
Ranchi: देशभर में रविवार को खेल दिवस मनाया जा रहा है. पीएम मोदी ने खेल मानचित्र में उभरते भारत की चर्चा मन की बात में की. पर झारखंड के नौनिहाल घरों में निराश बैठे हैं. कोरोना संकट ने राज्य के खिलाड़ियों की राह में संकट का जाल बिछा रखा है. पिछले साल शुरू हुए इस महामारी के कारण खेल सेंटरों में अब तक ताले लगे हैं. ऐसे में सेंटरों से जुड़े प्रतिभाशाली बच्चों का हुनर जंग खाने को है. भले ऑनलाइन क्लास के भरोसे उन्हें ट्रेंड किये जाने की जुगत की जा रही है पर यह सबों को रास नहीं आ रही. दूसरे राज्यों में कोरोना प्रोटोकॉल को मेंटेन किये जाने की शर्तों पर स्पोर्टस सेंटरों को खोल दिया गया है. यहां तक कि झारखंड में भी 9वीं से ऊपर के स्कूल, कॉलेजों को खोला जा चुका है. पर संभावित तीसरी लहर की आशंका में सरकार ने आवासीय और डे-बोर्डिंग सेंटरों को बंद ही रखा है. नतीजतन इनमें नामांकित बच्चे सेंटरों के खुलने की आस में दिन गिन रहे हैं.
मोबाइल पर टैलेंट निखारना मुश्किल
कोरोना के खतरे को देखते पिछले साल मार्च से सभी आवासीय और डे-बोर्डिंग सेंटरों को बंद कर दिया गया था. इसके बाद मार्च 2021 में सभी 34 आवासीय तथा 80 डे-बोर्डिंग सेंटरों को खोला गया. पर कोरोना की दूसरी लहर के बढ़ते खतरों को देख 17 अप्रैल से सभी सेंटरों को फिर से बंद कर दिया गया. इस पर अभी तक ताला लगा है. हालांकि होटवार स्थित जेएसएसपीएस एकेडमी का संचालन फिर से शुरू हो चुका है. पर इसकी बनिस्पत राज्य के सरकारी खेल सेंटरों के बच्चे ऑनलाइन क्लास के ही भरोसे जैसे तैसे गुजारा कर रहे हैं. ऐसे में सुदूरवर्ती इलाकों के बच्चों के सामने अपने हुनर को निखारना सहज नहीं. खासकर फुटबॉल, हॉकी जैसे ग्रुप एक्टिविटी वाले खिलाडियों के लिये.

द्रोणाचार्यों के लिये भी चुनौती
राज्य में खेल प्रतिभाओं को जूनियर स्तर से उभारते हुए टॉप लेवल तक लाने को सरकार की ओर से आवासीय और डे-बोर्डिंग सेंटर चलाये जाते हैं. इनमें 25-25 खिलाड़ियों को ट्रनिंग दी जाती है. खेल कीट और डाइट भी सरकार के स्तर से उपलब्ध कराये जाते हैं. हालांकि पिछले कुछ समय से खेल कीट मुहैया नहीं कराये जाने की शिकायत भी सामने आयी है. तकरीबन 20 कोच ही आवासीय सेंटरों में अब बचे हैं. इनमें 2005-06 से एनआईएस कोच रखे जाते रहे हैं. 14 साल पहले 10 हजार से शुरूआत हुई थी. अब 31 हजार तक ही पहुंची है. ऐसे में बेहतर कैरियर की आस में कोच भी साथ छोड़ रहे. जिन केंद्रों में अभी कोच नहीं हैं, वहां की हालत दयनीय है. 80 डे-बोर्डिंग सेंटर हैं. इनमें 25-25 बच्चे लिस्टेड हैं. अधिकांश सेंटरों में अब एक भी कोच नहीं बचे हैं. एक-एक साल के अनुबंध और 11 हजार प्रतिमाह पर उन्हें रखा जाता है. इस साल एक्सटेंशन नहीं होने से एक भी कोच अभी नहीं दिख रहे हैं. यह सब स्थिति तब है जब स्थायी कोच के लिये 92 सृजित पद हैं पर इस दिशा में सरकार एक कदम आगे नहीं बढ़ पायी है.
टूर्नामेंट्स के लिये खेल प्रैक्टिस जरूरी
हॉकी झारखंड के प्रमुख भोलानाथ सिंह के मुताबिक उन्होंने कुछ दिन पहले जूनियर पहलवान चंचला कुमारी के लिये खेल प्रैक्टिस की सुविधा उपलब्ध कराये जाने की अपील की थी. इसी तरह अन्य ऐसे खिलाड़ियों के लिये भी अपील की थी जिनका आने वाले समय में नेशनल, इंटरनेशनल लेवल पर खेल टूर्नामेंट होना है. प्रैक्टिस के अभाव में खिलाड़ियों का प्रदर्शन प्रभावित होता है.





