
Naveen Sharma
Ranchi : बॉलीवुड में जहां फिल्म निर्माण और निर्देशन में महिलाओं की उपस्थिति लगभग नगण्य दिखाई देती है, लेकिन एक महिला ऐसी भी है जिसने पुरुषों के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करायी है. जी हम बात कर रहे हैं प्रसिद्ध फिल्म निर्माता और निर्देशक मीरा नायर की. आज उनका जन्मदिन है तो ये अच्छा मौका है कि हम उनकी जीवन यात्रा और उनकी फिल्मों के बारे में विस्तार से जानें.
लिटरेचर में रूचि ने बनायी फिल्मों की राह
मीरा का जन्म ओडिशा की इस्पात नगरी राउरकेला में हुआ था.इसके बाद दिल्ली में प्रारंभिक स्कूली पढ़ाई हुई. शिमला जाकर उन्होंने स्कूली शिक्षा को जारी रखा. अपने स्कूली दिनों से ही मीरा नायर पढ़ाई में काफी अच्छी थीं और इनकी लिटरेचर में रूचि जगी.
कहानियाँ, कविताएं और उपन्यास उन्हें हर तरह का लिटरेचर पढ़ने की आदत थी. मुख्यतः उन्हें इंग्लिश लिटरेचर बहुत पसंद था. इंग्लिश लिटरेचर के जरिए उन्होंने छोटी सी उम्र में उस दुनिया के बारे में जाना जो उन्हें बहुत अनजान थी. अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मीरा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से कॉलेज पूरा किया.
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाई की, एक्टिंग शुरू की
बाद में उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में जाके अपनी पढ़ाई जारी रखी. इतने सालों के दरमियान एक चीज़ जो उनके साथ जुड़ी रही वो था उनका लिटरेचर के प्रति प्यार. हालांकि, जब वो हार्वर्ड पहुंची तो वहां वो लिटरेचर से थोड़ा दूर हो गई और उन्होंने एक्टिंग को अपना नया पैशन बना लिया.
मीरा नायर आज भले ही एक बड़ी फिल्म डायरेक्टर हैं मगर लिटरेचर और एक्टिंग उनकी असली पसंद थीं. इतना ही नहीं मीरा ने बाकायदा कई प्ले में एक्टिंग भी की. उनकी एक्टिंग इतनी बढ़िया थी कि अपने एक थिएटर प्रोग्राम के लिए उन्हें पुरस्कार भी मिला. एक्टिंग में मीरा काफी बेहतर कर रही थीं, मगर किस्मत ने उनके लिए कोई और ही राह तय की थी.
पहली डॉक्यूमेंटरी दिल्ली की जामा मस्जिद पर बनायी
मीरा की फिल्म मेकिंग में दिलचस्पी जागने लगी थी. उनका मानना था कि फिल्म बनाना एक्टिंग करने से ज्यादा क्रिएटिव काम है क्योंकि आपको एक बार में कई चीज़ों का ध्यान रखना होता था. यूँ तो मीरा फीचर फिल्म बनाना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने अपनी शुरुआत डॉक्यूमेंटरी बनाकर करनी चाही.
मीरा भले ही विदेश में पढ़ रही थीं मगर वो अपनी फिल्मों के जरिए भारत को दिखाना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने अपनी जिंदगी की सबसे पहली डॉक्यूमेंटरी के लिए दिल्ली के जामा मस्जिद को चुना. 18 मिनट लंबी इस ब्लैक एंड वाइट डॉक्यूमेंटरी में उन्होंने पुरानी दिल्ली की गलियों और लोगों को कुछ इस तरह से दिखाया कि हर कोई उनके काम का कायल हो गया.
साल 1982 में उन्होंने अपनी दूसरी डॉक्यूमेंटरी ‘So Far From India’ का निर्देशन किया. इस डॉक्यूमेंटरी में उन्होंने न्यू यॉर्क में स्थित एक भारतीय अखबार विक्रेता की जिंदगी दिखाई है कि आखिर कैसे अपने देश से दूर वो एक नई जगह पर आने वाली जिंदगी के सपने बुन रहा है.
ये डॉक्यूमेंटरी इतनी सच्ची और बढ़िया थी कि उस साल के अमेरिकन फिल्म फेस्टिवल और न्यू यॉर्क ग्लोबल विलेज फिल्म फेस्टिवल में इसे बेस्ट डॉक्यूमेंटरी का पुरस्कार मिला. ये पहला मौका था जब मीरा नायर को देश-विदेश में उनके काम के लिए जाना गया.
सलाम बॉम्बे’ ने अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई

साल 1983 वो वक़्त था जब मीरा नायर ने अचानक से बॉलीवुड पर अपनी पहचान छोड़ दी. हर कोई उनके नाम को जानने लगा. यही वो साल है जब उन्होंने ‘सलाम बॉम्बे’ फिल्म बनाई. मीरा ने अपनी दोस्त सूनी तारापोरेवाला के साथ मिलकर मुंबई की सड़कों पर घूमने वाले बच्चों की कहानी को जब फ़िल्मी परदे पर दिखाया तो रातों-रात हर जगह उनका नाम हो गया.
भारत में भले ही इस फिल्म को वो प्रशंसा नहीं मिल जो इसे मिलनी चाहिए थी मगर इंटरनेशनल स्टेज पर इसने 23 पुरस्कार अपने नाम किए थे. इस फिल्म के बाद मीरा नायर ने बॉलीवुड में एक नई तरह की फिल्मों की शुरुआत की जो बड़ी बजट की कमर्शियल फ़िल्में नहीं बल्कि अच्छी एक्टिंग और रियल लाइफ से प्रेरित फ़िल्में हुआ करती थीं.
सलाम बॉम्बे के बाद मीरा नायर ने, मिस्सीस्सिप्पी मसाला, मानसून वेडिंग, ‘कामसूत्र’ और दी नेमसेक जैसी फ़िल्में बनाई जो आम बॉलीवुड फिल्मों से काफी अलग स्टोरी पर बेस्ड थीं. मीरा की हर फिल्म से बॉलीवुड के कई उस ज़माने के डायरेक्टर और राइटर काफी कुछ सीख रहे थे. बॉलीवुड में रीयलिस्टिक सिनेमा की डिमांड बढ़ती जा रही है.
ये चर्चित फिल्म नहीं बन पायी
मीरा की बनायी फिल्मों के अलावा एक फिल्म ऐसी है जो सबसे ज्यादा चर्चा में रही लेकिन दुर्भाग्य ये रहा कि वो बन नहीं पाई. अगर ये फिल्म बनती तो ‘पाइरेट्स ऑफ केरेबियंस’ फिल्म करने वाले जॉनी डेप (Johny Depp) और हिंदी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) एक साथ होते. हॉलीवुड से बॉलीवुड तक इस फिल्म की चर्चा थी.
फिल्म का नाम रखा गया था ‘शांताराम’.‘शांताराम’ (Shantaram) सच्ची घटनाओं को लेकर लिखे गए एक उपन्यास का नाम है. इसी नाम से मीरा नायर फिल्म बनाना चाह रही थीं. यह उपन्यास भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया में भी बेहद लोकप्रिय है. शांताराम यानी ‘ग्रेगरी डेविड रॉबर्ट्स’ (Gregory David Roberts) ऑस्ट्रेलिया का एक बैंक लुटेरा था. कई सारी बड़ी बैंक डकैती उसने ऑस्ट्रेलिया में की थीं. एक दिन वह गिरफ्तार हो जाता है. लेकिन मौका पाकर जेल से फरार हो जाता है. उसे ऑस्ट्रेलिया की मोस्ट वान्टेड लिस्ट में शामिल कर लिया जाता है.
वह किसी तरह एक फर्जी पासपोर्ट के सहारे वहां से निकल जाता है और कई देशों के बाद मुंबई पहुंचता है. उसका इरादा यहां से न्यूजीलैंड या फिर जर्मनी जाने का था. भारत से जाता तो कोई शक नहीं करता. लेकिन मुंबई उसे अपने चंगुल में बांध लेता है. फिर वह मुंबई में अपने साथ घटी घटनाओं पर एक उपन्यास लिख डालता है, जो दुनिया भर में मशहूर हो जाता है.
फिल्म पर काम फिर से हो सकता है शुरू
जॉनी डेप खुद इस फिल्म के प्रोड्यूसर बनने के लिए तैयार थे. मुंबई शहर में रहने के दौरान ग्रेगरी डेविड रॉबर्ट्स यानी शांताराम के साथ जो हुआ, इस फिल्म में वही दिखाया जाना था. फिल्म की शूटिंग फरवरी 2008 में शुरू होनी थी, पर लेखकों के स्ट्राइक के चलते फिल्म को सितंबर तक टाल दी गई. फिर यह फिल्म लगातार किसी न किसी वजह से टलती रही और आखिरकार एक दिन बंद हो गई. हालांकि, अब भी बीच-बीच में खबर आती रहती है कि वॉर्नर ब्रदर्स के पास इसके कॉपीराइट खत्म हो गए हैं, तो ये फिल्म फिर से बन सकती है. लेकिन अभी भी सिर्फ खबरें ही हैं.




