Opinion

यूपी में पिछड़ों और दलितों के पास है सत्ता तक पहुंचने की चाबी

जो फर्स्ट डिविजन पास, सत्ता उसी के हाथ

Gyan Ranjan

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का ऐलान होते ही अब यूपी की विधानसभा सीटों पर प्रत्याशियों को लेकर तमाम राजनीतिक दलों में मंथन शुरू हो गया है. यह वह सूबा है जहां पिछड़ा वर्ग और दलितों का अधिकांश सीटों पर वर्चस्व है. सवर्ण भी यूपी की कई सीटों पर गहरा प्रभाव रखते हैं, लेकिन यहां उनकी आबादी आंकड़ों के लिहाज से दलित और पिछड़ा से कम है. पिछले चुनाव में बीजेपी को सबसे ज्यादा सवर्णों और पिछड़ों का वोट हासिल हुआ था, जिसके बूते उसने 300 पार का ऐतिहासिक आंकड़ा छू लिया था. इस बार भी बीजेपी सवर्णों को साधने के साथ पिछड़ा और दलितों को अपने पाले में खींचने की पूरी कोशिश में है. सीटों के बंटवारे में भी यह फार्मूला नजर आ सकता है. वहीं सपा और बसपा पहले ही अपने पिछड़ा और दलित वोटरों के उनके साथ ही होने का दावा करते देखे गए हैं.

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उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर जातीय समीकरणों को नकारा नहीं जा सकता. जातीय समीकरणों का जो अनुमानित आंकड़ा बताया जाता है उसमें पहले नंबर पर पिछड़ा वर्ग का है. वहीं दूसरे नंबर पर दलित और तीसरे पर सवर्ण व चौथे पर मुस्लिमों को बताया जाता है. जो अनुमानित आंकड़े सामने हैं उनमें ओबीसी वोटर्स की संख्या सबसे अधिक 42 से 45 फीसदी बताई जा रही है. यूपी में दलित वोटरों की संख्या करीब 21 से 22 फीसदी है. वहीं सवर्ण तबके की अनुमानित संख्या 18 से 20 फीसदी है. इसके साथ ही मुस्लिम वोटर भी यूपी की राजनीति में कई सीटों पर गहरा प्रभाव रखते हैं. यहां मुसलमान वोटरों की संख्या करीब 16 से 18 फीसदी बताई जाती है.

उत्तर प्रदेश की विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए 84 सीटें आरक्षित हैं. इन सीटों पर सभी राजनीतिक दलों का जोर रहता है, क्योंकि यह सीटें ही सीएम के कुर्सी तक पहुंचाने का रास्ता भी तय करती हैं. इस बार भी इन सीटों पर सबकी नजर है. 2017 के चुनाव में बसपा के कमजोर होने से बीजेपी को इन सीटों पर बड़ा फायदा मिला था. इस बार भी वह यहां प्रत्याशियों को मैदान में उतारकर काबिज होने के लिए ताकत झोंक रही है. वहीं मायावती का भी अपनी दलित राजनीति के जरिए इन्हीं सीटों पर जोर है. इस बार बसपा दलित ब्राह्मण को एक साथ लाने के वादों के साथ इन सीटों पर प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में है. सपा भी इन सीटों पर जोर लगा रही है. जिस राजनीतिक दल को पिछड़ा और दलित समुदाय का वोट मिलता है वही यहां पूर्ण बहुमत की सरकार बना पाती है.

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लेकिन 2014 के बाद से इन दोनों क्षेत्रिय दलों का समीकरण गड़बड़ा गया है. दरअसल, भाजपा ने बसपा के गैर-जाटव दलित वोट बैंक और सपा के गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी कर दी है. यह ट्रेंड 2014 के लोकसभा, 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में ही रहा है. तभी तो 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद समाजवादी पार्टी को सत्ता गंवानी पड़ी. वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा और रालोद से महागठबंधन के बावजूद भाजपा 80 में से 62 सीटें जीतने में कामयाब रही. सीएसडीएस के एक सर्वे की मानें तो 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में यादव, कुर्मी और जाट को छोड़कर ओबीसी में शामिल अन्य जातियों के 60 प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा को वोट किया. वैसे भी कुर्मी और जाट वोट बैंक का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ था. सीएसडीएस का ही एक अन्य सर्वे कहता है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में ओबीसी वर्ग के 47प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा को वोट किया. वहीं सपा को 29 प्रतिशत और बसपा को 9 प्रतिशत ने वोट किया.

21 प्रतिशत से अधिक दलित आबादी की प्रदेश की राजनीति में सदैव महत्वपूर्ण भूमिका रही है. आजादी के बाद से कांग्रेस के साथ रहने वाला दलित वोट बैंक पिछले तीन दशक के दौरान बहुजन समाज पार्टी के साथ खड़ा दिखाई देता रहा. हालांकि, हालिया चुनावी नतीजे बसपा से भी दलित वोट बैंक के खिसकने का संकेत देते रहे हैं. भाजपा, दलित वोट बैंक में सेंध लगाने में काफी हद तक कामयाब होती दिख रही है. कांग्रेस सहित दूसरी राजनीतिक पार्टियों में भी इस वोट बैंक को लेकर खींचतान है. पिछले एक दशक से दलित मतों में दूसरी पार्टियों की बढ़ती सेंधमारी का ही नतीजा है कि मायावती को जहां वर्ष 2012 में अपनी सत्ता गंवानी पड़ी वहीं वर्ष 2014 में बसपा लोकसभा में शून्य पर सिमट कर रह गई. हाल के वर्षों में बसपा से खिसकते दलित वोट बैंक को साधने में भाजपा ही सबसे आगे रही है.

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आजादी के बाद से दलितों के वोट थोक में कांग्रेस के हाथ ही लगते थे लेकिन कांशीराम-मायावती द्वारा दलितों-शोषितों की आवाज बुलंद किए जाने से दलित वोट बैंक कांग्रेस से खिसक कर कांशीराम की बसपा में आता गया. कांग्रेस से दलितों के छिटकने का नतीजा यह रहा कि पिछले ढाई दशक के चुनावों में यह पार्टी कभी भी एक दर्जन से ज्यादा सुरक्षित सीटें हासिल नहीं कर सकी. पहले कांशीराम और फिर मायावती का दलितों पर कुछ इस तरह का जादू चला कि बसपा वर्ष 2007 में अपने दम पर सरकार बनाने तक में कामयाब रही. दलितों में खासतौर से जाटव मतदाता के बीच मायावती की पैठ से तो अब भी इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन आरक्षित सीटों पर पार्टी के खराब होते प्रदर्शन के पीछे दलित वोटों का बिखराव ही माना जा रहा है.

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