
Faisal Anurag
झारखंड के चुनाव में प्रधानमंत्री ने कपड़ों से पहचान करने की बात की थी और दिल्ली के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने बिरयानी से ध्रवीकरण की प्रक्रिया तेज करने की कोशिश की है. बिरयानी का नाम इस तरह लिया जा रहा है मानो यह कोई देशद्रोही हो और उसे केवल एक ही समुदाय के लोग खाते हैं.
बिरयानी कोई पहली बार इस्तेमाल नहीं हुआ है. लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और भाजपा के कई सांसद जिस तरह अपने भाषणों में इस शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि भारत की एकमात्र समस्या बिरयानी ही है.
देश की राजधानी के चुनाव से यदि तमाम राजनीतिक मुद्दे गायब हैं, तो यह बेहद चिंता की बात है. हालांकि सत्ता में वापसी के लिए संघर्ष कर रहा आम आदमी पार्टी शिक्षा, स्वस्थय, बिजली, पानी, सिवर जैसे सवालों पर ही बात कर रही है.
इसे भी पढ़ेंः #NRC का सभी धर्मों पर पड़ेगा असर, नहीं लागू होने देंगे इसे: ठाकरे
चुनाव दर चुनाव जिस तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के खेल का प्रयोग हो रहा है, उससे लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं, खास कर चुनाव आयोग की भूमिका को ले कर सवाल उठ खड़े हुए हैं. भारत के लोकतंत्र की राजनीति का यह नया दौर है, जो साझापन के तमाम विरासतों को खारिज करने के हर प्रयास में संलग्न है.
दुखद यह है कि इसकी अगुवाई प्रधानमंत्री ही कर रहे हैं. नफरत फैलाने की बात करने के लिए जिस प्रवेश वर्मा पर चुनाव आयोग ने 72 घंटे के लिए प्रतिबंध लगा दिया था, उन्हें द्वारका में मोदी के मंच पर महत्व के साथ प्रस्तुत किया गया.
हालांकि चुनाव आयोग की भूमिका लगातार संदेहास्पद होती गयी है. चुनाव आयोग की भूमिका को ले कर यह राजनीतिक आरोप विभिन्न दल लगा रहे हैं कि वह नफरत फैलाने वाले प्रचार अभियान को रोकने में अक्षम साबित हो रहा है.
इसे भी पढ़ेंः जम्मू-कश्मीर में लगी पाबंदियों पर प्रियंका ने पूछा- क्या हम अब भी लोकतंत्र हैं या नहीं
क्रबिस्तान बनाम श्मशान का हवाला दे कर प्रधामंत्री मोदी ने चार साल पहले उत्तर प्रदेश का चुनाव जीता था. इस प्रकरण में उन्होंने होली बनाम ईद की बायनरी भी खड़ी की थी. वैसे भी जिसे गुजरात माडल कहा जाता है, उसमें अधिकांश राजनीतिक जीतों में पाकिस्तान और मियां मुशरर्फ के बहाने भाजपा के तमाम नेताओं ने वोटे का धु्रवीकरण किया.
तो क्या भारत की राजनीति में इस समझ को स्थायित्व दे दिया गया है कि यदि चुनाव में जीत हासिल करना है तो सांप्रदायिक नफरत ही उसकी अचूक गारंटी हो गयी है. 2019 के लोकसभा चुनाव में भी राष्ट्रवाद का जो नरेटिव भाजपा ने पेश किया था, उसकी बुनियाद में भी यही था.
दुनिया इसे किस तरह देखती है इसकी परवाह तो अब नहीं ही है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि दुनिया के तमाम बड़े लोकतंत्र में जिस तरह नवनाजी संकीर्णकता का उभार हुआ है, उसने अनेक नये प्रतीक खड़े कर दिये हैं. यही कारण है कि मेहनतकश वर्ग के वोटर भी कई देशों में अपने रोजमर्रा के सवालों से ज्यादा इसी तरह के धुवीकरण का शिकार हो जाते हैं.
मुकेश असीम की यह टिप्पणी तो अमरीका और ब्रिटेन के चुनावों के संदर्भ में है. लेकिन यह भारत के मेहनतकश और गरीब समूहों के बारे समझ प्रदान करता है. उधर, अमरीका में न्यूयॉर्क के वित्तीय पूंजीपतियों के साथ नाभिनालबद्ध डेमोक्रेटिक पार्टी का लिबरल एस्टब्लिशमेंट फिर ट्रंप को राष्ट्रपति चुनाव जिताने में जुट गया है.
हमेशा की तरह लिबरलों को अर्ध-फासिस्ट रिपब्लिकन स्वीकार हैं. पर आम मजदूरों के समर्थन वाला सुधारवादी बर्नी मंजूर नहीं. ऐसी ही स्थिति ब्रिटेन में लेबर पार्टी की थी. लेबर एस्टब्लिशमेंट को भी बोरिस जॉनसन का जीतना मंजूर था, पर आम मजदूर मेंबरों में लोकप्रिय सुधारवादी कोर्बिन किसी हालत में नहीं.
दोनों देशों में नवउदारवादी नीतियों के प्रभाव में मेहनतकश जनता के जीवन स्तर में बहुत गिरावट हुई है. यहां तक कि दोनों देशों में पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं के गिरते स्तर से मृत्यु की औसत उम्र अब घटने लगी है. इसके चलते आम मजदूरों का बड़ा हिस्सा स्वतः स्फूर्त वर्ग चेतना के असर से अधिकाधिक वाम रुझान की ओर बढ़ रहा है.
अतः डेमोक्रेटिक और लेबर, दोनों पार्टियों में लिबरल एस्टब्लिशमेंट और आम मजदूर वर्गीय सदस्यों के बीच स्पष्ट टकराव खड़ा हो गया है. वस्तुतः दोनों के अंदर ही दो विरोधी पार्टियां खड़ी हो गयी हैं.
ब्रिटेन का मजदूर वर्ग ब्रेक्जिट चाहता था, कोर्बिन भी मूलतः विरोधी था. पर पार्टी में विभाजन के डर से कोर्बिन ने ब्लेयर के लिबरल खेमे के सामने समर्पण कर ब्रेक्जिट का समर्थन बंद कर दिया. और मजदूर वर्ग ने बड़े पैमाने पर लेबर को छोड़ टोरी पार्टी को वोट दे दिया.
अमरीकी डेमोक्रेटिक पार्टी का क्लिंटन-ओबामा लिबरल खेमा भी घोर नवउदारवादी है. और मजदूर वर्ग से लगभग नफरत करता है. 2016 में भी आम मेंबरों में लोकप्रिय होने के बावजूद इन्होने बर्नी को उम्मीदवार बनने से वंचित किया.
नतीजा, ट्रंप के अच्छे दिन के वादे के भ्रम में अमरीकी मजदूर वर्ग ने बड़े पैमाने पर उसे वोट दिया. इस बार भी क्लिंटन-ओबामा खेमा मजदूरों में लोकप्रिय बर्नी को उम्मीदवार बनने से रोकने के लिए पूरा जोर लगा दे रहा है.
भविष्य में इन दोनों पार्टियों का लिबरल और मजदूर वर्ग खेमा एक साथ नहीं रह पायेगा. और देर-सबेर इनका विभाजन निश्चित है. मजदूर वर्ग इन पार्टियों के जरिये अपने कार्यक्रम को आगे नहीं बढ़ा सकता. उसके लिए उन्हें एक मजदूर वर्ग पार्टी की जरूरत है.
भारत में कारपोरेट नियंत्रित राजनीति इसे अच्छी तरह समझती है. और भारत में जो चुनावी प्रयोग हो रहे हैं वे नवउदारवाद के शोषणमूलक चरित्र को बनाये रखने का ही हिस्सा हैं.
यह सब उस स्थिति में भी हो रहा है, जब नागरिकता कानून को लेकर सारी दुनिया भारत के बदलते धर्मनिरपेक्ष चरित्र को संदेह से देख रही है. अमरीका के सबसे सशक्त सेंट्रल कौसिंल ने तो भारत के खिलाफ एक प्रस्ताव को पारित किया है. यह बेहद गंभीर बात है.
लेकिन भारत की मीडिया और सत्तारूढ दल के प्रभावशाली राजनीतिज्ञ इस सवाल को ओझल किये हुए हैं. और बिरयानी और कपड़ों से समुदाय विशेष को टारगेट कर रहे हैं.
इसे भी पढ़ेंः चीन में #CoronaVirus का कहर, जानें वुहान और केरल का क्या है संबंध




