
Faisal Anurag
भारतीय जीडीपी की गिरावट का असर पूरी दुनिया के आर्थिक विकास दर पर पड़ रहा है. यह गंभीर बात आइएमएफ की प्रधान गीतागोपी नाथ ने कही है. भारत में सीएए, एनपीआर, एनआरसी के आंदोलनों पर भी आइएमएफ की नजर है.
इसका कारण यह है कि इसका असर आर्थिक विकास दर को प्रभावित करने की आशंका है. हालांकि गीतागोपी नाथ ने आंदोलन पर कोई स्पष्ट बात तो नहीं कही है लेकिन उन्होंने इस ओर इशारा जरूर किया है.
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उन्होंने कहा है कि जब अप्रैल में आर्थिक हालात का रिव्यू किया जायेगा, तब इस आंदोलन के प्रभाव का आर्थिक विकास के संदर्भ में आकलन हो सकेगा. यह एक गंभीर चेतावनी है. दुनिया के अनेक देशों की नजर भारत के इन आंदोलनों और यहां के आंतरिक हालात पर हैं.
गोपीनाथ की बातों की खास बात यह है कि उन्होंने दुनिया के आर्थिक विकास दर को लेकर जो अंदेशा पैदा किया है वह बेहद खतरनाक है.
भारत में अब तक कहा जा रहा था कि दुनिया का ग्रोथ ही स्लोडाउन का शिकार है. जिसका असर भारतीय अर्थ व्यवस्था पर पड़ रहा है. लेकिन आइएमएफ चीफ ने यह कह कर भारत के आर्थिक जानकारों और राजनीतिक ताकतों को चौंकाया है कि भारत के कारण दुनिया के आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो रही है.
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आइएमएफ ने भारत की विकास दर के अनुमान को घटा दिया है. 2019- 20 में भारत के विकास की गति घट कर 4.98 रहेगी. पांच ट्रिलियन इकोनोमी के सपने के लिए यह एक बड़ा आघात है. यदि गोपीनाथ की बातों के संकेत को समझा जाए तो आगे भी भारत के विकास दर के कम ही रहने की संभावना बनी हुई है.
इसका असर यह है. विश्व की जीडीपी दर 0.1 रहने का अनुमान है. गोपीनाथ के अनुसार इस दर के घटने का बड़ा कारण भारत है, जहां विकास दर लगातार कम हो रही है. कोर सेक्टर में लगातार गिरावट के बाद बिजली उत्पादन में कमी और कर उगाही के क्षेत्र में अलार्म बेहद गंभीर है. बजट की घड़ी नजदीक आ रही है.
लेकिन ऐसी संभावना नहीं दिख रही है कि वह आर्थिक संकट के निपटने की राह बना सकेगा. इसके कारण सरकार की प्राथमिकता को भी बताया जा रहा है. जानकार बेहद निराश हैं. क्योंकि भारत की विकास दर को गति देने का राजनीतिक इरादा अस्पष्टता का शिकार है.
भारत की अर्थव्यवस्था की नकारात्मक प्रवृतियां के कारण कहा जा रहा है कि 2019-20 में विश्व आर्थिक की विकास दर 2.9 तक ही रह सकती है. यह पहले के अनुमान से कम है. और इस कारण दुनिया के अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाओं के प्रभावित होने का अंदेशा है.
2007-08 में जो ग्लोबल मंदी आयी थी वह भी एक-दो देशों के नकारात्मक आर्थिक रुझानों के कारण ही थी. लेहमन ब्रदर्स के पतन की कहानी ने उसे संकटग्रस्त बना दिया था. लेकिन भारत की विकास दर कुछ घटी जरूर थी.
लेकिन वह लड़खड़ा नहीं गयी थी. दुनिया भर की आर्थिक रेटिंग एजेंसियां आज के संकट को 2008 की तुलना से अधिक गंभीर बता रही हैं.
आइएमएफ के अनुसार दुनिया के कुछ बाजारों की नकारातमक अचंभित करने वाली प्रवृतियों का असर वैश्विक हो गया है. खासकर भारत के बाजारों की नकारात्मक प्रवृति की भूमिका अहम है. कुछ मामलों में यह आकलन सामाजिक प्रभावों को भी प्रतिबिंबित करता है. यह एक गंभीर टिप्पणी है.
भारत के सामाजिक क्षेत्र का असंतोष पिछले सालों में उभार पर है. और नागरिकता विवाद के प्रतिरोध का असर दुनिया महसूस कर रही है. भारत के छात्र जिस तरह के प्रतिरोध आंदोलनों में भागीदारी कर रहे हैं. इससे पूरी दुनिया की मीडिया और बुद्धिजीवियों में चिंता है.
हाल ही में अमरीका के तीन बड़े अखबारों ने जिस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की है, उसके अपने निहितार्थ हैं. लोकतंत्र में संवाद की अपनी भूमिका होती है. लेकिन भारत में संवादहीनता की जो स्थिति उभर रही है उससे लगता है कि आने वाले दिन बेहद अहम होने जा रहे हैं.
गृहमंत्री अमित शाह ने लखनऊ में चुनौती भरे लहजे में कहा है कि डंके की चोट पर वे कह रहे हैं जिसे जो करना है कर ले, चाहे जिना आंदोलन करना है कर ले, सीएए वापस नहीं होगा. इसके साथ उन्होंने कहा कि यह दो विचारों की लड़ाई है.
और उसे आरपार तक जाना ही है. भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में दंभ भरी ऐसी बात कभी नहीं सुनी गयी. यहां तक कि इंदिरा गांधी को भी इमरजेंसी से पीछे हटना पड़ा था. सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में प्रतिरोध करने वालों की आवाज का आदर हो या या नहीं.
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सीएए को भारत का आंतरिक मामला बताते हुए भी यह भी कहा कि इस कानून की कोई जरूरत नहीं थी. यह बेवजह है. इससे लगता है कि भारत के पड़ोस में नाराजगी बढ़ी है. और भारत का मित्र बांग्लादेश भी बेचैन है.
देश के आर्थिक हालात सरकारी की कितनी प्राथमिकता में हैं, यह तो आने वाले कुछ दिनों में ही पता चलेगा. लेकिन सामाजिक असंतोष का असर विकास दर पर नकारात्मक ही होता है. लेकिन संत्रास में डूबती एक बड़ी आबादी के कारणों को लोकतांत्रिक संवाद के रूप में समझने का यह वक्त की जरूर है.
आइएमएफ भी कमोबेश यही इशारा कर रहा है. 2020 की आर्थिक विकास दर पर अर्जेंटीना, ईरान और तुर्की जैसी दबाव वाली इकोनोमी के वुद्धि परिणाम के साथ ब्राजील, भारत और मेक्सिको जैसी उभरती, लेकिन क्षमता से कम प्रदर्शन कर रही इकोनोमी पर निर्भर है.
इन तीनों अर्थव्यवस्था वाले देशों में सामाजिक असंतोष गंभीर है. भारत की स्थिति ज्यादा पेचीदा है. इसे लेकर आइएमएफ चिंतित नजर आ रहा है. क्योकि दुनिया में आर्थिक विकास के क्षेत्र में गंभीर अनिश्चितता बनी हुई है.
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