
Mumbai : भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने का मामला राजनीतिक दलों के लिए रस़्साकशी का सबब बना गया है. कांग्रेस सहित विपक्षी दल मेादी सरकार पर हमलावर हैं. लेकिन पुणे पुलिस के अनुसार जिन दस मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है, उनसे घटना से जुड़ी डिजिटल बातचीत और साइबर सबूत पुलिस को मिल गये हैं. बताया गया कि इनमें से पांच आरोपी यूपीए-2 के शासनकाल में रडार पर थे. बता दें कि दिसंबर 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने माओवादियों से संबंध रखनेवाले ऐसे 128 संगठनों की पहचान की थी. साथ ही यूपीए सरकार ने कुछ ऐसे शख्स की भी पहचान की थी, जिनका संबंध माओवादियों से संबंधित संगठनों से था.
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लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई देश की सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते थे
पुणे पुलिस ने दावा किया कि मंगलवार को गिरफ्तार पांचों ऐक्टिविस्ट्स सरकार को गिराने के माओवादी षडयंत्र में शामिल थे. पुलिस ने कहा कि उसके पास ईमेल और पत्रों के रूप में इसका पुख्ता सबूत है. इसके अलावा पुलिस का कहना है कि ये आरोपी देश के वरिष्ठ नेताओं को निशाना बनाने की योजना भी बना रहे थे. पुलिस द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि उनके पास जो सबूत है, उससे सीपीआई (माओवादी) की सेंट्रल कमेटी के सीनियर कॉमरेडों की ओर से फंड उपलब्ध कराने, युवाओं को बहकाने के लिए शहरों में नक्सलियों को जिम्मेदारी देने और हथियार उपलब्ध कराने का भी संकेत मिला है. वे मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से नाराज थे और उन्होंने संगठनों, पदाधिकारियों और देश के वरिष्ठ राजनेताओं को निशाना बनाने के बारे में सोचा था.
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एलगार परिषद चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंकने के षड़यंत्र का एक हिस्सा
पुलिस ने दावा किया कि एलगार परिषद चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंकने के बड़े षड़यंत्र का एक हिस्सा था. इस क्रम में सरकारी वकील उज्ज्वल पवार ने सिटी कोर्ट को कहा, यह एक पिरामिड जैसा है, जहां पर सबसे ऊपर का व्यक्ति नीचे व्यक्तियों को ऑर्डर देता है, इन्हीं के आदेशों के अनुसार पुणे में एलगार परिषद आयोजित की गयी थी. इसका मकसद प्रतिबंधित संस्था कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के उग्र विचारों का देश में प्रसार करना और भारत की लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंकना था.
बता दें कि प्रतिबंधित संस्था भारत की सरकार को सालों से उखाड़ फेंकने की मंशा रखती है. इनकी गिरफ्तारी को सही ठहराते हुए उज्जवल पवार ने कहा कि वरवरा राव, अरुण फेरेरिया और वरनॉन गोंजालवेस के अलावा दूसरे आरोपियों ने एक षड़यंत्र पर काम किया.
एंटी फासिस्ट फ्रंट के बैनर तले ही पुणे में एलगार परिषद आयोजित किया गया था. हालांकि बचाव पक्ष के वकील ने सरकारी वकील के आरोपों और तर्कों को बचकाना बताया. वरनॉन गोंजालवेस के वकील रितेश देशमुख ने कहा, आरोप है कि इन लोगों ने एंटी फासिस्ट विचारधारा का समर्थन किया, हमारा सवाल यह है कि इसमें आखिर गलत क्या है? क्या असहमति जताना देश के खिलाफ उठाया गया कदम है.
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