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बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लिखा पत्र, कहा- कागजों पर इंस्टॉल हुए 574 वेंटिलेटर

Ranchi : बीजेपी नेता बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को खुला पत्र लिखा है. इस पत्र के माध्यम से उन्होंने मुख्यमंत्री का ध्यान कई मुद्दों पर दिलाने की कोशिश की है. उन्होंने लिखा है कि विपदा की यह घड़ी टीका-टिप्पणी के लिए नहीं है.

लेकिन सार्वजनिक जीवन में काम करने के चलते जो भी बातें मेरे संज्ञान में आ रही हैं उन्हें राज्य हित में आपके संज्ञान में लाना हम जैसे लोगों की नैतिक ज़िम्मेदारी है. थोड़ा समय निकाल इस पर ग़ौर करेंगे.

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उन्होंने लिखा है कि राज्य में 574 वेंटिलेटर मिलने और इसके इंस्टॉल करने का जिक्र है जबकि वास्तविकता है कि यह दिखावे का काग़ज़ी आंकड़ा है. इनमें से इक्का-दुक्का नामचीन जगहों को छोड़ कर अधिकांश जगहों पर या तो वास्तव में वेंटिलेटर इंस्टॉल हुए नहीं और अगर कहीं हुए भी तो विभिन्न तकनीकी कारणों से उपयोग में नहीं लाये जा सके.

वहीं उन्होंने लिखा है कि बड़े पैमाने पर कोविड बेड वाले अस्थायी सेंटर्स बनाये जा रहे हैं, यह अच्छी बात है. होनी भी चाहिए. लेकिन फिर क्या कारण है कि लोग अस्पतालों में जगह के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं और घरों में बेइलाज तड़प-तड़प कर मर रहे हैं? यह गंभीर सवाल विचारणीय है.

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अभी वाले कोरोना का जानलेवा क़हर जिस रूप में आया है, उसमें नंबर गिना कर वाहवाही लूटने वाले साधारण कोविड बेड वाले सेंटर्स की नहीं बल्कि आइसीयू, वेंटिलेटर वाले सुविधा युक्त बेड्स की ज़रूरत है. जिसकी कमी के चलते अफ़रातफ़री मची हुई है.

यह भी लिखा है कि आपकी प्राथमिकता जितने कम समय में हो सके आइसीयू और वेंटिलेटर वाले बेड्स को बढ़ा कर/बढ़वा कर ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की जान बचाने के प्रयास का होनी चाहिए न कि खुद घूम-घूम कर ऑक्सीजन रिफिल केन्द्र का मुआयना करने की. यह काम औरों को करने दीजिये और आप जीवन रक्षक बेड की चिंता करिये.

राजधानी रांची में रिम्स, सदर अस्पताल के साथ जो चार-पांच प्रमुख प्राइवेट अस्पताल हैं, जहां कम से कम समय में जीवन रक्षक बेड युक्त सुविधा बना कर लोगों को दिलायी जा सकती है, इस काम पर फ़ोकस करिये.

यत्र-तत्र बेकार पड़े वेंटिलेटर जो वैसी जगहों पर अभी चलवाये ही नहीं जा सकते उन्हें शोभा की वस्तु मत बनाइये. मंगवाईये और जहां कहीं भी उसे उपयोगी बनाया ज़ा सके लगवाइये.

उन्होंने लिखा है कि देवदूत की तरह काम कर रहे सरकारी- ग़ैर सरकारी जीवन रक्षक मेडिकलकर्मी योद्धाओं पर कई गुणा दिन-रात काम के तनाव का भारी दबाव है. उन्हें भरोसे में लीजिये, उनकी पीड़ा समझिए, हौसला अफ़जाई करिये. कहिये कि इस संकट की घड़ी में आपके योगदान का राज्य ही नहीं राष्ट्र ऋणी रहेगा.

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