
FAISAL ANURAG
दो दिनों से मीडिया को उसका प्रिय ओर टीआरपी बढाने वाला मामला हाथ लग गया है. कोविड19 के लिए अब वह अपने आका के बचाव का पूरे मामले में खलनायक बनाने के अभियान में लग गयी है. इस बहस में उन मजदूरों की चर्चा थम गयी है जो अपने गांवों के लिए पलायन कर रहे थे. या जिन्हें रुक जाना पड़ा. उनकी मुसीबतों और राहतों के बारे में चर्चा करने से मीडिया बचने लगा था.
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झारखंड का पहला मामला भी मीडिया को अपने इसी प्रिय विषय के अनुकूल मिल गया. और वे अपने कार्य में तत्पर हो गये. अखबारों के हेडिंग ही बता रहे हैं कि उनका मकसद क्या है. तय है कि नोवल कोरोना वायरस एक गंभीर और अबूझ पहेली की तरह सारी दुनिया में बढ़ता ही जा रहा है.
जानकारों ने भारत के बारे में जो आकलन किया था उसके संकेत भी आने लगे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन का एक मात्र सूत्र है इस वायरस से निपटने के लिए टेस्ट, टेस्ट और केवल टेस्ट. सरकारों से कोई नहीं पूछ रहा है कि आखिर इस अहम सुझाव पर वे कितनी सक्रिय हैं.
सरकारों के देर से उठाये गये कदमों को किस तरह बहस से बाहर किया जा सकता है कि इसकी सीख मीडिया से ही मिलती है. दूसरी ओर अमरीकी मीडिया ने ट्रंप को लगातार सवालों से परेशान कर रखा है. मीडिया के तल्ख सवालों का जवाब अमरीकी सरकार बचबचा कर दे रही है. दूसरी ओर भारत की सरकार है जिस पर कोई सवाल कर रहा है तो उसे सीधे-सीधे देशद्रोही बताया जा रहा है. पिछले छह सालों में भारत के एक बड़े तबके का जो मनोविज्ञान तैयार किया गया है वह सरकार से हर छोटी बड़ा आलोचना और सवाल के खिलाफ सुरक्षा कवच ले कर खड़ा हो जा है.
आगे का काम प्रशिक्षित और पेड ट्रोल बखूबी अंजाम देते हैं. इस महामारी के बीच भी उनका अभियान सोशल मीडिया पर नफरत की आग उगल रहा है.
और एक तबके को ठीक उसी तरह दुश्मन साबित कर रहा है जैसे कभी हिटलर ने यहूदियों और स्वतंत्र बुद्धिजीवियों को किया था. नफरत का यह वायरस भारतीय अवधारणा के सहअस्तित्व की चिंतनधारा का ही निषेध कर देता है. और करोनोत्तर भारत की जो तस्वीर पेश करता है वह नोवल कोरोना वायरस से कम खतरनाक नहीं है.
एक ऐसे दौर में जब कोरोना वायरस से बचाव के लिए मीडिया को बडे पैमाने पर विशेषज्ञों की राय से सचेत करने का बड़ा कार्यभार है, मीडिया की भूमिका जो कि पिछले कई सालों से विवादों में है. यह चिंता की बात इस अर्थ में भी है कि मीडियाकर्मी भी वैज्ञानिक जानकारियों से लैस नहीं किये जा रहे हैं जिसमें बड़ी भूमिका संस्थानों की है.
भारत जैसा बड़ा लोकतंत्र स्वतंत्र और संवेदनशील मीडिया के बगैर क्रियाशील बना नहीं रह सकेगा. दिल्ली से जब मजदूर राज्यों की तरफ पलायन के लिए सड़कों पर आ गये थे तब भी दोषारोपण के शिकार मजदूर ही बनाये गये थे.
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साजिश की तलाश की प्यास बेहद घातक है. जो अपने ही देश के लागों की सांस्कृतिक विविधता, आचार व्यवहार और विविधता को संदेह से देखने लगे. कोरोना वायरस के कारण लोकडाउन लोगों का मनाविज्ञान वैसे भी बदलने लगा था.
लेकिन इस बदलाव की ताकत और समस्या के विश्लेषण करने से बच जाना भी उचित नहीं है. कोई नहीं जानता की आने वाले दिनों में क्या होने जा रहा है. ऐसी स्थिति में सबसे ज्यादा जरूरत विवेक, र्धर्य और व्यक्तिगत अनुशासन का है.
यह सब को समझने की जरूरत है. चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय या सरोकार का हो. प्रशासन ने यदि समय पर कार्रवाई की होती तो इस विवाद को रोका जा सकता था. अब भी समय है कि तथ्यों की रोशनी में बात हो. मरीजों के प्रति सहानुभूति रखी जाये. यह किसी खास की विपदा नहीं है. हरेक की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने सह नागरिकों का मार्गदर्शन करे.
इन तमाम हालातों के बावजूद वे सवाल तो नहीं छोड़े जा सकते जिसे चिकित्साकर्मी उठा रहे हैं. दुनिया ने इस आपदा से निपटने के कई अलग-अलग उदाहरण प्रस्तुत किए हैं. भारत भी अपने तरीके से निपट रहा है. बावजूद संसाधानों की मांग का सवाल बना ही हुआ है. देश को यह पता ही नहीं है कि आखिर भारत को कितने वेंटिलेटर की जरूरत पड़ सकती है.
और जांच को गांवों तक किस तरह सुलभ किया जा सकता है. दक्षिण कोरिया जहां सब की जांच कर रहा है, वहीं अमरीका जरूरी जांच को ही अंजाम दे रहा है. अमरीका की यह नीति पिछले कुछ दिनों में बदली है. और वह विश्व स्वास्थय संगठन के निर्देशों के अनुकूल अधिकतम जांच की ओर बढ़ा है. यही कारण है कि आज अमरीका में मराजों की संख्या लगातर बढ रही है. और हर घंटे आंकड़े बदल रहे है.
जीन वैज्ञानिकों ने इस बीच बड़ी कामयाबी की ओर कदम बढ़ा दिया है. नोवल कोरोना वयरस जीन को डिकोड करने में उन्हें लगातार कामयाबी मिलने लगी है. और वैज्ञानिक भी इस वायरस को समझने की प्रक्रिया में ज्यादा करीब आते जा रहे हैं. हमें इनका स्वागत करना चाहिये.
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