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झारखंड की बालू कथा (2): नदियों पर डाला जा रहा डाका, बीमार हुई जुमार, अब कांची व कारो की बारी 

Ranchi: नदियों से समय समय पर बालू का उठाव जरूरी भी है. कंस्ट्रक्शन वर्क की बात हो या दूसरी जरूरतों के लिये. पर बालू के लिये बेतहाशा उठाव अब चिंता की बात है. कांके में बहने वाली जुमार नदी 20 सालों पहले तक बालू का भरपूर स्टॉक रखती थी. पर बालू के लगातार उठाव के कारण बर्बाद होने के कगार पर है. जो स्थिति बनी हुई है, बालू के जरिये अपने हसरतों का महल खड़ा करने को बालू माफिया अब रांची के कांची और कोरो नदी को टारगेट कर चुके हैं. बेतहाशा होते अवैध खनन से नदी तो खतरे में है ही, कुदरती संतुलन भी बिगड़ने के संकेत दिखने लगे हैं.

 

40 बिलियन बालू का उठाव

पर्यावरणविद नीतीश प्रियदर्शी कहते हैं कि दुनिया में हर साल 40 बिलियन टन बालू का उपयोग अलग अलग निर्माण कार्यों में किया जाता है. झारखंड में भी नदियों से बालू का उठाव होता है. बालू की मारामारी के बीच राज्य में 3000 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं पर गहरा असर पड़ा है. पर इससे इतर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं. आखिर रेत के कारोबार की खातिर नदियों को ही खत्म किये जाने का दुस्साहस कब बंद होगा. समस्या यह है कि उत्तर भारत की अधिकांश नदियों से हिमालय से पानी आता रहता है. वे बारहमासी बनी रहती हैं.

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पर झारखंड की नदियां बरसाती हैं. बालू का जरूरत से ज्यादा उठाव किये जाने से उनका इको-सिस्टम बिगड़ जाता है. जीव-जंतुओं का जो कुदरती तालमेल बालू और नदियों के पानी के जरिये है, वह असंतुलित होता है. कायदे से बालू की मात्रा संतुलित रहने पर ही गर्मियों के दिनों में यहां की नदियों में थोड़ा थोड़ा पानी नजर आता है. बालू पानी को फिल्टर भी करता है. वास्तव में बालू और जंगल नदियों के पानी के लिये प्राण वायु है. नदियों के लिये फिक्स्ड डिपॉजिट है. बालू भूमिगत जल को कैच करता है. पानी को रिसाइकल करते हुए उसमें कई नये पौष्टिक तत्वों को बनाये रखता है. रांची–टाटा रोड में बहने वाली कांची नदी और रांची के बेड़ो, लापुंग इलाकों में बहने वाली कारो नदी का बालू ऐसे ही कारणों से लोगों की डिमांड में रहता है. बालू में खनिज संपदा का भी सोर्स रहता है. बालू की जांच से पता चल जाता है कि आसपास के चट्टानों में कौन कौन से खनिज हैं. स्वर्णरेखा नदी में स्वर्ण कण, शंख नदी में हीरा पाये जाने की चर्चा जहांगीरनामा औऱ दूसरी किताबों में भी चर्चा में रही है. रांची के पुराने लोग कहते हैं कि 50 साल पहले तक तो शहर के बीच बहने वाली हरमू नदी से भी बालू का उठाव होता था. बैलगाड़ियों से बालू उठाया जाता था पर लोगों की बढ़ती लालसा में सब स्वाहा हो गया.

 

कैसे की जाये पहल

नदियों से बालू के उठाव के लिये सरकार को अधिक जिम्मेदारी लेनी होगी. कांची, कोरो सहित दूसरी नदियों के उन हिस्सों से बालू का उठाव होना चाहिये. जहां सरप्लस बालू रहता है. इसके अलावे किनारे के कुछ हिस्सों को छोड़कर ही बालू का उठाव तय हो. रिमार्क किया जाना चाहिये कि कहां कहां से और अलग अलग समय में (प्रतिदिन, साप्ताहिक, मासिक या अन्य) कितनी मात्रा में उठाव किया जायेगा. इसमें स्थानीय ग्रामीणों, वैज्ञानिकों, एक्सपर्ट की राय और मदद ली जा सकती है.

 

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