर बैकफुट पर है. इससे यह भी पता चलता है कि झारखंड बीजेपी में संवेदनहीनता के हालात हैं. इससे यह भी जाहिर होता है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास से सवाल करने की हालत में पार्टी नहीं है.

सरयू राय ने साफ कहा है कि वे सरकार में शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह उन्हें सरकार से अलग होने की इजाजत दें. केंद्रीय नेतृत्व का रूख अब तक स्पष्ट नहीं है. सरयू राय ने ही अपने पत्र में कहा है कि वे 2017 में प्रधानमंत्री से मिलकर इस्तीफे की पेशकश की थी.  प्रधानमंत्री ने हालात ठीक करने का भरोसा दिया था. सरयू राय अब कह कह रहे हैं कि 2017 की तुलना में हालात और ज्यादा खराब हो गए हैं. पिछले सालों में सरयू राय ने न केवल सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाया है बल्कि भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए हैं. इन सब आरोपों पर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खोमाशी का चादर ओढ़े रखा है.

रघुवर दास के पक्ष में मोर्चा पार्टी प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने खोला है और वे सरयू राय को पार्टी अनुशासन का पाठ पढ़ा रहे हैं. एक अन्य प्रवक्ता दीपक प्रकाश ने कहा है कि सरयू राय के पत्र के बाबत पार्टी को जानकारी नहीं है. दूसरी ओर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कह रहे हैं कि उनसे मिलकर सरयू राय ने अपना पक्ष रखा था. विवाद सुलझाने के लिए वे फिर सरयू राय से बात करेंगे. इतने अंतरविरोधी बयानों से जाहिर है कि पार्टी प्रवक्ताओं और पार्टी अध्यक्ष के बीच भी संवादहीनता है. प्रतुल शाहदेव ने सरयू राय प्रकरण पर तल्ख टिप्पणी कर मुख्यमंत्री का बचाव किया है. लगता है कि पार्टी आरोपों को सुनने के लिए भी तैयार नहीं है. प्रतुल शाहदेव कह रहे हैं कि सरयू राय को पार्टी फोरम पर ही अपनी बात रखनी चाहिए और पत्र को लीक नहीं करना चाहिए. सवाल उठता है कि राज्य में क्या कोई ऐसा पार्टी फोरम है जिसपर मुख्यमंत्री के संदर्भ में सवाल उठाया जा सकता है. कई बार देखा गया है कि किस तरह अपनी बात रखने वाले को चुप करा दिया जाता है. सीमा शर्मा का प्रकरण तो उजागर भी हो चुका है. कई बार यह भी देखा गया है कि रघुवर दास वरीय नेताओं को चुप कराकर अपने नए लोगों से तारीफ करवाते रहे हैं. इसके कई उदाहरण मौजूद हैं. सरयू राय ने पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री से 2017 में ही शिकायत की थी. क्या वह पार्टी फोरम का हिस्सा नहीं है.

पूरे प्रकरण में उन सवालों को चर्चा से गौण करने की कोशिश दिख रही है, जो सरकार के कामकाज के तरीके और गड़बड़ी को उजागर करते हैं. भाजपा प्रवक्ताओं के बयान इसी कोशिश का हिस्सा दिखते हैं. सवाल तो यह भी किया जा रहा है कि आखिर भाजपा और सरकार की पूरी कोशिश भ्रष्टाचार के मामले को दरकिनार करने की क्यों है. क्या बेदाग सरकार की बात करने वाले रघुवर दास सरयू राय के आरोपों पर सार्वजनिक बयान देने का साहस दिखा सकेंगे. सरयू राय ने यह कहकर एक तरह से सरकार को सवालों को घेरे में ला खड़ा किया है कि उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी अपना अभियान लालू यादव और मधु कोड़ा के खिलाफ फैसलाकुन बनाया. दोनों नेताओं को इस कारण जेल जाना पड़ा और चुनाव की अर्हता से वंचित होना पड़ा. सरयू राय की इस बात के गहरे निहितार्थ को भाजपा और सरकार में बैठे लोग बाखूबी समझ रहे हैं.

क्या झारखंड बीजेपी अपने ही एक मंत्री के आरोपों की रोशनी पर भी मुख्यमंत्री से सवाल करेगी या फिर सरयू राय को मंत्रीपरिषद से बाहर कर सकेगी. झारखंड बीजेपी के सामने अब यही दो विकल्प हैं. सरयू राय के भी विकल्प सीमित हो गए हैं. क्या अमित शाह सरयू राय के नए आरोपों के संदर्भ में कठोर कदम उठा सकेंगे. यह सवाल भी राजनीतिक गलियारे में इस वक्त गर्माया हुआ है.

झारखंड बीजेपी का वर्तमान संकट उसके घर से पैदा हुआ है और विपक्ष के आरोपों की पुष्टि ही करता है. मुख्यमंत्री की मनमानी करने की प्रवृति पर सवाल उठाकर सरयू राय ने भाजपा नेताओं के विकल्प भी सीमित कर दिए हैं.

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