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Jharkhand Politics: अपनी ही सरकार में ‘हक’ मांग रही हैं कांग्रेस की महिला विधायक

ना मंत्रिमंडल में मिली संख्या के हिसाब से भागीदारी, ना सरकार में सुनी जा रही है बात

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Ranchi: झारखंड सरकार में कांग्रेस पार्टी की महिला विधायक असहज महसूस कर रही हैं. इसकी बानगी पिछले एक महीने से देखने को मिल रही है. लगातार कांग्रेस की महिला विधायक सरकार की कार्यशैली के खिलाफ मुखर है. आलम यह है कि लगातार कांग्रेस पार्टी की सभी चारों महिला विधायक अपनी बात सरकार और संगठन के समक्ष रखने का प्रयास कर रही हैं लेकिन उसका समुचित समाधान नहीं हो रहा है. वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी से चार महिला विधायक चुनी गयी हैं. सही मायने में देखा जाय तो चारों अपने बूते से विधानसभा पहुंची हैं.

बात दीपिका पाण्डेय सिंह से शुरू करें, दीपिका पिछले डेढ़ दशक से महगामा विधानसभा में लगातार जमीन नाप रही थी. इनका ताल्लुकात राजनीतिक परिवार से है. एक समर्पित कार्यकर्ता की तरह वह महागामा विधानसभा में कांग्रेस पार्टी का जनाधार मजबूत करने में कड़ी मेहनत करतीं रहीं. पार्टी की तरफ से जो भी काम दिया गया, उसे बखूबी अंजाम तक पहुंचाया. क्षेत्र में उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि उन्हें जब टिकट मिला तो उन्होंने पार्टी को निराश नहीं किया और भाजपा के कद्दावर बीटा अशोक कुमार को शिकस्त दी.

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इसी तरह रामगढ़ की विधायक ममता देवी भी आजसू के कद्दावर नेता चंद्रप्रकाश चौधरी के खिलाफ लगातार अपने क्षेत्र में सक्रिय रहीं. पिछले एक दशक से वह लगातार जनता के बीच काम करती रही. पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें टिकट मिला और चंद्रप्रकाश चौधरी के गढ़ को उन्होंने ध्वस्त किया. पूर्णिमा नीरज सिंह का ताल्लुकात रघुकुल से है. पति नीरज सिंह का एक बड़ा जनाधार कोयलांचल में था. उनके निधन के बाद उनकी विरासत को संभालने पूर्णिमा राजनीति में आई और कांग्रेस के टिकट पर झरिया से चुनाव जीता. इनकी जीत में कांग्रेस पार्टी से ज्यादा इनके पति के द्वारा तैयार की गयी मजबूत जमीन का हाथ है.

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बडकागांव से विधायक बनी अंबा प्रसाद भी राजनीतिक परिवार से हैं. इनके पिता और माता दोनों विधायक रह चुकी हैं. इस विधानसभा में अंबा के परिवार का जबरदस्त बोलबाला है. झारखंड की सबसे कम उम्र की इस विधायक को टिकट मिला तो जनता ने भी भरपूर प्यार दिया. लेकिन अब आलम यह है कि जनता से जिन वायदों के साथ कांग्रेस की ये चारों विधायक जीतकर आई हैं, उसका काम कराने में अपनी ही सरकार में असहज महसूस कर रही हैं. डेढ़ वर्ष तक तो ये चारों चुप रहीं लेकिन अब मुखर हो गयी हैं. कुछ सप्ताह पहले चारों विधायकों ने बैठक की और खुलकर मीडिया से अपनी पीड़ा साझा की. इन सभी विधायकों का साफ़ कहना था कि जिन वादों के साथ हम सत्ता में आये हैं उसपर काम नहीं हो रहा है. अधिकारी बेलगाम हो गए हैं. जिले के अधिकारी विधायकों की नहीं सुनते. सरकार के साथ साथ महिला विधायकों ने संगठन पर भी निशाना साधा.

मंत्रिपद के लिए कांग्रेस में 4-1 का फार्मूला लागू नहीं हुआ

विधानसभा चुनाव के बाद झारखंड में झामुमो,कांग्रेस और राजद महागठबंधन की हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकार बनी. कैबिनेट के लिए 4-1 का फार्मूला तय हुआ. इस फार्मूला के तहत झामुमो ने अपने कोटे से एक महिला को मंत्रिपद दिया लेकिन कांग्रेस ने यहां भी गच्चा दे दिया. चार महिला विधायक होने के बाद भी कांग्रेस ने किसी भी महिला विधायक को मंत्री नहीं बनाया. मजेदार बात यह है कि इस फार्मूला के तहत कैसे महिला विधायकों को कैबिनेट में शामिल नहीं किया जाय इसके लिए यह तय किया गया कि जो विधायक दो बार चुनाव जीतकर आये हैं उन्हें ही कैबिनेट में जगह दी जायेगी.

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