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कहानियां झारखंड आंदोलन की-2 : जब लालू प्रसाद ने कहा था- झारखंड मेरी लाश पर बनेगा

झारखंड आंदोलनकारी पुष्कर महतो उस घटना को याद करते हुए कहते हैं कि जब लालू प्रसाद ने यह बात कहके पूरे झारखंड आंदोलन को चुनौती दे दी थी.

Ranchi : झारखंड आंदोलन का समय था. तारीख थी 27 सितंबर 1992. वह दिन बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के एक बयान की वजह से तूफान लेकर आया था. उस जमाने में लालू प्रसाद का अलग ही रूतबा था. उन्होंने झारखंड अलग राज्य की मांग को सिरे से खारिज कर दिया था और कहा था कि झारखंड मेरी लाश पर बनेगा.

इस बयान की कड़ी प्रतिक्रिया हुई. झारखंड में जैसे आग लग गयी. झारखंड आंदोलनकारी पुष्कर महतो उस घटना को याद करते हुए कहते हैं कि जब लालू प्रसाद ने यह बात कहके पूरे झारखंड आंदोलन को चुनौती दे दी थी. पूरे झारखंड में उबाल आ गया था. मैं भी आंदोलन में चुटिया नामकुम प्रखंड क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहा था.

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मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने आपा खो दिया था.

केंद्र एवं राज्य की सरकार आंदोलन को खत्म करना चाहती थी. ऐसे में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने आपा खो दिया था. उस दिन झारखंड के अलग अलग हिस्से में विरोध प्रदर्शन होने लगे थे. मैंने भी अपने साथियों को इकट्ठा किया और सुजाता चौक के पास लालू प्रसाद का पुतला दहन की योजना बनायी. हमलोग सुजाता चौक के पास पहुंचे. झारखंड के नाम के नारे लगाते हमलोगों ने पुतला दहन किया. थोड़ी देर में चौक का माहौल बदल गया.

वहां यातायात पूरी तरह ठप हो गया. ट्रैफिक की व्यवस्था ध्वस्त हो गयी थी. पुलिस ने आंदोलनकारियों को हटाने के लिए लाठी चार्ज कर दिया. लाठीचार्ज से कई आंदोलनकारी घायल हो गए. मुझे और आंदोलन के साथी समीर उर्फ उमेश महतो को बलपूर्वक गिरफ्तार कर लिया गया था. पुलिस ने फिर बेरहमी से पिटाई भी की.

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आंदोलनकारियों की  बेरहमी से पिटाई की गयी

इस क्रम में हमलोगों के द्वारा चलाया गया एक पत्थर किसी पुलिस वाले को लगा. वह वहीं माथा पकड़कर बैठक गया. पुलिसकर्मी का कान फट गया था और वह लहूलुहान हो गया था. पुलिसकर्मी की वर्दी उसके अपने ही खून से रंग गयी थी. इसके जवाब में पुलिस का गुस्सा हमलोगों पर फूटा. वहां जितने भी आंदोलनकारी थे सबकी बेरहमी से पिटाई की गयी. मुझे और मेरे साथी को सुजाता चौक के पोस्ट से रातों-रात चुटिया थाना के लॉकअप में भेज दिया गया. पर मध्य रात्रि को मैं और मेरा साथी फरार होने में कामयाब हो गए.

मेरे घर दल-बल के साथ पुलिसकर्मी पहुंचे

थाना प्रभारी रात भर परेशान रहे. मेरे घर दल-बल के साथ पुलिसकर्मी पहुंचे. मेरे पिता धिराज महतो (सीनियर ऑडिटर) ने पुलिस कर्मियों को अपना परिचय देते हुए कहा कि आप अभी जाएं. सुबह मेरा बेटा थाना पहुंच जाएगा. अगली सुबह मेरी परीक्षा थी. मैंने स्नातक की परीक्षा लिखा इसके बाद पुलिस के समक्ष सरेंडर कर दिया. मुझे गिरफ्तार करने के बाद लॉकअप में भेज दिया गया.

फिर देर शाम जेल बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार भेज दिया गया. बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में एक सप्ताह रहने के पश्चात मुझे बेल पर छोड़ा गया. मेरे ऊपर पुलिस के साथ मारपीट करना, लॉकअप तोड़कर भागने, शांति भंग करने जैसे आरोप लगाए गए थे. उस दिन ऐसी ही सैकड़ों कहानियां बनी होगी. मुझे इस बात का गर्व है कि मैं भी झारखंड आंदोलन के इतिहास के हजारों आंदोलनकारियों में से एक हूं.

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