
Faisal Anurag
राष्ट्रीय शिक्षा नीति एक ऐसा दस्तावेज है जिसे ले कर देश में भर में असहमतियों के स्वर उठ रहे हैं. केंद्र सरकार जहां इसे देश में शिक्षाक्रांति के रूप में पेश कर रही है, वहीं कारपारेट क्षेत्र की दखल और संविधान के प्रस्तावना के मूल्यों के हनन का सवाल भी उठाया जा रहा है. अनेक गैर भाजपा राज्य सरकारों और वंचित तबकों के हक के लिए गतिशील संगठनों ने भी सवाल किए हैं. शिक्षा नीति को ले कर चलने वाली बहस के बीच जानेमाने शिक्षा अध्येता डा अनिल सद्गोपाल ने अनिल चमड़िया के साथ मिल कर एक दस्तावेज तैयार किया है.
शिक्षा क्षेत्र में पिछले 70 सालों में आंदोलनों से जो अधिकार वंचितों तबकों ने हासिल किया गया था, उससे यह शिक्षा नीति प्रस्थान करती लगती है. शिक्षा नीति की भूमिका में लिखा है कि प्री-प्राइमरी एजुकेशन में छात्रों को भारतीय समाज, संस्कृति, माहौल की जानकारी दी जाएगी. इसमें आर्यभट्ट से लेकर चाणक्य तक का जिक्र है. लेकिन उसी दौरान वैकल्पिक ज्ञान मीमांसा तैयार करने वाले और जातिगत भेदभावों पर सवाल करने वाले गौतम बुद्ध और महावीर जैन की शैक्षणिक पद्धति का जिक्र नहीं है. चार्वाक के भौतिकवादी दर्शन का भी इसमें कोई उल्लेख नहीं है. उनका भारतीय संस्कृति से मतलब ब्राह्मण संस्कृति से है.
इसे भी पढ़ेंः झारखंड : नौकरी मांग रहे 8, 40, 991 लोग और वैकेंसी है महज 93 हजार
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्री-प्राइमरी एजुकेशन के लिए लार्ज स्केल पर मिशन चलाने की बात कही गयी है. और कहा है कि इसके लिए काफी लोगों की जरूरत होगी. हालांकि इसमें नियमित शिक्षकों को रखने के बजाये स्वयंसेवक, काउंसलर या सामाजिक कार्यकर्ता चाहिए होंगे. इसमें यह भी कहा गया है कि ब्लॉक हेडक्वार्टर में स्कूलों की मदद स्वयंसेवी संस्थाएं करेंगी. यह साफ नहीं है कि ये स्वयंसेवी कौन होंगे. और ये स्वयंसेवी संस्थाएं कौन सी होंगी? उच्च शिक्षा का ज्ञान संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज 22 भाषाओं में दिया जाएगा. लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है कि उच्च शिक्षा की प्रवेश परीक्षाएं केवल अंग्रेजी भाषा में ली जाएंगी.
1 मई 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षा नीति की समीक्षा के बाद कहा था कि नई शिक्षा नीति का केंद्र बिंदु ऑनलाइन शिक्षा होगी. इंटरनेशनल मार्केट की अभी आई रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले चार सालों में ऑनलाइन एजुकेशन का बिजनेस 15 बिलियन डॉलर का होगा. प्राइवेट प्लेयर्स की नजर इस पर है. अप्रैल 2000 में शिक्षा में सुधार करने के नाम पर एक समिति बनी. और उसके संयोजक बने दुनिया के सबसे बड़े पूंजीपतियों में एक- मुकेश अंबानी. इस समिति के दूसरे सदस्य थे, उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला. इस समिति ने सरकार को अपनी रिपोर्ट दी. और कहा कि शिक्षा में दी जा रही सब्सिडी में सरकार को कटौती करनी चाहिए. और इसकी भरपाई फीस बढ़ाकर करनी चाहिए.
इसे भी पढ़ेंः सुनिल सोरेन VS रणधीर सिंहः दुमका चुनाव से पहले संथाल में बीजेपी सांसद और विधायक आपस में भिड़े
यह भी कहा गया कि एक ऐसा प्राइवेट विश्वविद्यालय भी होना चाहिए जो बाजार की जरूरतों के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार कर सकें. यह भी कहा कि शिक्षण संस्थानों में किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि पर प्रतिबंध लगा देनी चाहिए.
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में यह भी कहा था कि हम क्वालिटी और वर्ल्ड क्लास एजुकेशन देंगे. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में वर्ल्ड क्लास एजुकेशन के साथ कई जगहों पर देश के विश्वविद्यालयों को टॉप-100 विश्वविद्यालयों में लाने की बात कही गयी है. हर साल आने वाली इस लिस्ट को तैयार करने वालों में अकादमिक लोग या शिक्षाविद नहीं होते. यह काम बड़ी-बड़ी मार्केटिंग एजेंसियां करती हैं. जिनके शेयर न्यूयॉर्क और लंदन स्टॉक एक्सचेंज में खरीदे-बेचे जाते हैं.
24 जून 2020 को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वर्ल्ड बैंक के साथ एक करार किया. वर्ल्ड बैंक को इस करार के लिए तीसरी बार भारत बुलाया गया था. इसमें Strengthening Teacher-Learning and Results for States (STARS) कार्यक्रम को अपनाने के लिए हस्ताक्षर हुए. इसमें निहीत है कि प्री-प्राइमरी से लेकर 12वीं तक की शिक्षा वर्ल्ड बैंक की शर्तों के अनुसार चलेगी. इससे पहले भी वर्ल्ड बैंक ने दो बार भारत में ऐसे समझौते किए हैं. जब उन्होंने प्राइमरी शिक्षा के बजट के 100 रुपये में से महज 1.38 रुपये का लोन देकर भारत में शिक्षा के पाठ्यक्रम से लेकर शिक्षकों की भर्ती तक सभी शर्तें अपने हिसाब से बदल दी थीं. दूसरी बार सर्व शिक्षा अभियान के दौरान यह करार हुआ था.
इसे भी पढ़ेंः रूस व अमेरिका में तनाव : सीरिया में तैनात किये गये अमेरिकी सैनिक व बख्तरबंद वाहन




