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Medical College Admission: इस साल मेडिकल कॉलेजों में दाखिला क्यों है कठिन, जान‍िए

Sanjay Prasad
Jamshedpur: नेशनल इजिलिबिलिटी कम इंट्रेस टेस्ट (नीट) का रिजल्ट जल्द निकलने वाला है. हर पैरैन्ट्स की एक ही ख्वाहिश होती है कि उनके बच्चे का दाखिला सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हो जाय, क्योंकि वे करोड़ों रुपए खर्च कर बच्चों को प्राइवेट कॉलेजों में नहीं पढ़ा पाएंगे. लेकिन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीट मिलना बेहद मुश्किल है. इस साल सीट पाना इसलिए भी कठिन है क्योंकि आवेदकों की संख्या सबसे ज्यादा रही है. इस साल आवेदकों की संख्या लगभग 19 लाख है. जबकि नेशनल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) यानि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के अनुसार भारत में केवल 562 मेडिकल कॉलेज हैं, जो वर्तमान में 86,649 सीटों की पेशकश करते हैं. इसमें से सरकारी कॉलेजों में लगभग 40 हजार के करीब सीटें हैं. 2014 में नीट के अस्तित्व में आने के बाद से मेडिकल कॉलेजों ने एमबीबीएस (बैचलर ऑफ मेडिसिन, बैचलर ऑफ सर्जरी) कोर्स के लिए औसतन लगभग 50,000-80,000 सीटों की पेशकश की है. 2018 से 2021 तक हर साल औसतन 14 लाख छात्र परीक्षा देते हैं. यह 80,000 उपलब्ध सीटों के लिए केवल 5 प्रतिशत सीटें है.

प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में करोड़ से ऊपर फीस
एम्स प्रति वर्ष केवल 5,000 रुपये का शुल्क लेता है, जबकि सबसे महंगे में से एक पणजी में गोवा मेडिकल कॉलेज है, जिसकी सालाना फीस एक लाख रुपए है. लेकिन निजी संस्थानों में यह फीस काफी है. सालाना 20 लाख से 25 लाख रुपए ये कॉलेज लेते हैं. ऐसे में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में निम्न और मध्यम वर्ग के उम्मीदवारों के लिए दाखिला लेना मुश्किल होता है. इन कॉलेजों में वहीं आवेदक दाखिला ले पाते हैं जिनके पैरेन्ट्स के पास करोड़ों-अरबों की संपत्ति होती है.

720 में से 700 के पार अंक लाने वालों को मिलता है अच्छा सरकारी मेडिकल कॉलेज

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भारत में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला के लिए कट-ऑफ 720 में से 700 अंक के पार जाता है. 500 से कम अंक प्राप्त करने वालों के पास सरकारी कॉलेजों में दाखिला लेने का कोई मौका नहीं होता है. सरकारी कॉलेजों में उपलब्ध लगभग 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित वर्ग के छात्रों को मिलती हैं. बाकी छात्रों के पास सिर्फ दो विकल्प बचते हैं. या तो वे अगले साल परीक्षा के लिए दोबारा तैयारी करें अच्छे अंक प्राप्त करें या फिर रूस, यूक्रेन और चीन जैसे देशों में जाएं.

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भारत सरकार स्वास्थ्य पर केवल 1.35 फीसदी खर्च करती है

भारत सरकार अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.35 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करती है. जब भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का एक प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करता है, तो अधिक कॉलेज कैसे खुलेंगे? हमें स्वास्थ्य पर अधिक खर्च करना शुरू करना होगा.

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