
Dilip Kumar
Palamu: पलामू जिले के छतरपुर प्रखंड क्षेत्र स्थित हुटूकदाग गांव जिले के लिए अनोखा उदाहरण पेश कर रहा है. यहां के 9 किसानों ने सामूहिक रूप से 14 एकड़ भूमि पर आम की बागवानी कर मिसाल कायम की है. 14 एकड़ की भूमि पर लगे सैकड़ों पौधे तैयार हो चुके हैं. आम्रपाली और मल्लिका किस्म के पौधे जिला प्रशासन के प्रयास से मनरेगा के तहत जुलाई 2017 में लगवाये गये थे. बौने किस्म के इस पौधे में 2019 में मंजर आना प्रारंभ हो गया था. लेकिन छोटे और मजबूत पौधे नहीं होने के कारण इसके मंजर को झाड़ दिया गया.
बागवानी किये किसानों ने बताया कि वर्ष 2020 में लगने वाले फल को तैयार होने के लिए छोड़ दिया जायेगा. किसानों ने बताया कि पौधे की हरियाली से उनका मन प्रफुल्लित होता है. बागवानी में घास, कीट, पतंगों की सफाई में लगे रहते हैं. आम के पौधे से आमदनी की उम्मीद पाल रखे किसानों ने जिला प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त किया है, जिसके प्रयास से आम का पौधा लगवाया गया है. आम की बागवानी करने वाले किसानों में जवाहर मेहता, अमरदेव सिंह, यदु सिंह, विजय सिंह, बिगती कुंवर आदि शामिल हैं.
इसे भी पढ़ेंः सीजेआई ने कहा, वर्तमान समय में कुछ लोगों और समूहों का व्यवहार आक्रामक नजर आ रहा है
जल संचयन और पटवन का अनोखा प्रयोग
हुटूकदाग में आम के पौधों की हरियाली आमजनों का ध्यान आकर्षित करता है. वहीं बागवानी परिसर में जल संचयन का प्रयोगात्मक विधि भी नजर आता है. जल संचयन के लिए बागवानी परिसर में ही जगह-जगह 60/40 का गड्ढ़ा खोदा गया है. इसमें बारिश का पानी संचय होता है, जो बागवानी के सिंचाई में सहायक होती है. मनरेगा योजना के तहत किसान अमरदेव सिंह के खेत में कूप का भी निर्माण कराया गया है.
वहीं बागवानी की पटवन के लिए पंपसेट भी लगाया गया है. 200 फीट फाइवर पाइप भी भूमि संरक्षण विभाग की ओर से प्रदान किया गया है. 14 वें वित्त की राशि से बड़ा हौज भी बनवाया गया है, जिसमें पानी स्टोर रखा जा सके. गड्ढ़े का पानी भूमि जल स्तर को भी बढ़ा रहा है. वहीं संचित पानी पटवन के काम में लाया जा रहा है. स्वयं सहायता समूह की ओर से घास कटिंग करने वाली एक रोलर मशीन भी मिली है.
इसे भी पढ़ेंः 24 घंटे में अमेरिका में दूसरी गोलीबारी की घटना, अब तक 29 लोगों के मारे जाने की खबर
बागवानी में रखा जा रहा है तक्नीक का ख्याल
कृषि विभाग की ओर से उन्हें स्प्रे मशीन तथा जीवामृत (जीव अमृत) बनाने के उपकरण व संसाधन उपलब्ध कराये गये हैं. साथ ही इसके लिए उन्हें प्रशिक्षित भी किया गया है. आम की इस बागवानी में किसान जीवामृत का प्रयोग करते हैं. रसायनिक उर्वरकों में किसान अपनी गाढ़ी कमाई को खर्च नहीं करना चाहते. इसकी जगह वैकल्पिक तौर पर बागवानी परिसर में ही जीवामृत तैयार कर पौधों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.
किसान स्व्यं बना रहे हैं जीवामृत खाद
किसानों ने बताया कि जीवामृत को गौ-मूत्र, गोबर, गुड़, दीमक की मिट्टी, बेसन, आंटा और पानी मिलाकर बनाया जाता है. सभी के मिश्रण को सप्ताह तक सड़ाया जाता है, उसके बाद वह जैवीक खाद के रूप में जीवामृत तैयार होता है. वे इसका प्रयोग आम के बागवानी में करते हैं, जो पौधे की वृद्धि और विकास में सहायक होता है.
यह जीवामृत पौधों को रोगाणुओं से बचाता है तथा पौधे को स्वस्थ रखने में सहायक होता है. रासायनिक उर्वरक के प्रयोग से जमीन की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है. इससे पौधों का विकास संभव नहीं होता, इसलिए खुद से वे लोग जीवामृत बनाकर पौधों के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं.
किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए प्रशासन प्रतिबद्ध: डीसी
उपायुक्त डॉ. शांतनु कुमार अग्रहरि ने कहा कि किसान आम का पौधा लगाकर मालामाल हो सकते हैं. बागवानी किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने का जरिया रहा है, लेकिन पर्यावरण संरक्षण में भी यह महत्वपूर्ण भमिका निभाता आ रहा है.
पेड़ों के प्रति श्रद्धा और पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता का उदाहरण प्रस्तुत किया है. उपायुक्त ने आम की खेती के माध्यम से किसानों के आर्थिक संवर्द्धन के लिए ग्रामीण विकास, कृषि, भूमि संरक्षण विभाग को समेकित रूप से किसानों को संसाधान मुहैया कराने का निर्देश भी दिया है. इससे किसान और अधिक उत्साह के साथ बागवानी करने के लिए प्रेरित हो सकें. उन्होंने यह भी कहा कि चौथे वर्ष से आम की खेती में लगे किसान आम की बिक्री कर 30 से 40 हजार रुपये तक प्रतिवर्ष आमदनी कर सकते हैं.
इसे भी पढ़ेंः भारतीय सेना ने पाक से कहा, सफेद झंडा लेकर आयें और शवों को अंतिम क्रिया के लिए ले जायें




