
Saurav Singh
Ranchi : सात साल पहले 7 करोड़ खर्च करके पुलिसकर्मियों के लिए सेंट्रल अस्पताल बना गया. जिससे पुलिसकर्मियों में उम्मीद जगी कि अब इलाज के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा. मगर आलम ये है कि अब इस अस्पताल का इस्तेमाल इलाज के लिए तो नहीं हो रहा है. लेकिन बैरक बनाकर रहने के लिए खूब किया जा रहा है.
झारखंड पुलिस के जवानों के इलाज के लिए राज्य सरकार ने 7 करोड़ की लागत से होटवार स्थित जैप-10 परिसर में 50 बेड का सेंट्रल पुलिस हॉस्पिटल तो बनवाया. अस्पताल बने हुए 6 साल से ज्यादा समय बीत गये ,लेकिन इस अस्पताल में आजतक सही तरीके से इलाज शुरू नहीं किया जा सका है. जी प्लस वन का अस्पताल भवन जवानों का बैरक बनकर रह गया है. यदि सेंट्रल अस्पताल में इलाज शुरू हो जाए तो यह पुलिसकर्मियों के लिए राज्य का सबसे बड़ा अस्पताल होगा. इस अस्पताल के संचालन की जिम्मेदारी गृह विभाग के अधीन आता है.
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महिला बटालियन के लिए आवंटित कर दिया गया अस्पताल
करीब 7 करोड़ की लागत से होटवार स्थित जैप 10 परिसर में पुलिसकर्मियों के लिए बनाये गये सेंट्रल अस्पताल को अस्थाई तौर पर महिला बटालियन के रहने के लिए बैरक बना दिया गया है. शुरुआत में कुछ मेडिकल उपकरण भी अस्पताल में उपयोग के लिए खरीदे गए. लेकिन इस्तेमाल नहीं होने से यह कबाड़ हो गया.
अस्पताल में पुलिस के जवानों के लिए अस्थाई रूप से रहने की व्यवस्था की गई है. जवान यहां आते हैं और दो-तीन महीने रह कर लौट जाते हैं. इसके अलावा खिलाड़ियों को भी यहां ठहराया जाता है. अस्पताल में चारों ओर फोल्डिंग बेड लगे हैं. जिसे यहां रहने वाले जवान इस्तेमाल करते हैं.
इलाज के नाम पर ग्राउंड फ्लोर पर प्राथमिक स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं. साथ ही एक एमबीबीएस डॉक्टर और एक नर्स की भी नियुक्ति की गई है. अस्पताल में सुबह 10 बजे से दोपहर के दो बजे तक डॉक्टर बैठते हैं.
डॉक्टर के बारे में बताया जा रहा है कि वे भी इस वर्ष दिसंबर महीने में रिटायर हो रहे हैं. जबकि इस अस्पताल में 12 डॉक्टर के साथ 41 स्वास्थ्य कर्मचारियों की नियुक्ति की जानी थी. लेकिन यहां तो सिर्फ एक डॉक्टर और एक नर्स के भरोसे पूरा सिस्टम चल रहा है.
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अर्जुन मुंडा ने कराया था हॉस्पिटल का निर्माण
वर्ष 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने इस हॉस्पिटल का निर्माण कराया था. ताकि जैप, सैप, जगुआर, जिला पुलिस, आईआरबी, अग्निशमन समेत अन्य जवानों और उनके परिजनों का इलाज यहां हो सके.
लेकिन पिछले 6 सालों में हॉस्पिटल शुरू तो हुआ लेकिव वो भी सिर्फ नाम का. एक डॉक्टर कुछ घंटे के लिए आते हैं, जो बस कोरम पूरा करने जैसा ही है. अस्पताल में एक्सरे मशीन और अल्ट्रासाउंड जांच की सुविधा भी है. इसके बावजूद भी जवान और उनके परिजन इलाज के लिए या तो रिम्स जाते हैं या निजी अस्पताल. इलाज भी अपने निजी खर्चे पर कराते हैं.
अस्पताल होने लगा है जर्जर
पुलिस जवानों के लिए बने सेंट्रल अस्पताल रख रखाव के अभाव में जर्जर होने लगा है. अ खिड़कियों में लगे शीशे टूटने लगे हैं. दीवारों पर कई जगह दरार भी पड़ चुकी है. जबकि अभी तक इसका इस्तेमाल भी शुरू नहीं हुआ है.
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