Opinion

श्रमिक ट्रेनों के भटकने से हो रही मौतों की जवाबदेही आखिर किसकी है?

Faisal Anurag

मुजफ्फरपुर स्टेशन पर मां की चादर खींच कर नींद से उठाते दो बच्चों की तस्वीर यदि पूरे देश को मर्माहत नहीं कर पा रही है तो लोकतांत्रिक नागरिक होने की हकीकत पर प्रत्येक को सोचने की जरूरत है. अर्चना मर चुकी है. लेकिन बच्चों को लग रहा है कि उसकी मां गहरी नींद में है. उठ कर बच्चों को पुचकारेगी.

लेकिन भारतीय रेल के श्रमिक स्पेशल की यात्री अर्चना एक मामूली नागरिक रही है. जो अपने श्रम से जीवन जीती है. उसके लिए न तो कोई शोक-संवेदना प्रकट करेगा और न ही राजनीति के भीतर संवेदना का ज्वार उठेगा. अर्चना शिखर धवन नहीं है जिनके अंगूठे की चोट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संवेदना जाग गयी थी. और उन्होंने ट्वीट कर इसे प्रकट किया था. ऐसे कई उदाहरण पिछले सालों में देश देख चुका है.

Sanjeevani

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 अर्चना हो या अनवर या दयाबख्श या अशोक. सब के सब श्रमिक हैं. जिन्होंने भारत के निर्माण में बेहद कम सुविधाओं और परिश्रम पर अपना योगदान दिया है. अब ये चारों नहीं रहे. चारों ही अलग-अलग श्रमिक ट्रेन से यात्रा कर रहे थे. लेकिन वे घर नहीं पहंच सके.

हो सकता है कि इसकी कोई खानापूरी वाली जांच हो. और उनकी मौतों के लिए वे ही जिम्मेदार ठहरा दिए जाएं. लेकिन रेल मंत्रालय की कुव्यवस्था पर सवाल खड़ा नहीं होगा. इन मौतों की जिम्मेदारी किसकी है. आखिर इसे तय कौन करेगा. क्योकि मरने वाले ये चार ही नहीं है. यात्रा के दौरान कई बीमार हैं. और कई की जान जा चुकी है. ट्रेनों की देरी ने इनकी मौत को हत्या में बदल दिया है. 70 से 90 घंटे की देरी कोई सामान्य तो नहीं है.

खास कर उस दौर में जब भारतीय रेल रूट मैप और अन्य डिजिटल सुविधाओं से लैस है. रेल की कुल कार्य क्षमता का इस समय केवल तीन प्रतिशत ही इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन गाड़ियों के भटकने और देरी का सिलसिला जारी है.

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 एक यात्री जो मुंबई से बरौनी की यात्रा कर रहा था, उसने बताया कि मुंबई से गाड़ी खुलने के बाद गुजरात गयी. फिर राजस्थान और उत्तर पद्रेश से पटना. जबकि सामान्य दिनों में रेल क्षमता का पूरा इस्तेमाल होता है. और बरौनी रूट पर विभिन्न जगहों से आनेजाने वाली 100 ट्रेन चलती है.

30 घंटे में यात्रा पूरी होती है. लेकिन इस गाड़ी को पहुंचने में पांच दिन लग गए. रास्ते में न तो खाने का प्रबंध था और न पानी का. देश के सबसे गर्म प्रदेशों से लू के बीच उस गाड़ी को भटका देने का अर्थ क्या हो सकता है.

 बिहार झारखंड आने वाली ज्यादातर ट्रेनों के देरी से पहुंचने की जवाबदेही तो कम से कम तय करनी चाहिए. मोदी सरकार के सबसे सक्षम मंत्री मोने जाने वाले पियूष गोयल मंत्रालय का यह हाल है. महाराष्ट्र में मजूदरों की पीड़ा के ऊपर ठाकरे सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का सिसिला इसके माध्यम से जारी है.

बसई में जिस तरह यात्रा करने वाले मजूदरों की भीड़ इस भयावह गर्मी में तपते सूरज के बीच मैदान में तीन दिनों से इंतजार कर रही है,  वह भी सामान्य दृश्य तो नहीं है. गोयल बार-बार ट्वीट कर महाराष्ट्र सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि ट्रेन तैयार है लेकिन यात्री राज्य सरकार नहीं जुटा पा रही है. बसई का दृश्य तो कुछ और ही बता रहा है.

 मजदूरों की बेबसी का यह दौर भारतीय इतिहास का ऐसा दस्तावेज है जो आनेवाली पीढियों को शर्मसार करता रहेगा. सवाल उठता है कि इस समय जब कि उद्योग खोले जा रहे हैं, जो इन मजूदरो के बगैर नहीं चल सकते हैं. लेकिन वे किस भरोसे फिर वापस आ सकते हैं. जिन तकलीफ हालातों से वे गुजर रहे हैं उसमें क्या यह संभव है कि सरकार के किसी भी वायदे पर वे भरोसा कर लें. कई जानकार तो कह चुके हैं कि इन श्रमिकों के साथ जो व्यवहार हो रहा है, वह नुकसानदेह साबित होगा.

आइआइएम के प्रो चिन्मय दुबे ने कहा है कि लॉकडाउन लगाने के पहले ही इन मजदूरों को उनके घर पहुंचा देना चाहिए था. अमरीका ने लॉकडाउन के पहले उन छात्रों को उनके घर पहुंचा दिया गया जो घर से दूर थे. लेकिन भारत ने न तो छात्रों और न ही श्रमिकों को पर किसी तरह का विचार किया. प्रधानमंत्री ने जरूर कहा कि जो जहां है, वहीं रहे. लेकिन लॉकडाउन ने जो साइक्लोजिकल संकट खड़ा किया है, उसका तो आकलन ही नहीं किया जा सकता था.

 हर हाल में मजदूरों की तकलीफ, ट्रेन के भटकने और देरी से चलने के कारण की जांच जरूरी है. और इसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए. साथ ही रेलमंत्री को इस समस्या पर भी अपनी जवाबदेही खुद तय करनी चाहिए. देश के श्रम बल के भीतर निराशा और बेबसी के दूरगामी असर को नजरअंदाज करना घातक साबित हो सकता है.

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