
Faisal Anurag
देश हर दिन कोरोना वायरस की गिरफ्त में आता जा रहा है. लेकिन ऐसे समय में भी सरकार बनाने गिराने का खेल जारी है. अर्थव्यवस्था को ले कर विश्व बैंक की चेतावनियों और मुडीज की खतरनाक रेटिंग भी राजनीतिक तौर पर संवेदना पैदा नहीं कर पा रही है. पहले बिहार में सत्ता बदलाव किया गया. फिर कर्नाटक और मध्यप्रदेश में सरकार गिराने के बाद राजस्थान और महाराष्ट्र की सरकारों को अस्थिर करने का खेल शुरू हो गया है.
राजस्थान कांग्रेस ने अपने सभी 107 विधायकों को एक होटल में शिफ्ट कर दिया है. और उन पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है. महाराष्ट्र में भाजपा विधायक दल के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री के एक बयान ने पिछले दिनों राजनीतिक हलचल मचा दी थी. उन्होंने कहा था कि अपने बोझ के कारण ही ठाकरे सरकार जल्द गिर जाएगी. वहां भी चर्चा है कि गठबंधन सरकार के कुछ विधायकों से भाजपा ने संपर्क किया है.
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कोविड 19 के दौर में सरकारों को अस्थिर करने के पीछे साफ दिखता है कि विपक्ष की सरकारों को ले कर भाजपा संतुष्ट नहीं है. वह हर राज्य में अपनी सरकार ही चाहती है. गुजरात में भी जिस तरह राज्यसभा चुनाव आते ही कांग्रेस के आठ विधायकों से इस्तीफा दिलाया गया है, उससे भी जाहिर है कि एक मजबूत विपक्ष उसे पसंद नहीं है. इन इस्तीफों के पहले भी कांग्रेस विधायकों से इस्तीफा करा उन्हें भाजपा ने उनको अपनी पार्टी में शामिल कर उपचुनाव का टिकट दिया है.
इससे यह संदेह तो पुष्ट होता होता ही है कि मामला पार्टी के भीतर असंतोष से कहीं ज्यादा है. मध्यप्रदेश में भी यही कहा गया कि कमलनाथ सरकार अंतरविरोधों के कारण गिर गयी. लेकिन उसमें जिस तरह ज्येतिरादित्य सिंधिया को तामझाम से भाजपा ने सदस्यता दी और कर्नाटक में हाइजेक विधायकों को रखा, उससे भी पुष्ट हुआ कि मामला इतना सामान्य नहीं है.
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अब तो मध्यप्रदेश में एक वीडियो भी वायरल है. जिसमें शिवराज सिंह चौहान यह कह रहे हैं कि केंद्र सरकार के कहने पर ही कमलनाथ सरकार को गिराया गया था. हालांकि इस वीडियों को भाजपा ने फेक बताया है. लेकिन कांग्रेस इस वीडियों के आधार पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सरकार गिराने का मुख्य सूत्रधार बता रही है.
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस के अनेक विधायकों और सरकार को समर्थन दे रहे विधायकों को 25 करोड़ रुपये की पेशकश की गयी है. हालांकि उनका कहना था कि सभी विधायक एकजुट हैं. खबर है कि फिलहाल कांग्रेस ने अपने विधायकों को एक होटल में शिफ्ट कर दिया है.
और उन पर निगरानी कड़ी कर दी है. उधर भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया है. पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनियां ने कहा कि कांग्रेस का खुद का घर सुरक्षित नहीं है. और उसे अपने विधायकों पर भरोसा नहीं है. राजस्थान विधानसभा में कुल 200 सदस्य हैं. जिसमें 107 कांग्रेस के हैं.
इनमें वे छह विधायक भी शामिल हैं जिन्होंने बसपा छोड कर कांग्रेस का हाथ पकडा था. इसके अलावे 13 में 12 निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी गहलोत सरकार को है. इन 12 में से आधे विधायक तो कांग्रेस से बागी हो चुनाव लड़े थे और जीत गए थे.
कनार्टक और मध्यप्रदेश का जख्म अभी भरा भी नहीं है कि विपक्ष की सरकारों की चिंता राजस्थान घटनाक्रम से बढ गयी है. कनार्टक में भी कांग्रेस और जेडीएस विधायकों से इस्तीफ लिये गये थे. उन्हें मुबई के एक होटल में कड़ी निगरानी में रखा गया था. और मध्यप्रदेश के 22 विधयकों को भी इसी तर्ज पर बैंगलुरू के रिसार्ट में रखा गया. सवाल उठता है कि इस तरह की बंधक राजनीति से देश को क्या हासिल होता है.
संविधान बचाने का दायित्व जिन संस्थानों पर है वे भी तटस्थ भूमिका में जा कर इस तरह के सत्तापलट खेल का हिस्सेदार बन जाते हैं. कर्नाटक और मध्यपद्रेश दोनों के मामले में ऐसा ही देखने को मिला है. कोशिश तो बंगाल में भी ममता सरकार को गिराने की गयी थी. लेकिन जरूरी विधायक नहीं जुटाए जा सके. अब तो अमित शाह अपनी वर्चुअल रैली से एक ऐसी राजनीति का आगाज कर चुके हैं जहां उनके इरादे साफ हैं.
आरोप लगता आया है कि इस तरह के खेल को अंजाम देने में सरकारी एजेंसियों का भी भरपूर इस्तेमाल किया जाता है. कर्नाटक के कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार के खिलाफ जिस तरह सरकारी एजेंसियों ने कार्य किया उसे ले कर यह बातें कहीं गयीं. यही नहीं महाराष्ट्र जो कि भारत की औद्योगिक राजधानी है, वहां भाजपा सरकार बनाने के लिए बेचैन दिख रही है. बहुमत नहीं होने के बावजूद जिस तरह देर रात राज्यपाल ने फडनवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी, भारत की राजनीति के इस काले पहलू को भुलाया नहीं जा सकता है.
भारत में यह माहौल बन गया है कि वोटर चाहे जिस दल या नेता को जनादेश दे, उसे पलटा जा सकता है. लोकतंत्र की नींव इससे कमजोर ही होती है. कोविड 19 के दौर में तो लोकतंत्र का जिस तरह केंद्रीकरण हुआ है वह भी ऐसी प्रवृति है जिसके नकरात्मक नतीजे देखने को मिल रहे हैं.
1967 के जमाने में भी संविद सरकारों के पतन का दौर था. लेकिन तब खरीद-फरोख्त की चर्चा नहीं होती थी. किसी का वैचारिक कारणों से इस्तीफा देना तो समझ में आ सकता है लेकिन थोक में हो रही घटना बताती है कि मामला बेहद संगीन है. इससे अराजनीतिकरण का माहौल बन रहा है, जिसके दूरगामी खतरों को नजरअंदाज करना भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए घातक हो सकता है.
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