LITERATURE

निशाने पर कौन होगा

समीक्षा :  'समय की ठनक' बलभद्र की हिंदी कविताओं का पहला संग्रह-  डॉ लालदीप

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Dr Laldeep Gope

‘समय की ठनक’ बलभद्र जी की हिंदी कविताओं का पहला संग्रह है. ‘लोकायत प्रकाशन’ से प्रकाशित कविता संग्रह में कुल 55 कविता हैं. और संयोग ऐसा है की अभी वे उम्र के 55 वे पायदान पर भी हैं.  बलभद्र जी कोई शब्दों का तिलिस्म या जटिल शब्दों का आडम्बर नहीं खड़ा करते हैं. जिसमें बहुत सारे नये शब्दों का प्रयोग है. जो खेती – किसानी, मजूरी के दरम्यान आम जन के बीच बोली जाती है. इसलिए किसान या बनिहारिन की बात जब कवि करता है तो लगता है वह भी उसी किसानी का एक भाग है. न की खेत के मेड पर छाता लगाकर बैठा है. कवि अपनी कविताओं में हमें दिखा रहा है. लगता है वह मिट्टी में लहालोट है.

इस कविता संग्रह की पहली ही कविता इस और इशारा करती है ‘अन्न हैं, कलपेंगे’ यह संवेदना अन्न के प्रति एक किसान के जेहन में ही आ सकता है. इसलिए वह मानवीय रिश्तों से सराबोर है. रिश्तों की समझ ने ही हमें मनुष्य बनया है. जो इस कविता संग्रह का सार है. ‘धत तेरे की अन्न है कलपेंगे पडे – पडे’ कहकर छू-मंतर हो गए बाबा – इनकी कविताओं में मां है, पिता हैं दादा है दादी है यहाँ तक की इनके दादा के चचेरे दादा भी हैं.

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कवि बहुत बारीकी से सारे चीजों के तह तक पाठक को ले जाता है. और पाठक उसमे डूबता चला जाता है.

‘वह तो चिरई है बाबा की’ में कवि कहता है – ‘मैं सोता रहा बाबा के संग / पर कभी दिखी नहीं वह चिरई /फिर समझ में आया – वह तो चिरई है बाबा की’ जो आज भी कवि को शहर -दर- शहर, महानगर में कवि को सुबह जगाती है. बाबा की याद दिलाती है. कवि स्मृतियों से गहरे जुड़ा है, जो जीवन को सरल और सहज बनाये रखता है. ‘गांव जाना चाहती है मां’ यह हमारे समय की सबसे महत्पूर्ण रचना हो गई है. आज कोरोना कोविड 19 काल में हर कोई अपना गांव लौटना चाह रहा है. वह हजारों मील पैदल शहरों को नाप रहा है. अपने गांव लौटना चाहता है. आखिर वह क्या चीज गांव में है जो मां को अपनी और खींचता है.

मेहनत, मजूरी और संघर्ष करती हुई महिला इनकी कविताओंमें प्रमुखता से जगह पाती है. फसल काटती, बनिहारी करती और निजी सेनाओं के खिलाफ लड़ती कैथरकला की औरतें | जो सिर्फ प्रतीक भर नहीं हैं | वह गोरख की कविताओं के बाद विस्तार पाती हैं. कैथरकला कोई प्रतीक नहीं /अजायबघरों में नफासत के साथ रखने योग्य / इतिहास वस्तु भी नही वह एक जमीन है.

‘वे मुगालते में हैं. सचमुच मुगालते में/ कैथरकला चुप नहीं

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विविध तुक-तालों में/ व्यवस्था की बखिया उधेड़ती/ गूँजती हुई एक लय है वह भोजपुर से बाथे तक मेहनतकशो के खून के छींटे हैं. महिलाओं,बच्चों के खून के गंध से आसमान फटा जा रहा है.समय का  माथाठनक रहा है. कवि प्रतिरोध की धार को बुलंद करता है. परिवर्तन के पाँव थमे हैं कभी, कराह सकता है खून में लथपथ सदी का इतिहास / इसमें कोई शक नहीं/पर उसे रोक पाना आदमखोरों के बुते की बात नहीं. कवि की नजर प्रतिक्रियावादियों पर भी है. जब निजी सेना वाले अपनी घरों के औरतों को सामने लाकर उसे जुलुस का शक्ल देना चाहते हैं.बुलेट पर बैलेट की जीत को कवि सदियों से वोट से वंचित दलितों को ‘कैसा लगा ‘मेंदर्ज करते हैं. और यह आजाद देश में ऐतहासिक दस्तावेज में बदल जाता है.

कवि अपने परिवेश से अछूता नहीं रह सकता है. इन दिनों ये राज्य के गिरिडीह जिले के कॉलेज में प्राध्यापक हैं. झारखण्ड में कोयला खनन के लिए सैकड़ों गांव देश के नक़्शे से गायब हो गये और उनके लाखों बाशिंदे विस्थपित. उनके दुख, संताप , साईकिल से कोयला ढोते श्रमिकों के दुखते अंतड़ियों की पीड़ा को अपनी कविता का विषय बनाते हैं. व्याख्या या विश्लेषण तक ही कवि अपने को सीमित नहीं रखता है. वह साईकिल को धनुष और श्रमिक को तीर में बदलने की कल्पना करता है. और कहता है अब यह मत पूछना/निशाने पर कौन होगा.

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