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Bokaro: इस बार बोकारो और बेरमो विधानसभा क्षेत्र में होने वाला विधानसभा चुनाव दिलचस्प होगा, क्योंकि दिग्गज नेता चुनाव मैदान में अपनी अगली पीढ़ी को उतारने की पूरी तैयारी में हैं.
बीजेपी के गिरिडीह से पूर्व सांसद, रविंद्र पांडेय, कांग्रेस के पूर्व मंत्री और बेरमो के पूर्व विधायक, राजेंद्र सिंह और बोकारो के पूर्व विधायक, समरेश सिंह इनमें से खास हैं.
राजनीति में लंबी पारी खेलने के बाद अब यह लोग अपना अनुभव, दक्षता, जनाधार और राजनीतिक विरासत का बोझ अपने बेटों के कंधे पर देना चाहते हैं.
अपने बेटों में से किसी एक को सौंपनी है विरासत
इसके लिए यह लोग अपने स्तर पर कोशिश कर रहे हैं, पर अभी तक उन्होंने अपने बेटे के नाम की औपचारिक रूप से घोषणा नहीं की है. इनमें से कुछ नेताओं के लिए विवाद यह भी है कि उन्हें अपने बेटों में से किसी एक को विरासत सौंपनी है. राजनीतिक माहौल गर्म इस बात से भी है कि इनमें से अधिकांश दिग्गज नेताओं के सभी बेटे चुनाव लड़ने में रुचि रखते हैं.
नए जेनरेशन के यह भावी नेता शिक्षित, बहुमुखी, व्यवहार कुशल और समाज की सेवा करने के इच्छुक हैं. युवाओं के बीच एक अच्छी पहचान है. कुछ राजनीतिक परिवारों में अपने पिता की जिम्मेदारी लेने की कोशिशे भाईयो के बीच जारी है. यहां तक कि समर्थक भी बंटते दिख रहे हैं. पूर्व में पांच बार बोकारो के विधायक, समरेश सिंह का परिवार उनमें से एक है.
समरेश सिंह अपने छोटे बेटे को देना चाहते हैं अपनी विरासत
हालांकि, समरेश सिंह अपने सबसे छोटे बेटे संग्राम सिंह उर्फ सोना के पक्ष में हैं, लेकिन बड़े बेटे सिद्दार्थ सिंह उर्फ मन्ना अपनी पत्नी परिंदा सिंह का प्रचार करते आये हैं.

ये दोनों विभिन्न राजनीतिक दलों के टिकट के लिए संघर्ष कर रहे हैं. संग्राम यूनियन लीडर है साथ-साथ भाजपा की सदस्यता लिए हुए हैं, जबकि परिंदा सिंह कांग्रेस की कैडर हैं. संग्राम सिंह काफी पढ़े लिखे हैं. XLRI से MBA हैं, कर्नाटक से इलेक्ट्रॉनिक और कम्युनिकेशन में इंजीनियरिंग किये हुए हैं.
15 साल तक विप्रो, प्राइसवॉटरहाउस कूपर और अन्य मल्टीनेशनल में नौकरी कर चुके संग्राम एयरटेल के राज्य प्रमुख, (झारखण्ड- बिहार) के पद से पांच साल पहले पिता के कहने पर रिजाइन कर दिया था.
राजनीति में शामिल होते ही उन्होंने अपने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए लेबर यूनियन का कमान संभाला. संग्राम ने कहा कि यह मेरे पिता की इच्छा थी कि मैं राजनीति में आऊं, जिसके लिए मैं वापस आया हूं. मेरे पिता मेरे लिए प्रचार कर रहे हैं.
वह जेएमएम, जेडी (यू) और जेवीएम (पी) के लगातार संपर्क में है. पिछली बार चास नगर निकाय का चुनाव लड़ने वाली परिंदा सिंह समर्थकों के आधार पर अपनी ताकत का दावा कर रही हैं.
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रविंद्र पांडेय ने नहीं खोला है अपने बेटों के नाम का पत्ता
रविंद्र पांडेय ने बेटों के नाम का पत्ता अभी तक नही खोला है. पांडेय के तीन बेटों में से, विकास कुमार पांडे, विवेक पांडे और विक्रम सभी चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं.

विकास महाराष्ट्र से एमबीबीएस हैं और जिले के दूसरे सबसे बड़े अस्पताल के.एम मेमोरियल के मालिक हैं. विवेक एमबीए हैं और विक्रम पांडेय स्नातक हैं. विवेक एक कुशल बिजनेसमैन हैं और करोड़ों का कारोबार संभाल रहे है.
बीजेपी पार्टी के वरिष्ठ नेतागण शायद गिरिडीह के पूर्व सांसद रविंद्र पांडेय के टिकट की कुर्बानी को नहीं भूले हैं, इसलिए यह उम्मीद जतायी जा रही है कि भाजपा पांडेये जैसे विश्वस्त कैडर के बेटों को विधानसभा का टिकट देने के बारे में जरूर सोच रही है.
वैसे विकास पांडे बोकारो निर्वाचन क्षेत्र से टिकट पर नजर गड़ाये हुए हैं, विवेक बेरमो विधानसभा सीट पर उम्मीद लगाये बैठे हैं. दोनों के अपने अच्छे समर्थक आधार हैं.
राजेन्द्र सिंह ने जयमंगल को किया राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित

बेरमो के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, राजेन्द्र सिंह ने जयमंगल को लगभग अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है. उनके दोनों बेटे जयमंगल सिंह उर्फ अनूप और गौरव सिंह अब परिपक्व नेता हैं.
राजेन्द्र सिंह की इच्छा थी कि वे अपने बेटे को बेरमो से विधानसभा चुनाव लड़वाएं. हालांकि जयमंगल पर फोकस अधिक है, जिन्होंने यूथ कांग्रेस विंग के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में काम किया है, लेकिन कई समर्थक गौरव को भी पसंद करते हैं.
राजेंद्र सिंह ने कहा कि टिकट देना पार्टी आलाकमान के हाथ में है. जयमंगल ने मेरी सारी जिम्मेदारियां उठा ली है और अच्छे से निर्वाह भी कर रहे है, देखते हैं क्या होता है. गौरव भी पार्टी का काम-काज अच्छे से संभाल रहे है.
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अकलू राम महतो अपने बेटे राजेश महतो को कर रहे प्रोजेक्ट
उपरोक्त नेताओं की तरह, संयुक्त बिहार में पूर्व मंत्री रहे, अकलू राम महतो ने बोकारो से पार्टी का खुलासा किये बिना अपने बेटे राजेश महतो को प्रोजेक्ट कर रहे है.
दिग्गज नेताओं के बेटों के चुनाव लड़ने की चर्चा जहां गरम है, वहीं बोकारो के मौजूदा विधायक, बिरंची नारायण और बेरमो विधायक योगेश्वर बटुल के कान खड़े हो गये हैं.
उन्हें भी पता है कि अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान को लेना है. जब तक हाथ में टिकट नहीं आ जाता तब तक कुछ भी कहना मुश्किल है. डर यह भी है कि अगर इन नयी पीढ़ी के नेताओं को टिकट नहीं मिलता है तो यह लोग तब भी किसी न किसी दल से चुनाव लड़ेंगे और टिकट काटेंगे. कांग्रेस और जेएमएम का भी यही हाल है.




