Opinion

चुनाव आयोग की निष्पक्षता सवालों के दायरे में उलझती जा रही है

Faisal Anurag

निष्पक्षता के लिए सबसे जरूरी तत्व यह है कि भूमिका पारदर्शी और निष्पक्ष दिखनी चाहिए और इसका अहसास भी सभी को होना चाहिए. आम चुनाव के संदर्भ में केद्रीय चुनाव आयोग को लेकर होनेवाली आलोचनाएं लगातार गंभीर होती जा रही हैं. दुनिया भर में भारत के चुनाव आयोग की साख रही है.

अफ्रीका के अनेक देशों ने चुनाव आयोग के परामर्श से अपने अपने देशों में चुनावों का संचालन किया है. टीएन शेषण के कार्यकाल में तो चुनाव आयोग ने अपनी छवि को और भी चमकदार बनाया.

जिसे लिगदांह ने भी नया आयाम दिया. लेकिन इस बार यह कहना थेडा मुश्किल है कि आयोग अपनी इस साख के अनुरूप भूमिका निभा रहा है.  इस तरह का आरोप ने क केवल विपक्ष की ओर से लगाये जा रहे हैं बल्कि कई पूर्व चुनाव आयोग अधिकारियों ने भी अपनी चिंता को सार्वजनिक रूप से जाहिर किया है.

चुनावों पर निगाह रखने वाले स्वतंत्र प्रेक्षकों ने आयोग की भूमिका पर सवाल उठाये हैं.

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सोशल मीडिया पर भी चुनाव आयोग को लेकर टिप्पण्यिों की बाढ़ देखी जा सकती है. यह पहला अवसर है कि आम चुनाव को लेकर इस तरह की बातें की जा रही हैं. चुनाव आयोग तो पिछले कुछ समय से ही विवाद में हैं.

चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों को लेकर भी विवाद होता रहा है. वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त के गुजरात सरकार के अफसर के रूप में कार्यकाल को लकर अनेक समूहों ने उनकी नियुक्ति के वक्त ही सवाल उठाया था.

चुनावों में तो भारत के संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है. यह सुझाव भी अब दिया जा रहा है कि चुनाव आयोग के आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया बदलनी चाहिए और उसके चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाना चाहिये.

ताजा विवाद वाराणसी सीट से जवान तेज बहादुर यादव के पर्चे के रद्द होने से गहरा गया है. तेज बहादुर ने आरोप लगाया है कि उनका नोमिनेशन साजिश के तहत रद्द किया गया है. चुनाव आयोग ने बताया है कि उनका नोमिनेशन तकनीकी आधार पर खारिज किया गया है. विवाद की जड़ यही है.

कानून के जानकार नितिन मेश्राम और प्रशांत भूषण ने कहा है कि ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है और न ही कोई कानूनी प्रावधान है. जिसके तहत तेज बहादुर का नोमिनेशन खारिज किया जा सकता है. तेज बहादुर बीएसएफ से बर्खास्त किये किये थे. अनुशासनहीनता के आरोप में उन्हें बर्खास्त किया गया था.

बर्खास्त कर्मियों के संदर्भ में कानून यह है कि यदि वह भ्रष्टाचार और राज्य के खिलाफ द्रोह का आरोपी है और इस बिना पर बर्खासत किया गया है तो चुनाव के अयोग्य होगा.

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स्पष्ट कानूनी प्रावधान के बावजूद रिटर्निंग अफसर  ने नोटिस जारी कर बर्खास्तगी के मामले में प्रमाणपत्र मांगा और नोटिस जारी करने के 11 घंटे के अंदर उसे पेश करने को कहा. तेज बहादुर चुनाव आयोग गये.

उनके वकील मेश्राम के अनुसार वे 9 बजे आयोग गये. आयोग ने शाम चार बजे का समय फैसले के लिए निर्धारित किया. आयोग ने सीमा सुरक्षा बल से तेजबहादुर की बर्खासतगी का कारण एक घंटे के अंदर बताने को कहा. सुप्रीम कोर्ट के वकील मेश्राम दावा करते हैं कि बीएसएफ ने डेढ़ घंटे में जवाब दे दिया. लेकिन आयोग के अफसरों ने उसे दबाये रखा.

इस बीच भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने आयोग पहुंच कर दबाव बनाया. मेश्राम ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने भाजपा के दबाव पर पर्चा खारिज किया है.

इस बीच नामांकन की देर रात बीएचयू कैंपस में हुई एक हाई प्रोफाइल मीटिंग की चर्चा भी सरेआम है. जिसमें वाराणसी के रिटर्निग अफसर पर्यवेक्षक व कुछ अन्य अधिकारियों की दो शीर्ष भाजपा नेताओं से हुई मुलाकात की भी चर्चा हो रही है.

आरोप है कि तेजबहादुर को चुनाव से अलग किये जाने की रणनीति बनी. यह सारी कवायद समाजवादी पार्टी के टिकट दिये जाने के बाद हुई. सपा ने तेज बहादुर को गठबंधन का प्रत्याशी घोषित किया था.

सवाल उठता है कि एक जवान को रोकने के लिए इस तरह की भूमिका में स्थानीय चुनाव अधिकारी किस तरह शामिल हुए.

चुनाव आयोग जिस तरह आचार संहिता उल्लंघन के मामले में फैसले दे रहा है, उस लेकर भी खूब चर्चा हो रही है.  लातूर के स्थानीय चुनाव अधिकारियों की रिपोर्ट को बदलते हुए जिस तरह आयोग ने चुनाव में सेना के इस्तेमाल के सवाल पर प्रधानमंत्री को क्लिन चिट दिया है, उसे लेकर भी आयोग की भूमिका सवालों के घेरे में है.

आयोग की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने आयोग का पक्ष पूछा है. इसके पहले भी सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद ही चुनाव आयोग ने कुछ नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की. लेकिन अनेक मामलों में उसकी भूमिका संदेहास्पद ही बनी हुई है.

आदर्श आचार संहिता का सख्ती से पालन कराने में जिस तरह आयोग लचर दिख रहा है, इससे लांकतांत्रिक संस्थाओं की साख ही कमजोर हो रही है. देश भर के संवेदनशील लोग, जो किसी भी दल में नहीं है, लेकिन विभिन्न उच्च पदों पर रहे हैं, इस गिरती साख पर संजीदा चिंता व्यक्त कर रहे हैं.

इस बाबत राष्ट्पति को भी पत्र लिखा गया है. जिसमें सेना के रिटायर अधिकारी भी शामिल हैं.

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