
Palamu: बढ़ती उम्र के साथ कई नेता अपने बेटे-बेटियों, बहुओं या नजदीकी रिश्तेदारों को राजनीति में स्थापित करने की कोशिश में जुट गये हैं. झारखंड विधानसभा के चुनाव 30 नवंबर से शुरू हैं. इसलिए इन बुजुर्ग नेताओं में खलबली मच गयी है.
चन्द्रशेखर दुबे व रामचन्द्र केसरी चाहते हैं बेटे संभाले उनकी विरासत
पलामू प्रमंडल में भी चुनाव की तिथि घोषित होते ही सेवानिवृति की ओर बढ़ रहे नेताओं में अफरा-तफरी का माहौल है. पूर्व विधायक और कांग्रेस के दबंग मजदूर नेता चन्द्रशेखर दुबे उर्फ ददई दुबे अपने पुत्र अजय दुबे के लिए कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव बना रहे हैं. ददई दुबे ने पिछले दिनों विश्रामपुर में आयोजित एक जनसभा में कहा था कि मैं अब थक गया हूं अब मेरा बेटा अजय आप लोगों की सेवा करेगा.
इसी तरह पूर्व मंत्री रामचन्द्र केसरी भी अपने स्थान पर अब अपने बेटे विजय केसरी को सक्रिय राजनीति में लाने के लिए कमर कस चुके हैं. वह बेटे विजय को भवनाथपुर विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिलाने का जुगाड़ लगा रहे थे. केशरी फिलवक्त झारखंड विकास मोर्चा में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने बेटे को झाविमो से टिकट भी दिला दिया है.
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रामचन्द्र चन्द्रवंशी व राधाकृष्ण किशोर ने लिया अपने बेटों का नाम
पलामू की राजनीति में अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज कराने वाले रामचन्द्र चन्द्रवंशी झारखंड सरकार में स्वास्थ्य मंत्री हैं. वह विश्रामपुर सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं.
चन्द्रवंशी भी पिछले कई वर्षों से अपने बेटे ईश्वर सागर चन्द्रवंशी को प्रोजेक्ट कर रहे हैं. कई सभाओं में वह शिरकत करते देखे गये. पिता की अनुपस्थति में क्षेत्र के कई सामाजिक कार्यक्रमों में वह बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी करते रहे हैं.
पलामू की ही छतरपुर (सुरक्षित अजा) सीट से भाजपा के तेजतर्रार विधायक राधाकृष्ण किशोर भी पिछले दो वर्षों से अपने पुत्र प्रशांत किशोर को राजनीति का प्रशिक्षण दे रहे हैं. प्रशांत छतरपुर-पाटन क्षेत्र के प्रत्येक कार्यक्रम में पिता के साथ दिखायी देते हैं.
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परिवारवाद से क्या परेशानी
झारखंड विधानसभा के प्रथम स्पीकर व चतरा के पूर्व सांसद इंदर सिंह नामधारी से हुई बातचीत के क्रम में जब यह प्रश्न किया गया कि राजनीति में परिवारवाद सही है क्या? इसपर नामधारी ने बोला कि इसमें क्या बुराई है. राजनीतिज्ञों की संतानों ने अच्छे काम किये हैं.
जब एक अभिनेता, अभिनेत्री के पुत्र-पुत्रियां उनकी अभिनय कला की विरासत को संभाल सकते हैं तो राजनेताओं के परिवारवाद में आपत्ति कहां तक जायज है? उन्होंने कहा कि डाक्टर का बेटा डाक्टर और वकील का बेटा वकील हो सकता है तो नेताओं के बेटे क्यों नहीं राजनीति में प्रवेश कर सकते हैं?
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बनानी होगी अपनी पहचान
इंदर सिंह नामधारी ने उदाहरण दिया कि डालटनगंज नगर पालिका के कई वर्षों तक अध्यक्ष रहे श्रद्धेय नर्वदेश्वर सिहं उर्फ नरू बाबू के निधन के बाद उनके अधिवक्ता बेटे सुरेन्द्र सिंह ने अध्यक्ष पद को संभाला.
उसके कामों की लोगों ने सराहना की. राजनीति में परिवारवाद की आलोचना करना व्यर्थ में समय बर्बाद करने के बराबर है, लेकिन विरासत संभालने वालों में क्षमता होना चाहिए. परिवार या पिता के नाम पर ज्यादा दिन नहीं टिका जा सकता. अपनी पहचान बनानी होगी.




