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कृषि बिल: MSP दो हजार प्रति क्विंटल होने के बाद भी 52,530 किसान पहुंचे क्रय केंद्र, सरकार कितनी सफल ?

साल 2019-20 में 1 लाख 38 हजार 932 किसानों ने कराया रजिस्ट्रेशन

कृषि बिल के साथ ही एपीएससी मार्केट और एमएसपी खत्म होने का किया जा रहा विरोध

Chhaya

Ranchi: नये कृषि बिल के साथ ही देश में किसानों का मुद्दा जोर पकड़ चुका है. पांच जून को केंद्र सरकार ने इन अध्यादेशों को लागू किया. संसद में इन्हें पारित किया गया. ऐसे में सबसे अधिक जोर एपीएमसी बाजार और एमएसपी पर दी जा रही है. विपक्षी दलों और किसान संगठनों का कहना है कि सरकार एपीएससी बाजार और एमएसपी खत्म कर रही है. तीन कृषि बिल में कहीं भी एमएसपी का जिक्र नहीं है. हालांकि इन बिलों का विरोध पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों के किसान जोर शोर से कर रहे है. राज्य में विरोध जारी है, लेकिन यहां किसानों के स्वर कमजोर है.

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ऐसे में ये जानना जरूरी है कि राज्य में किसानों और इन्हें मिलने वाले एमएसपी का हाल क्या है. मुख्य खेती धान होने के कारण किसानों के लिये धान क्रय केंद्र की व्यवस्था है. लेकिन विभागीय आंकड़ों की मानें तो हर साल जितने किसान रजिस्टर्ड होते हैं, उससे आधे भी क्रय केंद्रों में धान नहीं बेच पाते. ऐसे में इन किसानों को एमएसपी का लाभ नहीं मिल पाता. हालांकि, किसानों का कहना है कि एमएसपी मिलने में देर के कारण वे बिचौलियों को धान बेचते है. हालांकि इसमें इनका नुकसान है.

साल 2019-20 में 52 हजार 530 ने बेचा धान

खाद्य आपूर्ति विभाग के आंकड़ों की मानें, तो साल 2019-20 में 1 लाख 38 हजार 932 किसानों ने धान क्रय केंद्र में रजिस्ट्रेशन कराया. इसमें से 52 हजार 530 किसानों ने ही धान क्रय केंद्र में धान बेचा. इनमें से 2400 किसानों को अब तक एमएसपी का लाभ नहीं मिला है.

साल 2018-19 में एक लाख 21 हजार 204 किसान रजिस्टर्ड हुए. इनमें से 34 लाख 247 किसानों ने धान क्रय में उपज बेचा. साल 2017-18 में एक लाख 14 हजार 276 किसान रजिस्टर्ड हुए. इनमें से 34 हजार 615 धान क्रय केंद्र पहुंचे. साल 2016-17 में  93 हजार 537 किसानों ने धान क्रय केंद्र में धान बेचा. इसमें से 39 हजार 475 किसानों धान क्रय में उपज बेचा.

185 रुपये बोनस के बाद भी किसान नहीं आये

साल 2019-20 में राज्य सरकार ने 185 रूपये किसानों के लिये बोनस तय किया. ऐसे में केंद्र सरकार की ओर से 1815 और 185 मिलाकर कुल दो हजार रूपये प्रति क्विंटल एमएसपी तय की गयी. इसके बाद भी किसानों की संख्या धान क्रय केंद्रों में कम रही. इसके पहले साल 2018-19 के लिये यह 150 रूपये तय की गयी थी. बता दें किसानों को मिलने वाले एमएसपी केंद्र सरकार की ओर से दी जाती है. जिसमें राज्य सरकार की ओर से बोनस दिया जाता है. पिछले कुछ सालों से राज्य सरकार ने बोनस में बढ़ोतरी की, इसके बाद भी किसानों की संख्या क्रय केंद्रों में कम रही.

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क्या है एपीएमसी और एमएसपी

एपीएमसी या एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी राज्य स्तरीय कमेटी होती है. जो राज्य की बाजार और दरों की कीमतों को तय करती है. वहीं एमएसपी या न्यूनतम समर्थन मूल्य उपज बेचने के बदले किसानों को दिया जाता है. यह मूल्य केंद्र और राज्य सरकार की ओर से तय किया जाता है. जिसमें राज्य सरकार की ओर से किसानों को बोनस दिया जाता है.

क्या है कृषि विधेयक

पहले विधेयक में एक देश एक बाजार की बात की गयी है. इसके तहत एपीएमसी एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी मार्केट के बाहर कृषि उपज की खरीद होगी. एपीएमसी व्यवस्था को खत्म कर दिया जायेगा. एपीएमसी मार्केट व्यवस्था खत्म होने से राज्य सरकार किसानों के मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकेगी. किसान का सामान लेने वाली कंपनी और किसान के बीच होने वाले विवाद का एसडीओ के जरिये समाधान किया जायेगा. इसके लिए तीस दिन का समय होगा. किसानों को कंपनी या व्यक्ति के खिलाफ कोर्ट तक जाने का विकल्प नहीं होगा.

दूसरे विधेयक के अनुसार, आवश्यक वस्तु कानून के तहत भंडारण में लगे रोक हटा लिये गये हैं. पहले व्यापारियों को गेंहू, चावल आदि के भंडारण के लिए सीमा तय की गयी थी. इस अध्यादेश के बाद यह सीमा हटा ली गयी है. स्पष्ट है किसानों से उपज लेने वाली कंपनियां लंबे समय तक भंडारण रखेगी और अधिक दामों में बेचेगी.

तीसरे विधेयक के अनुसार, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया गया है. जिससे बड़ी-बड़ी कंपनियां खेती करेंगी. लेकिन खेतों में किसान मजदूर की भूमिका में होंगे. इससे किसानों के शोषण की संभावना अधिक है.

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