
Avinash mishra
Jamshepur : बहुद्देशीय स्वर्णरेखा नहर परियोजना आज भी अधर में लटकी हुई है. परियोजना 100 करोड़ रुपए के खर्च पर तैयार की जानी थी. जिसे लेकर 40 साल पहले हरी झंडी मिल गयी थी. लेकिन इतने अरसे के बाद भी परियोजना पूरी नहीं हो सकी है. 1998 में जब इस परियोजना की समीक्षा की गयी तो इसका नया वजट 1500 करोड़ हो गया. सरकार कहती है कि 75 फीसदी काम हो चुका है, लेकिन हकीकत में देखें तो अभी भी महज 50 फीसदी काम ही पूरा हो सका है. बता दें कि पुराने नक्शे को दो बार बदला जा चुका है ओर अब नये सिरे से बचे हुए काम पूरे होंगे. इस योजना का बजट वर्तमान में 15, 000 करोड पहुंच गया है. जिसमें अब अतिक्रमण, नया जमीन अधिग्रहण और पुनर्वास नीति जुड़ गये हैं.यानि अब पहले वजट के मुकाबले नया बजट 120 गुना बढ़ गया है.
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क्या है बहुद्देशीय स्वर्णरेखा नहर परियोजना
यह एक बहुद्देशीय परियोजना है जिसमें ओड़िशा और बंगाल को चांडिल, गालूडीह, ईचाडैम और खरकई बांध से नहर के माध्यम से जलापूर्ति की जानी है.चांडिल और गालूडीह डैम का काम पूरा हो गया है. लेकिन ईचाडैम का काम अभी बाकी है. इस परियोजना से करीब 3.31 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी, जो अभी 60 हजार हेक्टेयर तक ही सीमित है. परियोजना को लेकर केंद्र, बंगाल, ओड़िशा व झारखंड सरकार में समझौता भी हुआ है. पोटका और पटमदा जैसे झारखंड के क्षेत्र में इस नहर से सब्जी की भारी पैदावार संभव है. जहां अभी पानी की किल्लत पूरा इलाका झेल रहा है
केंद्र पहुंची शिकायत, मगर चाल अभी कछुए जैसी
कई बार इस परियोजना को लेकर केंद्र और राज्य के बीच पत्राचार हो चुका है. लेकिन परियोजना ने कभी रफ्तार नहीं पकड़ी. परियोजना की लगातार अनदेखी होती चली गयी. इसकी शिकायत इलाके के सांसद विद्युत वरण महतो ने इस बार केंद्रीय मंत्री गजेंद्र चौहान से की है. साथ ही पूरी परियोजना की जांच कराने की मांग की है. उन्होने परियोजना में अधिकारियों पर मिली भगत और भ्रष्टाचार का आरोप भी लगाया है. उनका कहना है कि इस परियोजना को अब भी जल्द पूरा कर लिया जाये तो बंगाल से सटे राज्य के दो इलाके पोटका और पटमदा में दो नये चेक डैम का निर्माण भी हो सकेगा और इन इलाकों में पानी की समस्या भी दूर हो सकेगी.
नहीं मिला है गांव वालों को मुआवजा
परियोजना के तहत चांडिल डैम के निर्माण कार्य के लिए 126 गांवों के लोगों से उनकी जमीन ली गयी थी जिनको मुआवजा देने का वादा भी किया गया था. इस वादे को पांच साल से ज्यादा का वक्त गुजर गया है . लेकिन अब तक इस पर कोई कारर्वाई नहीं हुई है.. कुल मिला के जिस धीमी चाल से स्वर्णरेखा परियोजना का काम चल रहा है इससे साफ पता चलता है की योजना पर गलत तरीके काम हुआ है. जिसका नुकसान तीन राज्यों और हजारों ग्रामीणों को उठाना पड़ा है. और अब भी यह तय नहीं है कि कब तक परियोजना पूरी होगी




