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मां अंबे माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड पर क्यों मेहरबान है चतरा व हजारीबाग जिला प्रशासन

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Chatra: मां अंबे प्राइवेट लिमिटेड कंपनी झारखंड में कोयले की ट्रांसपोर्टिंग का काम करती है. खदान से रेलवे साइडिंग तक कोयला पहुंचाने और फिर उसे रैक पर लोड कर पावर कंपनियों तक पहुंचाने का काम.

करीब दो-तीन साल पहले यह कंपनी झारखंड में आय़ी. और देखते ही देखते चतरा और हजारीबाग की बड़ी ट्रांसपोर्टिंग कंपनी बन गयी.

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इस बीच चतरा से लेकर हजारीबाग तक के जिला प्रशासन की भरपूर मेहरबानी इस कंपनी को मिली. इसके दस्तावेज न्यूज विंग के पास है.

ऐसे में सवाल उठता है कि प्रशासनिक मेहरबानी के पीछे कौन है. वह कौन सी ताकत है, जिसके प्रभाव में क्यों साफ छवि के अफसर भी मां अंबे के मामले में आंख मूंदने को विवश हुए. इसका खुलासा हम बाद में करेंगे. अभी बात सिर्फ प्रशासन की मेहरबानी की.

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ऊपर से ऐसा लगता है, जैसे साइडिंग तक कोयला पहुंचाने, रैक लोडिंग करने तक में सिर्फ सीसीएल, रेलवे और ट्रांसपोर्टर की भूमिका है. पर, यह आधा सच भी नहीं है.

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कोयले के इस कारोबार में राज्य सरकार और जिला प्रशासन का दखल है. सरकार और जिला प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी है. रैयतों को मुआवजा दिलवाना, जीएम लैंड व फॉरेस्ट लैंड के इस्तेमाल की अनुमति देना, प्रदूषण के लिये एनओसी देने, The Jharkhand Minerals (prevention of illegal mining, Transportation & Storage) Rules 2017 के नियम-3 तहत ट्रांसपोर्ट कंपनी को कोयला भंडारण का लाइसेंस देने समेत ऐसे दर्जन भर नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी जिला प्रशासन व पुलिस की होती है.

पर, आश्चर्यजनक ढंग से मां अंबे कंपनी को इन नियमों से छूट मिल जाती है. ताजा मामला चतरा के टंडवा से साढ़े छह किमी दूरी पर स्थित शिवपुर रेलवे साइडिंग का है.

यह रेलवे साइडिंग सीसीएल का है. यहां पर सिर्फ मां अंबे कंपनी के द्वारा कोयले का भंडारण और रैक लोडिंग का काम किया जा रहा है. वह भी बिना तमाम लाइसेंस के.

इससे पहले इसी कंपनी ने हजारीबाग के कटकमसांडी रेलवे साइडिंग से भी यही काम किया. गलती से एसडीओ ने छापामारी कर दी. कोयला जब्त कर लिया. बाद में ट्रांसपोर्ट कंपनियों ने जब्त कोयला को भी रैक पर लोड कर भेज दिया.

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न्यूज विंग ने खबर भी प्रकाशित की. लेकिन वहां के तत्कालीन डीसी और माइनिंग अफसर नितेश गुप्ता ने कोई कार्रवाई नहीं की. नितेश गुप्ता से पिछले एक सप्ताह से संपर्क करने की कोशिश की जा रही है.

मैसेज भेजने पर भी जवाब नहीं देते. इन सबसे इस अंदेशा को बल मिलता है कि ट्रांसपोर्ट कंपनियों के लिये कुछ भी कर दो, खबरों से सरकारी अफसरों को फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि एक अज्ञात शक्ति संरक्षण में खड़ी है.

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