Faisal Anurag
नवंबर 29 तक संपन्न होने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव में दलित और अतिपिछड़ा वोटों को अपनी तरफ करने की जंग तेज हो गयी है. जीतनराम मांझी को नीतीश कुमार अपने खेमे में लाने में सफल हो गए हैं. लेकिन चिराग पासवान की नयी लोजपा से टकराव भी बढ़ गया है. राजद गठबंधन दलित और अतिपिछड़ा वोटों के लिए नयी रणनीति को आजमा रहा है. जिसमें प्रभावी क्षेत्रीय नेताओं की बड़ी भूमिका तय की जा रही है.
बिहार का चुनाव कोरोना महामारी के दंश और बाढ़ की विभीषिका से उभरे हालात के बीच होने जा रहा है. इन दोनों मामलों में नीतीश कुमार सरकार को भारी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. लेकिन मीडिया चैनलों और जदयू भाजपा ने सुशांत सिंह राजपूत को बिहार का प्रतीक बना दिया है. इस रास्ते चुनाव में कोरोना, बाढ़, लॉकडाउन के बाद की आर्थिेक तबाही के मुद्दे को दरकिनार करने का प्रयास हो रहा है.
बिहार में दलितों की आबादी 16 प्रतिशत है. लेकिन दलितों के राजनीतिक रुझान एकतरफा नहीं रहे हैं. 2015 के चुनाव में दलितों ने राजद-जदयू गठबंधन को पसंद किया था. लेकिन पिछले पांच सालों में दलितों के सवाल और सोच में बदलाव आए हैं. बिहार के दलितों का वोट पैटर्न उत्तर प्रदेश की तुलना में बहुत अलग रहा है. बिहार के दलितों ने सम्मान हासिल करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है.
इनमें से ज्यादातर का नेतृत्व वामपंथी दलों ने ही किया है. 1990 के बाद से दलित वोटरों का पैटर्न आमतौर पर सामाजिक न्याय के आंदोलन से प्रभावित रहा है. 2005 से 2015 के बीच दलित वोटरों पर एनडीए का प्रभाव रहा. लेकिन 2015 के चुनाव में दलितों ने राजद-जदयू गठबंधन का भरपूर समर्थन किया. एनडीए के खिलाफ चुनाव जीत कर नीतीश कुमार अब फिर एनडीए का ही नेतृत्व कर रहे हैं. 2015 के बाद के बिहार की जमीनी हालात में भारी परिवर्तन आया है. 20015 के चुनाव में जीतनराम मांझी हों या रामविलास पासवान. दोनों को ही दलित वोटरों ने नकारा. 2020 में अब जबकि मांझी एक बार फिर एनडीए की नाव पर सवार हैं और चिराग पासवान जदयू से खफा हैं. तो ऐसे हालात में वोटरों के रुख को ले कर दोनों ही गठबंधन सशंकित हैं.
एनडीए में जाते ही मांझी ने रामविलास पासवान पर हमला किया. माना जा रहा है कि जदयू को खुश करने के लिए उन्होंने ऐसा किया. दूसरी तरफ चिराग पासवान के बारे में प्रेक्षक कह रहे हैं कि जिस तरह जदयू और लोजपा के बीच खुली जंग हो रही है वह गंभीर संकेत हैं. लोजपा ने अखबरों में फ्रंट पेज विज्ञापन दे कर नीतीश कुमार पर हमला बोला है.
इस विज्ञापन का पंच लाइन है: वो लड़ रहे हैं हम पर राज करने के लिए और हम लड़ रहे हैं बिहार पर नाज करने के लिए. राजनीतिक तौर पर एक ही गठबंधन के दो दलों के बीच जारी रस्साकशी इससे सार्वजनिक हो गयी है. चिराग पासवान नीतीश सरकार के कामकाज को ले कर नाराजगी प्रकट करते रहे हैं. भाजपा इस रस्साकशी में खामोश दिख रही है.
मायावती की बसपा का बिहार के कुछ हिस्सों में प्रभाव है. और वह रोहतास से अपने प्रत्यशियों को चुनावी कामयाबी दिलाती रही है. इस बार बसपा सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कर रही है. कुछ ही साल पहले तेजस्वी और मायावती मिले थे. तब बहाना अलग था. लेकिन उसका राजनीतिक मकसद भी था. बसपा का रुख स्पष्ट नहीं है.
लेकिन मायावती पिछले कुछ समय से जिस तरह से विपक्ष के खिलाफ बोल रही हैं, उसे तेजस्वी के लिए साधना आसान भी नहीं है. तेजस्वी की बड़ी समस्या उनके भाई तेज प्रताप हैं. जिन्होंने अब राजद के युवा घटक के नेताओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग की है. 2019 लोकसभा चुनाव के समय भी उनकी इसी तरह की मांग थी.
जहानाबाद में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार किया था. इस अनुशानहीनता के बावजूद उन्हें दंडित नहीं किया गया. जबकि राजद के अनेक नेता तेजस्वी की गतिविधियों से नाराज बताए जा रहे हैं. ऐसे में तेजस्वी को इस संकट के बीच दलित और अतिपिछडों के बीच राजद की नयी छवि और असर बनाने की बडी चुनौती है.




