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अयोध्या विवादः मध्यस्थता के विकल्प पर SC का जोर, 6 हफ्तों के लिए टली सुनवाई

New Delhi: उच्चतम न्यायालय ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले पर मंगलवार को सुनवाई की. मामले पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्था के विकल्प को तलाशने की बात कही. वहीं दस्तावेजों के अनुवाद पर संशय की स्थिति को देखते हुए मामले की सुनवाई छह हफ्तों के लिए टाल दी है.

पीठ ने विवाद पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि ट्रांसलेशन पर सहमति बनाई जा सके, इसके लिए सुनवाई अगले 6 हफ्ते तक के लिए टाली जा रही है. ज्ञात हो कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस. ए. बोबड़े, न्यायमूर्ति धनंजय वाई. चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर की पांच सदस्यीय पीठ मामले की सुनवाई कर रही है.

दस्तावेजों के अनुवाद को लेकर पक्षों में मतभेद- CJI

उच्चतम न्यायालय ने मामले में दस्तावेजों की स्थिति और मामले से जुड़े सीलबंद रिकॉर्ड पर सेक्रेटरी जनरल की ओर से दायर रिपोर्टों की प्रतियों का जिक्र किया. इस दौरान भारत के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने दोनों पक्षों के वकीलों से कहा कि वे दस्तावेजों की स्थिति पर न्यायालय के सेक्रेटरी जनरल की रिपोर्ट का अध्ययन करें.

न्यायालय ने कहा, यदि अभी सभी पक्षों को दस्तावेजों का अनुवाद स्वीकार्य है तो वह सुनवाई शुरू होने के बाद उसपर सवाल नहीं उठा सकेंगे. जिसपर मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि उन्होंने अभी तक अनुवादित दस्तावेजों का अध्ययन नहीं किया है. अधिवक्ता धवन ने ये भी कहा कि दस्तावेजों के अनुवाद की गुणवत्ता को परखना होगा.

उच्चतम न्यायालय ने पक्षों से वह आदेश प्रस्तुत करने को कहा जिसके तहत वे उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दायर अनुवादित दस्तावेजों पर राजी हुए थे. वहीं राम लला की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने कहा कि दिसंबर 2017 में सभी पक्षों ने अनुवादों का सत्यापन कर उन्हें स्वीकार किया था. साथ ही कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के अनुवाद की जांच के लिये आदेश दिये गये थे और अब दो साल बाद इसपर आपत्ति की जा रही है.

वहीं दस्तावेजों के अनुवाद पर सहमति नहीं बनती देख सीजेआई ने कहा कि दस्तावेजों के अनुवाद को लेकर पक्षों के बीच मतभेद पनप रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यदि दस्तावेजों के अनुवाद पर विवाद जारी रहा तो हम इस पर अपना समय बर्बाद नहीं करने जा रहे. साथ ही मुख्य न्यायाधीश ने मुस्लिम पक्षों से पूछा कि उन्हें अनुवादों को परखने के लिये कितना समय चाहिये, इसपर धवन ने आठ से 12 सप्ताह का समय मांगा.

‘मध्यस्थता पर सुनवाई 5 मार्च को’

कोर्ट ने इस मामले में एक और अहम टिप्पणी करते हुए मध्यस्थता के प्रयास पर जोर दिया. कोर्ट ने सलाह देते हुए कहा कि यदि एक प्रतिशत भी संभावना है तो मध्यस्थता की जानी चाहिए. उच्चतम न्यायालय ने ये भी कहा अदालत का समय बचाने के लिए अयोध्या विवाद को न्यायालय द्वारा नियुक्त मध्यस्थ के पास भेजने या नहीं भेजने के बारे में पांच मार्च को आदेश देगी.

उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2010 में अयोध्या विवाद को लेकर अपना फैसला सुनाया था. जिसमें स्थित 2.77 एकड़ की विवादित भूमि तीन पक्षों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच बांट दिये जाने की बात कही गई थी. इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में 14 याचिकाएं दाखिल की गई हैं.

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