
Rana Pratap Singh
Ranchi. झारखंड हाई कोर्ट ने सजा के खिलाफ अपील के दो अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने 1997 के एक हत्याकांड के 14 आरोपीयों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने बेरमो के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 31 जुलाई 2002 को सुनाए गए दोषसिद्धि के फैसले को रद्द कर दिया।
कुर्पानिया मोड़ पर 27 मार्च 1997 को गंगा देव सिंह नामक होटल मालिक की 100-150 उपद्रवियों ने लाठी, भाला और गडासा से पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। मृतक की बेटी रूपा देवी के फर्दबयान पर गांधी नगर थाने में एफआईआर दर्ज हुई थी। 15 नामजद आरोपियों में से एक फरार था, बाकी 14 के खिलाफ ट्रायल चला। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें धारा 148, 302/149 और 325/149 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया था। सजा में उम्रकैद सहित विभिन्न अवधि की कड़ी सजा दी गई थी।
इस मामले में सजा के खिलाफ अपीलकर्ता की अपील पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। मुख्य गवाहों के बयानों का गलत आकलन हुआ और कानूनी त्रुटियां हुईं।
वही, सजा के खिलाफ अपील के एक दूसरे मामले में हाई कोर्ट के न्यायाममूर्ति रंगन मुखोपाध्याय की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने ही फैसला सुनते हुए
पलामू के लेसलीगंज के एक मामले में छह आरोपियों की हत्या और अपहरण की सजा को रद्द कर दिया है।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि “संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता।” ये मामले वर्ष 2000 में दर्ज एक मामले से संबंधित हैं, जिसमें आरोपियों पर फर्जी बहस के बहाने मृतक के पिता को जंगल में ले जाने और हत्या करने का आरोप था। पलामू की अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने 2003 में आरोपियों को आईपीसी की धारा 302/34 (हत्या) और 364 (अपहरण) के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
इसके अलावा, धारा 201 (सबूत नष्ट करना) के तहत 7 साल की सजा भी सुनाई गई थी। अपने फैसले में हाई कोर्ट ने कहा की मामले में केवल जमीन विवाद को लेकर आरोपियों पर हत्या का आरोप लगाना उचित नहीं था। हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने गवाहों की गवाही और सबूतों की पूरी तरह जांच नहीं की और केवल शक और अनुमान के आधार पर फैसला सुनाया गया। इस मामले में आरोपी ग्राम गोरडीह, थाना लेसलीगंज, जिला पलामू के निवासी हैं।




