
Ranchi : देश में आम चुनाव-2019 जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, राजनीतिक दल, चाहे वह क्षेत्रीय हों या राष्ट्रीय, वे चुनाव की रणनीति बनाने में लगे हैं. दूसरी ओर सामाजिक संगठनों द्वारा भी मतदाता जागरूकता के साथ-साथ जनमुद्दे को लेकर बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया है. 27 अक्टूबर को मुंबई में एक बैठक में 41 से अधिक सामाजिक संगठनों ने शिरकत की, जिसमें जनतंत्र की सुरक्षा के सवाल पर मतदाताओं में जागरूकता लाने की बात पर सहमति बनी. मुंबई में राइजेज टू सेव डेमोक्रेसी के बैनर तले जमा हुए सामाजिक संगठनों ने यूएपीए कानून को निरस्त करने की मांग के साथ ही जनतांत्रिक अधिकारों को लेकर काम कर रहे कार्यकर्ताओं की अभिव्यक्ति की आजादी को छीने जाने और उन पर हो रही हिंसा और संवैधानिक अधिकारों पर हो रहे हमले पर तत्काल रोक लगाने की वकालत की गयी.
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युवा पीढ़ी को ब्रेनवॉश कर गुलाम बनाने के सरकार के प्रयास को विफल करने का आह्वान
इसी कड़ी में 31 अक्टूबर को रायपुर में हुई सामाजिक और लोकतांत्रिक संगठनों की बैठक में देश के आर्थिक हालात पर गहन विचार-विमर्श किया गया. संगठनों ने एक सुर में कहा कि देश में फासीवादी, अधिनायकवादी, अलोकतांत्रिक और कॉर्पोरेट हित के लिए काम करनेवाले उम्मीदवारों को परास्त करने के लिए चुनावी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने का प्रयास किया जायेगा. वहीं, संवैधानिक मूल्यों को और सिद्धांतों को बरकरार रखने के लिए सघन अभियान छेड़े जाने पर भी जोर दिया गया. देश के हालात को भी लेकर विमर्श में सवाल उभरे, जिसमें कॉर्पोरेट के पक्ष में सरकार द्वारा काम करने, भ्रम फैलाने और युवा पीढ़ी का ब्रेनवॉश कर उन्हें गुलाम बनाने के हो रहे प्रयास को असफल करने के लिए नागरिक संगठनों का आह्वान किया गया.
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यूएपीए को निरस्त करने और सभी झूठे मुकदमे वापस लेने की मांग
मुंबई और रायपुर में हुए सम्मेलन में कई प्रस्ताव भी लाये गये. इसमें भीमा-कोरेगांव प्रकरण में कथित हिंसा से संबंधित सभी जनतांत्रिक अधिकार कार्यकर्ताओं, कर्मचारियों, परिवारों की त्वरित और निःशर्त रिहाई की मांग, देश में कार्यकर्ताओं, कर्मचारियों, दलितों, मुसलामानों, आदिवासियों के खिलाफ यूएपीए के तहत लगाये गये सभी झूठे आरोपों को वापस लिया जाये, भीमा-कोरेगांव हिंसा के असली दोषियों मनोहर भीडे और मिलिंद एकबोटे जैसे हिंदूवादी नेताओं को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ कानून के तहत विधिवत मुकदमा चलाया जाये, दमनात्मक कानून यूएपीए को निरस्त किया जाये, नगरीय-समाज में जनतांत्रिक अधिकारों के कार्यकर्ताओं के असहमति के स्वरों की अभिव्यक्ति को राज्य द्वारा हमले, अपराधीकरण और प्रतिहिंसा पैदा कर और संवैधानिक आजादियों को कुचलने पर तत्काल रोक लगे. पत्रकारों पर लगातार होनेवाले कातिलाना हमलों और उन्हें स्वतंत्र पत्रकारिता से वंचित रखने के तौर-तरीकों की यह सम्मेलन घोर निंदा करता है, जिसमें सरकार और मीडिया घरानों की मिलीभगत खुलकर सामने आ चुकी है. सम्मेलन में जनवादी, लोकतात्रिक, शांतिप्रिय संगठनों और नागरिकों से अपील की गयी कि आगामी चुनाव में फासीवादी, अधिनायकवादी, अलोकतांत्रिक, कॉर्पोरेट जगत के उम्मीदारों को परास्त करने के लिए चुनावी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभायें और संवैधानिक मूल्यों और सिद्धांतों को बरकरार रखने के लिए सघन अभियान छेड़ें.




